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झारखंड माओवादी हमला: यह अंत है या नए अध्याय की शुरुआत?

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 January 2016, 23:48 IST
QUICK PILL
  • झारखंड में हुए इस नक्सली हमले पर पुलिस और प्रशासन के लोग करीब चार घंटे तक परदा डालते रहे. पहले यह \r\nबताया गया कि कोई जवान मरा नहीं है, बस दो जवान गंभीर रूप से घायल  हैं. अंततः पुलिस ने रात में कबूला कि इस हमले में सात पुलिसवाले मारे गये हैं.
  • इससे पहले झारखंड के हजारीबाग में माओवादियों ने ऐसे ही हमले में पुलिस के 14 जवानों की हत्या कर दी थी. झारखंड के \r\nराज्य बनने के बाद से अब तक अलग-अलग माओवादी घटनाओं में 487 पुलिसवाले शहीद हो \r\nचुके हैं.

26 जनवरी को झारखंड एक अलग रंग में था. इस दिन केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर झारखंड की राजधानी रांची में एक पहाड़ी पर दुनिया का सबसे ऊंचा तिरंगा लहराकर रक्षा विश्वविद्यालय का उद्धाटन करने गये थे. राज्य के मुख्यमंत्री रघुबर दास इसे अपने एक साल के कार्यकाल की अहम उपलब्धि गिना रहे थे.

इसके अगले दिन यानि 27 जनवरी को एक दूसरे महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी रांची पहुंचकर योजनाओं की झड़ी लगा रहे थे.

गडकरी मंच पर उसी अंदाज में थे, जिस अंदाज में विधानसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के आरा में लोगों से पूछ रहे थे कि बताओ कितने का पैकेज दे दूूं, एक करोड़ का, दस करोड़ का, पचास करोड़ का, सौ करोड़ का या ज्यादा का...! गडकरी भी उसी तरह से रांची में बोल रहे थे कि आज जो मांग लो, सब दे दूंगा, यहीं इसी मंच से. उन्होंने पांच हजार करोड़ रुपये की योजना की घोषणा कर दी.

27 जनवरी को दिन में यह सब घट रहा था लेकिन शाम होते-होते कहानी नकारात्मक मोड़ लेने लगी. उपलब्धियों का बखान करने में लगी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती आन पड़ी. राजधानी रांची से 200 किलोमीटर दूर बिहार-झारखंड की सीमा पर भाकपा माओवादी के गुरिल्लाओं ने पुलिस वाहन को विस्फोट में उड़ा दिया. इसमें सात जवानों की जान चली गई.

भाकपा माओवादी के गुरिल्लाओं ने पलामू में पुलिस वाहन को विस्फोट में उड़ा दिया. जिसमें सात जवानों की जान चली गई

खबर जंगल की आग की तरह फैली लेकिन पुलिस और प्रशासन के लोग करीब चार घंटे तक इस पर परदा डाले रहे. पहले यह बताया गया कि कोई जवान नहीं मरा है, बस कुछ गंभीर घायल हुए हैं, दो की हालत गंभीर है. घंटे भर बाद पुलिस ने कहा कि दो पुलिसवाले मारे गये हैं.

आखिरी में दबाव बढ़ता गया तो पुलिस ने रात करीब साढ़े दस बजे कबूला कि सात पुलिसवालों को माओवादियों ने उड़ा दिया है. यह घटना झारखंड के पलामू जिले में कालापहाड़ी नाम के इलाके में घटी.

वहां पर पिछले दो तीन दिनों से भाकपा माओवादी और नक्सली संगठन टीपीसी यानि तृतीय प्रस्तुति कमिटी के लोगों के बीच मारपीट और टकराव की खबरें आ रही थीं. 26 जनवरी की रात को भी कथित तौर पर टीपीसी और भाकपा माओवादियों के बीच झड़प हुई थी. कहा जा रहा है कि 27 जनवरी की सुबह माओवादियों की भिड़ंत पुलिस से भी हुई थी.

