Home » इंडिया » Jammu And Kashmir: Syed Ali Shah Geelani quits separatist organisation Hurriyat Conference
 

जम्मू-कश्मीर: सैयद अली शाह गिलानी ने अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का छोड़ा साथ

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 June 2020, 15:14 IST

Jammu And Kashmir: जम्मू-कश्मीर के बड़े अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का साथ छोड़ दिया है. सैयद अली शाह गिलानी पिछले तीन दशक से कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन का चेहरा रहे हैं. लेकिन खुद उन्होंने कश्मीर में सबसे बड़े अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का साथ छोड़ दिया.

गिलानी कश्मीर घाटी में 90 के दशक से अलगाववादी आंदोलन का नेतृत्व करते आ रहे हैंं. 90-वर्षीय सैयद अली शाह गिलानी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के आजीवन अध्यक्ष बने थे. हालांकि साल 2010 के बाद से वह अधिकतर समय घर में ही नज़रबंद रहे. गिलानी की पिछले काफी दिनों से तबियत भी ठीक नहीं बताई जा रही है. इसी साल फरवरी में वह अस्पताल में भर्ती हुए थे.

आज सुबह उन्होंने एक ऑडियो संदेश जारी किया. इस ऑडियो संदेश में उन्होंने कहा कि वह मौजूदा हालात के चलते ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा दे रहे हैं. गिलानी ने कहा कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की मौजूदा स्थिति के मद्देनज़र इस मंच से वह पूरी तरह अलग हो जाने की घोषणा करते हैं. उन्होंने बताया कि मंच के सभी घटकों को इस संदर्भ में वह पहले ही विस्तृत खत भेज चुके हैं.

सोपोर विधानसभा क्षेत्र से वह तीन बार विधायक निर्वाचित हो चुके हैं. गिलानी ने कश्मीर में आतंकवाद फैलने के बाद चुनाव लड़ना बंद कर दिया था. माना यह भी जा रहा है कि उनकी तबीयत नासाज़ है. पिछले साल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू एवं कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को खत्म किए जाने के बाद कश्मीर के भीतर यह एक बड़ी घटना है.

बताया जा रहा है कि कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद सैयद गिलानी को पाकिस्तान स्थित समूहों से आलोचना का सामना करना पड़ा था. पाकिस्तान स्थित समूहों का कहना था कि गिलानी कश्मीर के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए कदमोंं का जवाब देने में नाकाम रहे हैं. अलगाववादी कट्टरपंथी नेता की चुप्पी पर भी कई लोगों ने सवालिया निशान लगाए थे.

 

हुरियत कांफ्रेंस है अलगाववादी संगठन

कश्मीर में कई छोटे-बड़े अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस इन सभी संगठनों का मंच है. जम्मू-कश्मीर में साल 1987 में फारूक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा था. तब नेशनल कॉन्फ्रेंस को 40 और कांग्रेस को 26 विधानसभा सीटें मिलीं. इसके बाद फारूख अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.

इस चुनाव में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को सिर्फ 4 सीटें ही मिली थीें. इसके बाद कांग्रेस पार्टी तथा नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठजोड़ के विरोध में 13 जुलाई 1993 को घाटी में ऑल पार्टीज हुर्रियत कान्फ्रेंस की नींव रखी गई थी. इस संगठन का काम घाटी में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ाना था. साल 2003 में गिलानी मतभेदों की वजह से हुर्रियत से अलग हो गए थे.

इसके बाद उन्होंने नया संगठन ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (जी) या तहरीक-ए-हुर्रियत बनाया था. ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चीफ मीरवाइज उमर फारूक हैं. मीरवाइज वाले संगठन को उदारवादी तथा गिलानी वाले गुट को कट्टरपंथी माना जाता रहा है. 

 LNJP के सीनियर डॉक्टर ने कोरोना वायरस से गंवाई जान, CM केजरीवाल ने लिखी दिल छूने वाली बात

जम्मू-कश्मीर का डोडा जिला हुआ आतंकवाद मुक्त, इस महीने मारे गए 40 आतंकी

First published: 29 June 2020, 15:10 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी