Home » इंडिया » Jayalalithaa's remarkable journey: from Mysore's Komala to Tamil Nadu's Amma
 

जे. जयललिता: फिल्म से राजनीति तक सितारे की तरह जगमगाती रहीं

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 December 2016, 8:23 IST
(फाइल फोटो )
QUICK PILL
  • जयललिता जब अस्पताल के भीतर थीं तो पूरे तमिलनाडु में गहरी उदासी छाई थी. लोग उनकी तबियत को लेकर बेचैन थे. बेसब्री से उनके ठीक होने का इंतजार कर रहे थे, पर वे उनसे विदा ले चुकी थीं. 
  • तमिलनाडु की राजनीति में वे लगभग चार दशक तक छाई रहीं. फिल्मों की भी वे सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेत्री रहीं और उन्हें हमेशा प्रमुख भूमिकाएं मिलीं. 
  • वे राजनीति की सितारा बनेंगी या फिल्मों की, पहले से कुछ भी तय नहीं था. 

जयललिता जब दो साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया था. बचपन में उनका नाम कोमलावली था. उनकी मां उन्हें बेहद प्यार करती थीं, इसलिए उन्हें ग्लैमर की दुनिया से दूर रखना चाहा. उन्होंने कोमला को अच्छी पढ़ाई के लिए बंगलुरु भेजा. यहां से उन्होंने हाई स्कूल किया और आगे की पढ़ाई चेन्नई में. 

एक बार जयललिता अपनी मां के साथ फिल्मी पार्टी में गई थीं, जहां उनकी खूबसूरती से आकर्षित होकर एक निर्माता ने उन्हें कन्नड़ फिल्म ‘चिन्नाडा गोंबे’ (1964) में एक रोल ऑफर किया. एक साल बाद उन्होंने तमिल फिल्म ‘वेन्नीरादई’ (1965) से तमिल फिल्मों में डेब्यू किया. जब स्थापित एक्टर मरुधर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) ने ‘वेन्नीरादई’ में दर्शकों की भीड़ देखी, तो उनकी इच्छा जयललिता के साथ फिल्म करने की हुई. 

उन दोनों की पहली फिल्म ‘आदिमईप्पन’ (1969) ने कई रिकॉर्ड तोड़े और तमिलनाडु के मुख्य शहरों के सिनेमा हॉल सौ दिन तक ठसाठस भरे रहे. उनके उम्र में 31 साल के अंतर के बावजूद, दोनों के बीच गहरी मित्रता रही, जिसने आने वाले दिनों में तमिलनाडु का चेहरा बदल दिया. 

एमजीआर का साथ

तमिलनाडु में अक्सर रील और रियल लाइफ में अंतर नहीं रहता और इसकी वजह से कई फिल्मी सितारे अपने फिल्मी ग्लैमर और लोकप्रियता को भुनाने राजनीति में कूद पड़ते हैं. इसकी शुरुआत एमजीआर से हुई, जिन्होंने रॉबिनहुड जैसे किरदारों से लाखों दिलों पर राज किया. लाखों औरतें अपने पसंदीदा सुपरस्टार को वोट देने मतदान केंद्रों पर खिंची चली आईं.

1982 में जयललिता महज 34 साल की थीं जब उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में आने की घोषणा की थी. उस समय उन्होंने पहली बार कुडालोर की जनसभा में नारीत्व की महिमा पर एक सशक्त भाषण दिया था. उन्होंने वहां इकट्ठी भीड़, खासकर औरतों को, अपनी वाक्पटुता और वक्तृत्व कौशल से प्रभावित किया. जब वे मंच से उतरीं, जयललिता एक्टर से राजनेता में तब्दील हो चुकी थीं. इसी साल वे अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम में शामिल हुईं. 

प्रचार सचिव

कुडालोर में उनके भाषण से एमजीआर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके लिए एक नए पद का निर्माण किया और 1983 में प्रचार सचिव बनाया. यहीं से परदे की उनकी को-स्टार राजनीति की भी पार्टनर बन गईं. जयललिता अब एमजीआर के भरोसेमंद साथियों में थीं. फिल्म जगत के एक बड़े सितारे और मुख्यमंत्री के साथ उनकी नजदीकी कई लोगों को रास नहीं आई. उन्होंने उनके बारे में प्रेस के लिए कहानियां गढ़नी शुरू कर दीं और अरोप लगाया कि अगर मुख्यमंत्री उनके साथ रहेंगे, तो उनके राजनीतिक करियर को नुकसान हो सकता है.