उसके बाद भाकपा माओवादी के लोगों ने पुलिस तक यह सूचना पहुंचायी कि इस मुठभेड़ में नक्सलियों की हत्या भी हुई है और उनकी लाश पड़ी हुई है. यह माओवादियों का ट्रैप था जिसमें स्थानीय पुलिस फंस गई.

सूत्र बता रहे हैं कि पुलिसवाले माओवादियों की लाश तलाशते हुए उस इलाके में पहुंचे थे. कालापहाड़ी इलाके से लौटते हुए पुलिसवालों की गाड़ी नक्सलियों द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंग की चपेट में आ गई. जानकार इसे पुलिस की चूक बता रहे हैं.

पुलिसवाले टाटा 407 गाड़ी में सवार थे. नक्सल प्रभावित इलाकों में इस तरह की बंद गाड़ियों के इस्तेमाल की मनाही है, लेकिन पलामू पुलिस ने इस पर ध्यान नहीं दिया. बंद गाड़ी में पुलिस को ट्रैप करना माओवादियों के लिए हमेशा आसान रहा है.

कुछ साल पहले झारखंड के ही हजारीबाग में माओवादियों ने ऐसे ही पुलिसवालों को बंद गाड़ी को ट्रैप कर उड़ा दिया था, जिसमें पुलिस के 14 जवान मारे गये थे. झारखंड के राज्य बनने के बाद से अलग-अलग माओवादी घटनाओं में 487 पुलिसवाले शहीद हो चुके हैं.

झारखंड के राज्य बनने के बाद से अलग-अलग माओवादी घटनाओं में 487 पुलिसवाले शहीद हो चुके हैं

पलामू में हुई इस घटना से यह भी साफ हुआ है कि पुलिस के आलाअधिकारी किस तरह से नक्सलियों से लड़ने की तैयारी में हैं. पलामू में पांच एंटी लैंड माइंस वाहन हैं लेकिन एक भी चालू हालत में नहीं है. इसीलिए पुलिसवालों को साधारण 407 बस से नक्सलियों से लड़ने के लिए जाना पड़ा.

आश्चर्य की बात यह है कि पांचों एंटी लैंड माइंस वाहन टायर के अभाव में बेकार से पड़े हुए हैं. टायर का हाल यह है कि 2014 में पुलिस मुख्यालय की ओर से पलामू के एंटी लैंड माइंस वाहन के लिए नौ टायर उपलब्ध कराये गये थे लेकिन उनमें से सिर्फ दो टायर ही मुख्यालय से लाये गये थे. बाकि टायर दो साल से पुलिस मुख्यालय में ही पड़े हुए हैं.

इस हमले पर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी. नक्सलियों ने कायरता का परिचय दिया है और हम ऐसे घड़ी में शहीद व घायल पुलिसर्मियों के परिजनों के साथ हैं. इलाज में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी.

राज्य के मुख्यमंत्री जब जवानों के पक्ष में यह बयान दे रहे थे, तब रांची में इलाज कराने पहुंचे घायल पुलिस जवानो के साथ दूसरे तरीके का ट्रीटमेंट हो रहा था. घायल पुलिसकर्मियों को इलाज के लिए रांची के मेडिकल अस्पताल लाया गया, जहां उनका हाल-चाल पूछने के लिए कोई पुलिस अधिकारी नहीं गया, जबकि 27 की रात पुलिस के सभी आलाधिकारी रांची में ही थे.

हमले में घायल पुलिसकर्मियों को इलाज के लिए रांची के मेडिकल अस्पताल लाया गया, जहां उनका हाल-चाल पूछने के लिए कोई पुलिस अधिकारी नहीं था

मुख्यमंत्री तो खैर बयान जारी कर फर्जअदायगी कर चुके थे. राज्य के डीजीपी डीके पांडेय कहते हैं, 'काला पहाड़ में हुई घटना हमारी चूक है. पुलिस प्रमुख होने के नाते इस चूक की जिम्मेदारी हम लेते हैं. हम वहां शीघ्र ही पुलिस कैंप की स्थापना करेंगे.

