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कश्मीर: ठंडी होती आग को हवा देंगे बर्ख़ास्त सरकारी कर्मचारी

कैच ब्यूरो | Updated on: 22 October 2016, 7:28 IST
QUICK PILL
  • कश्मीर में हड़ताल या हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ सरकारी मुलाज़िमों के पाए जाने की घटनाएं होती रही हैं. 
  • इनपर कार्रवाई भी होती है लेकिन बार-बार यूनियनों की दबाव में इन्हें छोड़ देना पड़ता है. 
  • हालांकि इस बार सरकार का रुख़ बेहद सख़्त है और वह कर्मचारियों के इस आंदोलन को पनपने से पहले की ख़त्म कर देना चाहिए. 

बात 1990 की है जब मार्च के महीने में कश्मीर आजादी के आंदोलन से उबल रहा था. तब राज्य सरकार ने कथिततौर पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 5 बिचौलिए नौकरशाहों को बर्खास्त कर दिया था. मगर कर्मचारी संगठन इसके विरोध में तुरंत हड़ताल पर चले गए. 72 दिन तक चली यह हड़ताल तभी समाप्त हुई, जब उन बर्खास्त नौकरशाहों को दोबारा बहाल किया गया.

बाद में कर्मचारियों ने श्रीनगर के पोलो व्यू ग्राउंड में विजय जुलूस निकाला, उनके बहाल हुए साथियों ने भी जुलूस को संबोधित किया. उनमें से एक थे नईम अख़्तर, जो अब पीडीपी के वरिष्ठ नेता और जम्मू कश्मीर के शिक्षा मंत्री हैं. 

1995 में भी सरकार ने कथित तौर पर उग्रवादी गतिविधयों में लिप्त कुछ कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था. हालांकि इस बार सरकार के आरोप सही थे, इसलिए किसी तरह का आंदोलन नहीं हुआ. 

अब एक बार फिर नब्बे के दशक जैसे हालात के चलते सरकार ने 12 सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया है. बदले में सरकार को एक और कर्मचारी आंदोलन के लिए तैयार हो जाना चाहिए. 

दोबारा 90 जैसे हालात

कर्मचारी संगठनों के एक समूह 'द एम्पलॉई ज्वाइंट एक्शन कमेटी' शनिवार को पहली मीटिंग करेगा जिसमें आगे की तैयारी की जाएगी. ईजैक प्रवक्ता फारुक अहमद ट्राली ने कैच को बताया ‘हम चाहते हैं सरकार अपना आदेश वापस ले. बिना कोई जांच किए कर्मचारियों को बर्खास्त करना मनमानी है.’

ईजैक अध्यक्ष अब्दुल कयूम वानी ने भी सरकार के इस कदम को गैरकानूनी और अन्यायपूर्ण बताया. साथ ही उन्होंने इन कर्मचारियों पर लगाए गए आरोपों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति के गठन की मांग की.

कुछ कर्मचारी नेताओं ने अपने स्तर पर ही कहा, 'उनके पास अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. एक कर्मचारी नेता ने कहा, ‘मनमाने आरोप लगा कर बिना किसी जांच के कर्मचारियों को बर्खास्त करना तानाशाही है. इसका विरोध तो हमें करना ही होगा. अच्छा होता कि सरकार पहले जांच करके आरोप साबित करती और फिर यह फैसला करती, तो हम मान भी लेते’.

शिक्षा मंत्री नईम अख्तर ने कैच से कहा, ‘काफी विचार-विमर्श के बाद यह फैसला किया गया है. कानून अपना काम करेगा और हम उम्मीद करते हैं कि कर्मचारी सहयोग करेंगे.'

सरकार सख़्त

वहीं मंगलवार को सरकारी आदेश में कहा गया है कि इन कर्मचारियों की गतिविधियां न केवल देश की एकता और अखंडता पर सवाल उठाती हैं बल्कि जम्मू-कश्मीर सरकार के कर्मचारी आचार अधिनियम 1971 का भी उल्लंघन करती हैं. उन्हें बर्खास्त न करने से न केवल गलत परंपरा बनेगी बल्कि राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

आदेश में सरकार ने कार्रवाई से पहले जांच न कराने के फ़ैसले को सही ठहराया है. इसमें कहा गया है कि मौजूदा हालात को देखते हुए गवाहों को सामने लाना ठीक नहीं होगा. हालांकि सरकार विभिन्न विभागों के कथिततौर पर निचले कर्मचारियों की पूरी तरह से पहचान नहीं कर सकी.

तो क्या कर्मचारी इस आदेश के खिलाफ हड़ताल करेंगे? अगर ऐसा होता है तो सरकार के सामने फिर एक नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. मुश्किल से तो राज्य में शांति बहाली के आसार दिख रहे हैं. 

हाल ही में यहां कुछ नकाबपोश गाड़ियों को अक्सर आग के हवाले कर दे रहे हैं, इसके बावजूद सड़कों पर प्राइवेट ट्रैफिक ज्यादा दिखाई देता है. इसी तरह आमतौर पर खाली पड़ी रहने वाली सड़कों पर ज्यादा लोग घूमते दिखाई देते हैं, जैसे लाल चौक श्रीनगर कॉमर्शियल हब, और छृट्टी वाले दिन रविवार को हुर्रियत के विरोध को धता बताते हुए रेजीडेंसी रोड पर घाटी का सबसे बड़ा हटवाड़ा लगता है. 

इस तरह के सामान्य हालात को देखते हुए सरकारी महकमों में शामिल कुछ लोगों सहित जनता कर्मचारियों को बर्खास्त करने की टाइमिंग पर सवाल उठा रही है. एक वरिष्ठ नौकरशाह ने कहा ‘अगर कश्मीर में फैली अशांति के दौरान यह आदेश आता तो समझा जा सकता था लेकिन अब जब हालात सामान्य हो रहे हैं, तब सरकार का ऐसा आदेश आना समझ से परे है.’

एक अन्य व्यक्ति ने कहा, जब आप एक लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हों, कर्मचारियों को बर्खास्त करने से राज्य में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इससे न सरकार का भला होगा और न ही अलगाववादियों का.

अफसर भी समाज का हिस्सा

सरकारी कर्मचारियों के हिंसा में शामिल होने की बात पर सीधेतौर पर कुछ नहीं बोलने वाले अलगाववादी भी इस मसले में कूद पड़े हैं. हुर्रियत ने एक बयान जारीकर कहा, ‘सरकारी कर्मचारियों को सिर्फ इसलिए सज़ा देना दुखद और अलोकतांत्रिक है कि उन्होंने सरकार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाई है.

हरेक को अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है और अगर सरकारी नौकरीपेशा लोगों ने ऐसा किया है तो यह गैरकानूनी नहीं है. कर्मचारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं. अपने आस-पास घट रही घ्टनाओं पर वे कैसे चुप बैठ सकते हैं.

इस बार सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए 7,000 लोगों को गिरफ्तार किया और मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज सहित 483 लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत नामजद किया है. रविवार को सरकार ने बारामुला में घर-घर छापेमारी कर 35 लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

घाटी में पिछले दिनो सुरक्षा बलों और सेना के बीच संघर्ष में सैंकड़ो लोग अंधे हो चुके हैं और 14000 लोग हताहत हुए हैं. ईजैक प्रमुख वानी  ने कहा, ‘हम सरकारी आदेश के खिलाफ जमकर लड़ेंगे और अगर सरकार बर्खास्त कर्मियों की बहाली नहीं करेगी तो स़ड़कों पर उतरेंगे'.

First published: 22 October 2016, 7:28 IST
 
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