एमजीआर भी इस जवान स्वतंत्र महिला के साथ से खुश नहीं थे. जयललिता के विरोधियों और एमजीआर की खुद की भी उन्हें साथ रखने की अनिच्छा से, उनके आपसी संबंध खराब होने लगे और उन्होंने अपने रास्ते अलग-अलग कर लिए. यह उनके बीच मतभेद का पहला दौर था. 

एमजीआर का शक गलत नहीं था

1984 में जब एमजीआर को हार्ट अटैक हुआ और वे अमरीका में थे, कहा जाता है कि जयललिता खुद को अगला मुख्यमंत्री बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिली थीं. इस खबर को काफी तूल दिया गया था, और जब बीमार एमजीआर चेन्नई लौटे, उन्होंने उनसे प्रचार सचिव और संसदीय पार्टी के उप नेता पद से हटा दिया. एमजीआर की इस कार्रवाई से नाराज जयललिता ने पार्टी में दरार डालने की धमकी दी. तब तक उन्होंने अपनी मंडली बना ली थी. एमजीआर को विवश होकर समझौते के लिए बुलाना पड़ा.

जयललिता ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि उनका अपना अलग अस्तित्व है और वे किसी से प्रभावित नहीं होंगी. उनके खट्ठे-मीठे रिश्ते एमजीआर के 1987 में निधन तक जारी रहे. 

सत्ता का संघर्ष

एमजीआर के निधन के बाद अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम में उनकी पत्नी जानकी के साथ सत्ता का संघर्ष चला, जो खुद को उनकी राजनीतिक विरासत का अधिकारी बता रही थीं. उनके निधन के दो हफ्ते बाद, जया के विरोधियों की सहायता से जानकी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. उन्हें तीन हफ्ते में अपना बहुमत सिद्ध करना था. जानकी सरकार महज 23 दिन चली और केंद्र सरकार ने यहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. चुनाव हुए, और जयल्लिता के नेतृत्व वाला गुट विधानसभा में विपक्ष की मुख्य पार्टी बना. बाद में उसी साल एआईएडीएमके के दोनों गुटों का विलय हो गया और उन्होंने जयललिता को अपना सर्वोच्च नेता मान लिया.

पर वह दरअसल बजट सत्र ही था, जिसने उनके राजनीतिक करियर को परवान चढ़ाया. बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री एम.करुणानिधि और जयललिता एक दूसरे पर बेहद गुस्सा हुए और विधानसभा में बेवकूफी भरी हाथापाई हुई. दोनों पार्टियों में लड़ाई छिड़ गई और जब जयललिता विधानसभा से बाहर निकल रही थीं, डीएमके मंत्री दुरुगई मुरुगन ने उनके साथ हाथापाई की. 

जाहिर है जयललिता इन सब स्थितियों से परेशान थीं. उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक वे औरतों के लिए पूरी तरह ताकतवार और सक्षम नहीं होंगी, विधानसभा में नहीं आएंगी. उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री के तौर पर ही लौटेंगी वरना नहीं. यहीं से करुणानिधि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बन गए. तमिलनाडु की राजनीति में बदले की राजनीति के युग की शुरुआत हुई.

जयललिता ने उस घटना का विधानसभा में अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया, और 1991 के चुनावों में मुहिम के दौरान भी. उन्होंने करुणानिधि को ‘दुर्योधन’ और मुरुगन को ‘दुशासन’ कहा, जिन्होंने विधानसभा में उनकी साड़ी फाडक़र चीरहरण का-सा दृश्य बना दिया था. वे मिथक से प्रेरित तमिलों के लिए द्रोपदी बन गई थीं. नतीजतन मतदाताओं ने 1991 के चुनावों में उन्हें शानदार जीत दी. 

पहला कार्यकाल विवादास्पद

उनकी पार्टी 164 सीटों पर जीती, 1989 से 137 सीटें ज्यादा, और एआईएडीएमके-कांग्रेस गठबंधन को 225 सीटें. इस जीत के साथ जयललिता एमजीआर की छाया से बाहर हो गईं और पार्टी की निर्विवाद नेता बनीं. 

