Home » इंडिया » Jayalalithaa dies, Tamil Nadu grieves: There will never be another Amma
 

अब ऐसी अम्मा दोबारा नहीं आएगी

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:41 IST
QUICK PILL
  • अगर आप लोगों से पूछें कि अम्मा को किसलिए सबसे ज्यादा याद रखा जाएगा, तो उनके पास कोई एक जवाब नहीं है. 
  • जहां आमजन की ज़िंदगी उन्होंने आसान बनाई, वहीं जब उनपर हमला हुआ तो घायल शेरनी की तरह लड़ीं और जीतीं. 

जे. जयललिता ने 2012 में सिमी ग्रेवाल को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मुझे भूलना आसान नहीं है. मुझे कई लोग प्यार करेंगे...मुश्किलें आने पर मैं भागने वालों में से नहीं हूं.’ संघर्षों से जूझना जयललिता की फितरत थी. 22 सितंबर 2016 को जब उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती किया था, वे अपनी बिगड़ी सेहत से जूझ रही थीं. पिछले महीने उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया था और अभी उन्हें हृदयाघात हुआ था. 

अम्मा ने ज़िंदा रहने के लिए ढाई महीने तक संघर्ष किया. हालत बेहद खराब होने के बावजूद, यह उनकी इच्छाशक्ति ही थी कि रोज़ अपनी तकदीर से मुकाबला करती रहीं. ‘मेरा जीवन ले लो, पर अम्मा को बचा लो,’ पार्टी की एक कार्यकर्ता ईश्वर से अरदास करती हुई सुबक-सुबक कर रो रही थीं. उनके आंसू बहे जा रहे थे लेकिन 5 दिसंबर की रात उन्होंने अंतिम सांस ली. 

पूरा तमिलनाडु शोक में डूबा है. यह कोई दिखावा नहीं है. अपनी अम्मा के जाने से तमिलवासी सच में दुखी हैं. उनसे इतना प्यार करते थे कि उन्हें 6 बार अपना मुख्यमंत्री बनाया. वे उन्हें अपना अजीज मानते थे. अम्मा केवल मुख्यमंत्री ही नहीं थीं. अखिल भारतीय अम्मा द्रविड़ मुन्नेत्र कडग़म की सुप्रीमो थीं, उनकी क्रांतिकारी नेता, जिसने अपनी चतुराई और चुनौती से तमिलनाडु की पितृसत्तात्मक राजनीति को उखाड़ फेंका और आमजन का जीवन हर तरह से बेहतर बनाने के लिए अपनी एजेंसी का उपयोग किया. 

शुरुआती साल

भीतर से नरम और बाहर से सख्त शख्सियत के पीछे एक औरत थी. एक ऐसी औरत, जिन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए याद किया जाएगा: उनमें मनचाहा बनने की दृढ़ता थी. 68 साल के जीवन में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे, बचपन एकाकी बीता, मां की ममता के लिए तरसती रहीं, इसके बावजूद पढाई में हमेशा अव्वल रहीं. पर उन्हें अपनी अकादमिक छात्रवृति छोडक़र घर चलाने के लिए एक्टिंग का कॅरियर अपनाना पड़ा. ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मैं एक बार कुछ करने की ठान लेती हूं, तो वह काम मुझे पसंद हो या नहीं, उसमें मुझे श्रेष्ठ ही रहना है और सबसे बढिय़ा करना है.’ और इसी तरह जयललिता आगे बढ़ती रहीं. एक शानदार स्टूडेंट से वे अपने समय की सबसे लोकप्रिय एक्ट्रेस बनीं.

1982 में एमजीआर के बुलाने पर जयललिता ने पार्टी की प्रवक्ता के तौर पर राजनीति में प्रवेश किया. 1984 में वे राज्यसभा में सांसद बनीं. उनके व्यक्तित्व में आकर्षण और जनता के बीच लोकप्रियता गजब की थी. लोगों की उम्मीदें काफी बन गई थीं. उन्होंने उनके लिए अपने बूते के बाहर काम किया. एमजीआर के साथ उनके रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे, पर उनके पास उनका कोई विकल्प नहीं था. और उन्हें आगे बढऩे का मौका मिलता रहा.

उनके जीवन का सबसे खराब लम्हा वह था, जब 1989 में उन्हें बदनाम किया गया. तमिलनाडु विधानसभा में डीएमके विधायकों ने विपक्ष के नेता के तौर उनके साथ हाथापाई की. बाल खींचे, साड़ी फाड़ी, जूतों और माइक से पीटा और वह भी तत्कालीन मुख्यमंत्री, उनकी दो पत्नियां, विधानसभा सदस्यों की मौजूदगी में. ये सब चुपचाप ‘तमाशा’ देखते रहे. उन्होंने कहा था, ‘फिल्मों में तो औरत उपभोक्ता वस्तु होती ही है. उन्होंने तो राजनीति में ही ऐसा करने की पूरी कोशिश की.’ 

उन्होंने घायल शेरनी की तरह वार किया. विधानसभा छोड़ते समय उन्होंने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के तौर पर लौटने का अपने आप से वादा लिया. दो साल में ही उन्होंने उस वादे को पूरा कर लिया. 1991 में वे तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. यह पित्तृसत्ता पर करारा तमाचा था. 1996 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप से नुकसान हुआ, पर 2001 में भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त होकर शानदार वापसी की. फिर 2011 में, और फिर 2016 में.

बेशर्त प्यार नहीं मिलता

अगर आप लोगों से पूछें कि अम्मा को किसलिए सबसे ज्यादा याद रखा जाएगा, तो उनके पास कोई एक जवाब नहीं है. आमजन के लिए वे सबकुछ थीं, जिन्होंने उनकी रोजमर्रा जिंदगी को आसान बनाया. अम्मा कैंटीन से लेकर अम्मा सॉल्ट तक, अम्मा वॉटर से लेकर अम्मा ग्राइंडर्स, अम्मा टेलीविजन, अम्मा लेपटॉप, बेबी किट्स, सीमेंट, बीज, पंखे, फार्मेसी, मोबाइल्स, कॉल सेंटर्स, सिनेमा, सब्जी की दुकानें, और काम करने वाली औरतों की सुविधा के लिए बस स्टॉप पर अम्मा ब्रेस्टफीडिंग कमरों तक, सब पर अम्मा के बड़े-बड़े चित्र लगे हैं.

निम्न और उच्च वर्ग के तमिलों के पास तो वह मुख्यमंत्री थीं, जो जानती थीं कि उन्हें क्या चाहिए. मानो उनकी अंगुलियां आपकी नब्ज पर हैं और वे आपकी हर जरूरत को पहले से जान लेती हैं. अम्मा ने ग्रेवाल को कहा था, ‘जब मेरी मां नहीं रहीं, मुझे जीवन का कोई अनुभव नहीं था, लगा जैसे जंगल में अकेली पड़ गई हूं. मैं नहीं मानती कि बेशर्त प्यार नाम की कोई चीज है दुनिया में.’

जाहिर है, कितना मुश्किल रहा होगा उनका सफर. और आज वो देखें कि उनके जाने से पूरा राज्य किस तरह शोक में डूबा है. आज उनका कद इतना बड़ा है कि उनकी क्षतिपूर्ति मुश्किल है. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे.

First published: 7 December 2016, 7:42 IST
 
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