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जम्मू-कश्मीर सरकार ने कुछ अखबारों के विज्ञापन रोके

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 September 2016, 7:47 IST

जुलाई की शुरुआत में स्थानीय अखबारों का प्रकाशन और वितरण रोक पाने में विफल रही जम्मू-कश्मीर सरकार ने अब एक और घातक पैंतरा चला है. स्थानीय मीडिया उसके ही सुर में सुर मिलाए, यह सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने कुछ चुनिंदा अखबारों को सरकारी विज्ञापन जारी करना बंद कर दिया हैं तो वहीं कुछ अखबारों को विज्ञापनों की संख्या जबर्दस्त रूप से कम कर दी है.

ऐसा ही एक अखबार है कश्मीर ऑब्जर्वर. यह घाटी का सबसे पुराना अंग्रेजी अखबार है. इस अखबार को पिछले 20 से ज्यादा दिनों से एक भी विज्ञापन नहीं मिला है. दो माह में यह दूसरा मौका है जब राज्य सरकार ने प्रेस का गला घोंटने की कोशिश की है. सरकार ने इस बारे में कोई भी स्पष्टीकरण देने से इनकार कर दिया है.

सूचना विभाग के निदेशक डॉ. शाहिद इकबाल चौधरी ने एक बयान में कहा है कि कश्मीर के वर्तमान हालात को देखते हुए सरकारी विज्ञापनों में कमी की गई है. चौधरी ने कहा कि पिछले दो महीनों से कश्मीर में जो हालात हैं, इस दौरान विकासात्मक कार्य रुके हुए हैं, सरकार द्वारा किए जाने वाले नए काम भी रुके हुए हैं, ऐसे में विज्ञापनों का प्रवाह कम हुआ है.

सूचना विभाग सूची में दर्ज अखबारों और घाटी की पत्र-पत्रिकाओं को जारी किए जाने वाले विज्ञापनों को न्यायसंगत बनाने की कोशिश में है ताकि विज्ञापन नीति के अनुसार उनको कष्टकारी समय में हरसंभव वित्तीय समर्थन देना सुनिश्चित किया जा सके. चौधरी ने कहा कि सरकार इस तथ्य से वाकिफ है कि अन्य क्षेत्रों और व्यापारों की तरह से ही समाचार पत्र उद्योग भी घाटी के वर्तमान दौर में संकटों से गुजर रहा है.

अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन बढ़ाने के हर प्रयास किए जा रहे हैं ताकि उन्हें हरसंभव सहारा मिल सके

अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन बढ़ाने के हर प्रयास किए जा रहे हैं ताकि उन्हें हरसंभव सहारा मिल सके. चौधरी ने आंकड़े देते हुए कहा कि सरकार ने इस साल अगस्त के अन्त तक अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को गैर बजटीय भुगतान छोड़कर 11.50 करोड़ रुपए जारी किए हैं जबकि वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए कुल बजट 25 करोड़ का है.

हालांकि, सम्पादकों का मानना है कि घाटी में चल रही अशांति की उनकी कवरेज को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जानबूझकर अखबारों को जारी किए जाने वाले विज्ञापनों की संख्या में कमी की है. पिछले सप्ताह हुई एक बैठक में स्थानीय सम्पादकों ने कहा कि राज्य के सूचना विभाग ने उनसे कहा है कि यदि विज्ञापन चाहिए तो उन्हें घाटी में चल रही अशांति के फोटो फीचर्स छापने बंद करने चाहिए. उनमें से कुछ ने ऐसा किया भी है. हालांकि, कुछ सम्पादकों ने इस निर्देश पर आपत्ति भी जताई है.

एक सम्पादक ने अपना नाम न छापने की इच्छा जताते हुए कैच को बताया, 'मैंने कहा कि फोटो काल्पनिक तरीके से नहीं ली जा सकतीं. न तो उन्हें मनगढ़ंत तरीके से बनाया जा सकता है. फोटो तो हालातों को बयां करती है जो खबरों के साथ बिना किसी सजावट अथवा अतिशयोक्ति के छापी जाती है. घाटी में सुदृढ़ निजी क्षेत्र की गैर-मौजूदगी के कारण स्थानीय अखबार परम्परागत रूप से सरकारी संसाधनों पर ही निर्भर रहे हैं. कॉरपोरेट विज्ञापनों का तो अभाव है ही, लगातार हड़ताल और बंद का जारी रहना तथा सरकारी विज्ञापनों को रोके रखना यह स्थानीय अखबारों को समाप्त करने का संकेत है, अखबार बंद होने के कगार पर हैं.'

कश्मीर ऑब्जर्बर के सम्पादक सज्जाद हैदर कहते हैं कि सरकार हमारा मुंह बंद करने की मंशा रखती है. हालात को जस का तस सामने रखने पर विज्ञापन रोक दिए गए हैं. यदि कोई आपत्ति है तो सरकार इसे सार्वजनिक रूप से बताए, हमारे तथ्यों को चैलेंज करे. लेकिन कोई कारण बताए बिना विज्ञापन न जारी करना हमें रोकने की अंदरूनी कवायद है.