24 जून 1991 को उन्हें राज्य की मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई. उनकी जीत ने उनके खिलाफ रहे सभी तर्कों को चुनौती दी. एक कन्नड़ ब्राहण और वह भी महिला, राज्य की पहली मुख्यमंत्री बनी, यह जातिगत राजनीति और सत्ता के सिंहासन पर बैठे पुरुषवादी द्रविड़ों के गले नहीं उतर रहा था.

मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल विवादों से भरा था, जब उनसे खर्चीली लाइफस्टाइल की लालसा में कुछ गलतियां हुईं. उन्होंने अपने दत्तक पुत्र की शादी में करोड़ों खर्च किए थे. उनके खिलाफ कट्टर समर्थकों तक ने सवाल उठाए थे. 

1996 के चुनावों में करुणानिधि ने भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाया और सभी भ्रष्ट लोगों को सामने लाने का वादा किया. इसके बाद वह 1996 में बुरी तरह हारीं, उन्हें अपनी सीट तक नहीं मिली. एआईएडीएमके को महज चार सीटें मिलीं. 160 सीटों का नुकसान हुआ.

सत्ता में आने के बाद डीएमके ने जयललिता, उनकी सहयोगी शशिकला नटराजन, परिवार के सदस्य, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और एआईएडीएमके के मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के 48 मुकदमे ठोंके. राज्य पुलिस द्वारा फाइल की गई चार्जशीट में दावा किया गया था कि जयललिता और उनकी तीन सहयोगियों के पास 66.65 करोड़ की संपति है. 

यह आरोप उनकी आय के ज्ञात स्रोत से मेल नहीं खा रहा था क्योंकि 1991 से 1996 तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने मेहनताने के रूप में सिर्फ एक रुपया महीना लिया था.

1997 में जब सतर्कता और भ्रष्ट्राचार विरोधी निदेशालय ने उनके निवास पर छापा डाला, उन्होंने वहां से 10,000 साड़ियां, 750 जोड़ी चप्पलें, घड़ियां और गहने जब्त किए, जिनमें हारों से जड़ा सोने का एक बेल्ट भी था. जयललिता और शशिकला कुछ दिनों के लिए सलाखों के पीछे रहीं. पर तत्कालीन सरकार की पूरी कोशिशों के बावजूद जयललिता के सहयोगी सरकारी गवाह नहीं बने और ना ही कोई सुराग दिया, जिससे वे फंस सकती थीं. 

राष्ट्रीय शोहरत

1990 का अंत, राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रिय पार्टियों के उदय का दौर था. (युनाइटेड फ्रंट गवर्नमेंट को याद करें). जयललिता ने भी इसे जल्द ही महसूस किया और केंद्र में सरकारों के साथ गठबंधन शुरू कर दिया. उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ गठबंधन किया, कभी उन्हें अपनी सुविधा से छोड़ती भी रहीं, इसलिए उन्हें ‘यू टर्न की रानी’कहा गया. वे अदला-बदली करती रहीं, और 1998 से लेकर 2002 तक कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा के साथ रहीं.

इसके बाद वे 1999 के आम चुनावों में कांग्रेस के साथ मिल गईं. जब वे 2001 में सत्ता में आईं, उन्होंने भाजपा के पास अपने आदमी भेजने शुरू कर दिए, जो केंद्र में गठबंधन सरकार की प्रमुख पार्टी थी. 2004 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया और एक सीट भी नहीं ले पाईं. फिर वे 2006 के राज्य चुनावों में हार गईं, और डीएमके वापस सत्ता में आ गई.

1991 में जब से जयललिता ने राज्य को अधिकार में लिया, दो प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से शासन में रहीं. 2011 में इतिहास ने फिर खुद को दोहराया और डीएमके के पांच साल के राज के बाद जयललिता भारी बहुमत से सत्ता में लौटीं. डीएमके नेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप, साथ ही उनके खराब शासन ने जयललिता को सत्ता में लौटने में मदद की. 2014 में जयललिता ने लोकसभा चुनावों में राज्य में भारी जीत हासिल की. उन्हें 39 में से 37 सीटें मिलीं, जबकि डीएमके को एक भी नहीं.

इस साल के शुरुआत में, 25 सालों में पहली बार बारी-बारी से राज करने का ट्रेंड टूटा. इस साल भी विधानसभा चुनावों में उनकी शानदार जीत बनी रही. उन्हें बहुमत मिला और वे लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. मगर इसके बाद वह अपनी पारी जारी नहीं रख सकीं और अंतिम विदा ले ली. 

First published: 10 December 2016, 8:23 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी