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जाट आरक्षण आंदोलन: यह आग उत्तर प्रदेश तक फैल सकती है

अतुल चंद्रा | Updated on: 23 February 2016, 21:09 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में विधानसभा की करीब 136 सीटें आती हैं. यहां\r\n पर जाटों की जनसंख्या 17 प्रतिशत से कुछ अधिक होने के अलावा मुसलमानों की \r\nजनसंख्या भी 26 प्रतिशत है
  • 2012 के विधानसभा चुनाव में इस इलाके की 136 में से 26 सीटों पर मुसलमान \r\nउम्मीदवार जीते थे. 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगो के बाद से बीजेपी लगातार\r\n इस इलाके में सांप्रदायिकता का दांव खेल रही है. धुवीकृत समाज का सीधा फायदा भाजपा की प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) को भी मिलता है

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट भी हरियाणा में आरक्षण की मांग कर रहे समुदाय के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर जाटों का व्यापक प्रभाव है.

आरक्षण को लेकर उनका रुख अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव पर असर डाल सकता है. आरक्षण के लिये जाटों का आंदोलन पूरे हरियाणा में फैलने के साथ ही इसकी धमक उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में भी महसूस होने लगी है.

जाट समुदाय के लोग उत्तर प्रदेश में भी आरक्षण को लेकर खुलकर सामने आ गए हैं. राज्य सरकार को प्रदेश की कानून-व्यवस्था के खराब होने की संभावना के मद्देनजर चाक-चौबंद रहना होगा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक प्रभाव रखने वाली कुछ खाप पंचायतों के यातायात इत्यादि को बाधित करने के फैसले के चलते हरियाणा की सीमा से सटे कैराना और बदौली चेक पोस्टों पर उत्तर प्रदेश सरकार ने एहतियातन अर्धसैनिक बलों और पीएसी के जवानों की तैनाती की है.

भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत हरियाणा के जाटों की मांग के समर्थन में सामने आए और कहा, ‘‘या तो आरक्षण को पूरी तरह से समाप्त किया जाए या फिर जाटों को भी इसका फायदा दिया जाए.’’

भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने हरियाणा के जाटों की मांग का समर्थन किया है

दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत का कहना है कि वे अपने क्षेत्र की जनता पर दो दिनों से अधिक नियंत्रण नहीं कर सकते. उन्होंने आगे कहा, ‘‘केंद्र सरकार को बातचीत के जरिये इस समस्या को सुलझाने की पहल करनी चाहिये. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें इसका नतीजा भुगतना होगा.’’

‘‘नतीजे भुगतने’’ से टिकैत का सीधा आशय प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में इस आंदोलन के होने वाले प्रभाव से है.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती भी इस मौके को लपकने से पीछे नहीं रहीं. उन्होंने भी आंदोलनकारी जाटों को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी. उन्होंने हरियाणा में प्रदर्शनकारी जाटों पर पुलिस की गोलीबारी की खुलकर निंदा करते हुए कहा कि अब इस समुदाय के लोगों को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पर विश्वास नहीं रहा है.

रविवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक प्रेस नोट जारी कर उन्होंने कहा, ‘‘बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही जाटों के साथ अन्याय किया है. दोनों ही पर्टियां आरक्षण के मुद्दे पर जाटों को लगातार झूठे आश्वासन देती आई हैं.’’

उन्होंने ‘‘अपने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलवाने के लिये’’ आंदोलनकारी जाटों से शाांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन जारी रखने की अपील की. मायावती ने जाटों के आरक्षण की मांग को उचित बताते हुए एक तीर से दो निशाने साधाने का प्रयास किया है.

मायावती ने जाटों के आरक्षण की मांग को उचित बताते हुए इसका समर्थन किया है

उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में विधानसभा की करीब 136 सीटें आती हैं. इसके कारण यह इलाका हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है. यहां पर जाटों की जनसंख्या 17 प्रतिशत से कुछ अधिक होने के अलावा मुसलमानों की जनसंख्या भी 26 प्रतिशत है.

2012 के विधानसभा चुनाव में इस इलाके की 136 में से 26 सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार जीते थे. 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगो के बाद से बीजेपी लगातार इस इलाके में सांप्रदायिकता का दांव खेल रही है. इस धुवीकृत समाज का सीधा फायदा उसकी प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) को भी मिलता है.

वर्ष 2012 में सपा 58 सीटों के साथ इस क्षेत्र में अपना अपना व्यापक असर छोड़ने में कामयाब रही थी. अब तक शिवपाल यादव को छोड़कर पार्टी ने इस आंदोलन के समर्थन या विरोध में कोई भी अधिकारिक बयान जारी नहीं किया है. पार्टी की चुप्पी संदेहास्पद है.

सपा की तरफ से शिवपाल यादव को छोड़कर पार्टी में किसी ने इस आंदोलन के समर्थन या विरोध में कोई भी अधिकारिक बयान नहीं दिया है

सूबे के लोक निर्माण मंत्री और पार्टी के प्रवक्ता शिवपाल यादव ने जाट समुदाय को ओबीसी दर्जा दिये जाने के फैसले को खारिज किये जाने के खिलाफ जाट नेतृत्व को सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करने की सलाह दी है. उनका यह कदम मायावती के रुख के बिल्कुल उलट है.

शीर्ष अदालत ने बीते वर्ष जुलाई महीने में केंद्र सरकार की पुर्नविचार याचिक खारिज कर दी थी. दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी का दर्जा रद्द किये जाने के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें आरक्षित श्रेणी में बरकरार रखा है. दूसरी तरफ राजस्थान और हरियाणा ने इस प्रावधान को खत्म ही कर दिया है.

इस प्रावधान को चुनौती देने वाली एक याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है. रालोद के जयंत चैधरी का कहना है कि इस विषय को लेकर ‘‘अधिक स्पष्टता नहीं है.’’उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2000 में जाटों को शिक्षा और सरकार में आरक्षण प्रदान किया था.

चुनावी समीकरण

कांग्रेस प्रवक्ता सत्यदेव त्रिपाठी का कहना है कि इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ भी सपा के पक्ष में नहीं जाने वाला है. इस स्थिति में होने वाले संभावित फायदे के बाबत पूछे जाने पर वे क्रमवार बसपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल का नाम लेते हैं.

जयंत चैधरी का मानना है कि जाटों के आंदोलन के संभावित चुनावी असर के बारे में बात करना अभी जल्दबाजी होगा. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के पोते बीजेपी का जिक्र आते ही उस पर हमलावर हो जाते हैं.

‘‘पर्याप्त चेेतावनियों के बावजूद बीजेपी आलाकमान ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. सरकार को एक ऐसे तंत्र के साथ सामने आना चाहिये था जो स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इसे बिगड़ने से बचाता.’’

रालोद के जयंत चैधरी का मानना है कि जाटों के आंदोलन को संभावित चुनावों से जोड़ के देखना शायद जल्दबाजी होगा

‘‘इस पूरे मुद्दे को जाट बनाम गैर जाट का रंग देने का काम बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का है जिन्होंने स्थिति का अनुमान होने के बावजूद हरियाणा में एक गैर जाट को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने पर जोर दिया.’’

जैसे-जैसे राज्य में जाट बनाम गैर जाट का मुद्दा गर्माता जा रहा है विभिन्न राजनीतिक दलों को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी आगामी चुनावी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा.

First published: 23 February 2016, 21:09 IST
 
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