हैदर ने कहा कि कम उपलब्ध संसाधनों के बावजूद अशांति के दौर में उनके अखबार ने सर्वाधिक संतुलित खबरें दी हैं. अपने एक लेख में हैदर लिखते हैं कि विज्ञापन के हिस्से को न दिए जाने से कश्मीर ऑब्जर्बर को भूखों रहने और गला घोंटकर मार डालने की कोशिश की जा रही है. उनके मुताबिक पाठकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि अन्य तरह की सूचनाओं के लिए वह अन्य अखबारों को देखें.

हैदर ने कहा कि कम उपलब्ध संसाधनों के बावजूद अशांति के दौर में उनके अखबार ने सर्वाधिक संतुलित खबरें दी हैं

हैदर आगे लिखते हैं कि, कश्मीर ऑब्जर्बर वह लिखना जारी रखेगा जो सही है और अपनी अभिव्यक्ति की आजादी की कवायद करता रहेगा. भूखे और गला घोंटकर मारने की धमकियों का हमारे उपर कोई असर नहीं पड़ेगा.

घाटी में ई-कर्फ्यू के लगातार चलते रहने से लोगों के लिए स्थानीय अखबार खबरों के एकमात्र स्रोत बने हुए हैं. हालांकि, सरकार ने बीएसएनएल ब्रॉडबैंड पर रोक नहीं लगाई है, फिर भी इस पर कुछ-कुछ दिनों के लिए प्रतिबंध लगाया जाता रहा है. अब यह सुविधा भी बंद कर दी गई है. इससे घाटी वस्तुत: पूरे संसार से कट गई है. इससे जिलों में तैनात पत्रकारों को खबरें भेजने में पेरशानी हो रही है जो बीएसएनल की सेवाओं पर निर्भर हैं.

सरकार ने पहले से ही केबीसी, गुलिस्तान टीवी, मुंसिफ टीवी, जेके चैनल और इंसाफ टीवी के अलावा कुछ अन्य समाचार चैनलों को प्रतिबंधित कर रखा है. इसके अलावा कथित रूप से पाकिस्तान के चैनल वर्तमान घटनाओं की एकतरफा खबरें देते हैं जो उनका पक्ष लिए होती हैं. श्रीनगर के जिलाधिकारी ने दो सितम्बर को आदेश जारी कर कहा है कि सभी निजी केबल ऑपरेटर सभी चैनल को बंद कर दें अन्यथा उनके खिलाफ केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (रेग्यूलेशन एक्ट, 1995) के तहत कार्रवाई की जाएगी.

आदेश में कहा गया है कि श्रीनगर में केबल आपरेटर ऐसे विभिन्न कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं जिससे घाटी और श्रीनगर में कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. वे ऐसे कार्यक्रम प्रसारित करते हैं जिसके चलते राज्य की सम्प्रभुता के खिलाफ घृणा, द्वेष, वैमनस्य की भावना को बढ़ावा मिल सकता है.

जुलाई की शुरुआत में सरकार ने आधी रात को श्रीनगर के बाजारों से अखबार उठवा लिया था. और उसे बंटने से रोक दिया था. लगभग 20 पुलिस कर्मी राज्य के सबसे बड़े अखबार ग्रेटर कश्मीर के कॉरपोरेट कार्यालय में जबर्दस्ती घुस आए थे और अंग्रेजी दैनिक ग्रेटर कश्मीर की प्लेट्स उठाकर ले गए थे.

पुलिस ने इसी तरह से कश्मीर रीडर, राइजिंग कश्मीर, कश्मीर ऑब्जर्वर समेत अन्य अंग्रेजी उर्दू दैनिकों पर छापे मारे

शुक्रवार को उर्दू संस्करण कश्मीर उजमा की 50,000 से ज्यादा प्रतियां जब्त कर ली गईं थीं. पुलिस ने अखबार के प्रेस फोरमैन बीजू चौधरी तथा अन्य दो कर्मचारियों को गिरफ्तार भी कर लिया था, जबकि अन्य जो भी कर्मचारी वहां मौजद थे उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ. पुलिस ने इसी तरह से कश्मीर रीडर, राइजिंग कश्मीर, कश्मीर ऑब्जर्वर समेत अन्य अंग्रेजी उर्दू दैनिकों पर छापे मारे और उनका वितरण रोक दिया.

विडम्बना तो यह रही कि सरकार ने इस कृत्य से खुद के अनभिज्ञ होने का बहाना बनाया, वह भी तीन दिन के बाद. बाद में वरिष्ठ पीडीपी नेता और राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग तथा मुख्यमंत्री के सलाहकार अमिताभ मट्टो ने कुछ समाचार चैनलों को दिए अलग-अलग साक्षात्कारों में ऐसी किसी भी घटना की जानकारी से इनकार ही कर दिया.

हैदर कहते हैं कि मौजूदा अशांति पर नियंत्रण पाने में सरकार अक्षम रही है और अब वह स्थानीय प्रेस का मुंह बंद करने की कोशिश कर रही है. यह आसान तरीका हो गया है. हैदर कहते हैं कि वे हमारी रिपोर्ताज के तथ्यों को चुनौती नहीं दे सकते लेकिन वे हम पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं.

First published: 18 September 2016, 7:47 IST
 
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