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झारखंडः 55 दिन, तीन पुलिसिया फायरिंग, सात मौतें

एन कुमार | Updated on: 25 October 2016, 8:07 IST
(अमित/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • बीते दो महीने में झारखंड सरकार और आदिवासियों के बीच तीन बार खूनी टकराव हो चुका है. 
  • पुलिस फायरिंग में अभी तक सात लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन 22 अक्टूबर को हुई आक्रोश महारैली के बाद सरकार के लिए नई किस्म की चुनौतियां पेश आने वाली हैं. 

पिछले तीन दिनों से झारखंड में हालात अराजकता की तरफ़ बढ़ रहे हैं. शनिवार को रांची में आदिवासियों की आक्रोश महारैली के बाद पुलिसिया फायरिंग में हुई एक आदिवासी की मौत के बाद यह तूफान उभरा है. 42 आदिवासी संगठनों के आहवान पर राज्य के भर के आदिवासियों का जुटान हुआ था. 

वे राजधानी के सबसे बड़े मैदान मोरहाबादी में सीएनटी/एसपीटी एक्ट में संशोधन प्रस्ताव और स्थानीय नीति में आदिवासियों के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर हुंकार भर रहे थे. 

वहीं झारखंड सरकार ने इस महारैली को विफल करने की हर मुमकिन कोशिश की. जिस दिन रांची में आक्रोश महारैली हुई, उसी दिन सरकार ने राजधानी में ग्रामीण विकास सम्मेलन करवाया और दूसरे प्रमुख एचईसी मैदान में मुख्यमंत्री रघुवर दास आदिवासियों के लिए लुभावनी घोषणाएं कर रहे थे. 

यहां रघुवर दास ने कहा कि दो लाख आदिवासी परिवारों को जमीन देंगे. हर साल 70 हजार को नौकरी देंगे. आदिवासी परंपरा की तरह स्थानीय स्तर पर शासन व्यवस्था चलानेवाले पड़हा, मांझी, परगनैत को मानदेय आदि देंगे. 

यह सरकारी आयोजन आक्रोश महारैली के दिन इसलिए रखा गया था ताकि महारैली की धार कम की जा सके. मगर झारखंड सरकार अपनी तमाम कोशिशों में कामयाब नहीं हो सकी. रांची में आदिवासियों की विशाल रैली हुई और राजधानी से करीब 50 किलोमीटर दूर मुरहू के सायको बाजार में पुलिस-पब्लिक टकराव में एक आदिवासी अब्राहम मुंडा की मौत हो गई. 

बढ़ता टकराव

पहले से ही गोला गोलीकांड, बड़कागांव गोली कांड से किरकिरी करवा चुकी रघुवर सरकार के लिए सायको गोलीकांड तीसरा बड़ा दाग है. माना जा रहा है कि आनेवाले दिनों में रघुवर दास की सरकार और आदिवासियों के बीच टकराव तेज़ होगा.

सायको चूंकि खूंटी-मुरहू के इलाके में आता है, जो पीएलएफआई जैसे उग्रवादी संगठन का गढ़ है, इसलिए आनेवाले दिनों में सायको कांड के बहाने पीएलएफआई ग्रामीणों को गोलबंद कर दूसरे किस्म की घटनाओं को अंजाम देना-दिलवाना भी शुरू कर सकता है. 

पुलिस-आदिवासी संघर्ष से पहले सायको बाज़ार में आदिवासियों ने एएसपी अभियान अनुराग राज और थाना प्रभारी को बंधक बना लिया था. बाद में जब डीएसपी आनंद लागोरी पुलिसबल के साथ आये तो टकराव शुरू हुआ. डीएसपी आनंद लागोरी का दावा है कि उनपर भी हॉकी स्टिक और रॉड से हमला किया गया.

 झारखंड पुलिस मुख्यालय के प्रवक्ता और आईजी अभियान एमएस भाटिया का कहना है कि पुलिस को आत्म रक्षा में गोली चलाई. भाटिया का यह भी दावा है कि आदिवासियों की भीड़ में माओवादी और पीएलएफआई जैसे उग्रवादी संगठन के कार्यकर्ता भी भारी संख्या में थे. 

सायको कांड का असर सूबे में साफ़ देखा जा सकता है. गुस्साए आदिवासियों ने रविवार को पारंपरिक हथियारों के साथ खूंटी जिला मुख्यालय पर अधिकारियों के आवास को घेर लिया और फिर सोमवार को भी झारखंड बंद करवाने की कोशिश की. 

2 महीने में तीसरी फायरिंग

पिछले 55 दिनों में झारखंड में पुलिस फायरिंग की यह तीसरी घटना है जिनमें सात लोगों की जान जा चुकी है. सरकार इन गोलीकांडों ने उपजे गुस्से को कुचलने की कोशिश कर रही है लेकिन अब इसे दबा पाना इतना आसान नहीं दिख रहा है. 

आदिवासी मामलों के जानकार अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि झारखंड की सरकार छत्तीसगढ़ मॉडल पर शासन और विकास चाहती है, आदिवासियों को निशाने पर ले रही है, रक्तरंजीत भविष्य साफ दिख रहा है.  सायको बाज़ार कांड इसलिए भी अलग है क्योंकि यह रैली राजनीतिक दलों की नहीं बल्कि 42 आदिवासी संगठनों के बैनर तले हुई थी. 

इसमें सुदूर इलाके से आदिवासी भारी संख्या में शामिल हुए थे. इस रैली में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, पूर्व मंत्री और फिलहाल बाबूलाल की पार्टी से ही जुड़े बंधु तिर्की, कांग्रेसी नेता देवकुमार धान, कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू, माओवादी के बाद नेता बने पौलुस सुरीन, आदिवासी कार्यकर्ता दयामनी बरला, प्रमुख आदिवासी बुद्धिजीवी प्रो करमा उरांव जैसी हस्तियों ने भी हिस्सा लिया. 

ख़तरे की घंटी

दयामनी बरला कहती हैं कि जो भी लोग जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं, सरकार उन्हें नक्सली कह दे रही है मगर यह छत्तीसगढ़ नहीं है, पांचवीं सूची का इलाका है और सरकार याद रखे कि हम भी सरकारी गाड़ियों को, सरकारी लोगों को गांव में नहीं घुसने देंगे. ऐसा जल्द होगा जब सरकार की पहुंच गांवों से कट जाएगी. बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि रघुवर सरकार के लिए यह खतरे की घंटी है. 

वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास सीएनटी, एसपीटी एक्ट पर तैयार हो रहे विरोधी राजनीति की बात को एक लाइन में खारिज कर देते हैं मगर अंदर ही अंदर भाजपा में भी नाराज़ आदिवासी नेताओं की गोलबंदी हो रही है. 22 अक्तूबर की आक्रोश महारैली में भी भाजपा नेता गंगोत्री कुजूर की बैकडोर भूमिका बताई जाती है.

माना जा रहा है कि झारखंड में भाजपा के आदिवासी नेता अंदर ही अंदर रघुवर के खिलाफ विरोध की ज़मीन करने में लगे हुए हैं. रघुवर दास को स्थानीय नीति का एलान किसी विपक्षी पार्टी के दबाव में नहीं बल्कि अपने ही दल के आदिवासी नेताओं की मांग और दबाव पर करना पड़ा था. 

First published: 25 October 2016, 8:07 IST
 
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