डीजीपी पांडेय कहते हैं कि 'पुलिस के पास संसाधन की कमी नहीं है, हम 2016 में नक्सलियों का सफाया पूरी तरह से कर देंगे.' सीएम और डीजीपी के बयानों के इतर इस वारदात में कुछ दूसरे संकेत भी छिपे हुए हैं. पहला संकेत तो यह कि भाकपा माओवादी को झारखंड में खत्म सा मान लिया गया था, लिहाजा अब एक बार फिर से पुलिस और माओवादियों के बीच एक टकराव की शुरुआत होगी. इसके अलावा इस इलाके में माओवाद के नाम पर चलनेवाले तमाम संगठनों के बीच भी जंग की शुरुआत हो सकती है.

जिस झारखंड में लगातार यह कहा जा रहा था कि यहां आॅपरेशन सारंडा और दूसरे किस्म के पुलिसिया आॅपरेशन चलाने के बाद माओवादी गतिविधियां तेजी से कम हुई हैं, उसमें लगभग 11.67 प्रतिशत की कमी आयी है, वहां वर्षों बाद इतनी बड़ी घटना घटी.

इसके पहले लोकसभा चुनाव के दौरान गोड्डा में माओवादियों ने दो पुलिसवालों की जान ली थी. एक दूसरी नई बात यह हुई कि यह घटना पलामू में वर्षों बाद घटी, जो कभी माओवादियों का चर्चित मांद हुआ करता था लेकिन पिछले कई सालों से लगभग वहां शांति थी. पलामू में बड़ी घटनाएं बंद-सी हो गयी थी.

पलामू कभी माओवादियों का चर्चित मांद हुआ करता था लेकिन पिछले कई सालों से वहां शांति थी और इस तरह की बड़ी घटनाएं बंद-सी हो गयी थी

एक दूसरा सवाल भाकपा माओवादियों पर उठता है. सवाल यह कि आखिर पलामू के कालापहाड़ इलाके में अपने प्रतिद्वंद्वी संगठन टीपीसी से लड़ने में व्यस्त भाकपा माओवादियों ने अचानक पुलिस पर निशाना क्यों साधा?

जानकारों के मुताबिक झारखंड में भाकपा माओवादी के सक्रिय सदस्य अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका दायरा सिमट गया है. सारंडा के इलाके में आॅपरेशन सारंडा चलाये जाने के बाद उन्हें उस चर्चित गढ़ को छोड़ना पड़ा था.

रांची के आसपास के इलाके में पीएलएफआई यानि पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे छद्म नक्सली संगठन ने अपने दायरा मजबूती से फैलाया है. ये संगठन दूसरे धंधे भी करने लगे हैं.

चतरा-हजारीबाग जैसे इलाके में माओवादियों की लड़ाई टीपीसी जैसे संगठन से रही है और टीपीसी वाले माओवादियों पर भारी पड़ते रहे. टीपीसी, पीएलएफआई तो माओवादियों को कमजोर करनेवाले संगठन ही माने जाते हैं.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में करीब 76 माओवादी संगठन सक्रिय हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि ज्यादातर अपने -अपने इलाके में छद्म माओवादी नामों के साथ उगाही का काम करते हैं और आपराधिक घटनाओं के जरिये दहशत फैलाते रहते हैं. इसका सबसे ज्यादा नुकसान माओवादियों को ही हुआ है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में करीब 76 माओवादी संगठन सक्रिय हैं

आज झारखंड में माओवादियों का बचाखुचा आधार पलामू इलाके में ही रह गया है. माओवादियों ने पलामू में पुलिसवालों को उड़ाकर अपने दहशत को मजबूती से फैलाने की कोशिश की है ताकि उनका आखिरी इलाका बचा रहे.

पुलिसवालों को निशाने पर लेकर माओवादियों ने एक साथ दोनों को ही संकेत दिया है कि वे अब भी पूरी तरह से झारखंड से आउट नहीं हुए हैं. पुलिसवालों पर इस बड़े हमले से भाकपा माओवादी अरसे बाद फिर से चर्चा में आ गया है.

झारखंड में इतने नक्सली संगठनों के खड़ा होने की वजह सिर्फ और सिर्फ लेवी वसूली को माना जाता है. टीपीसी और पीएलएफआई ने लेवी के धंधे में अपने को सबसे आगे कर लिया है. टीपीसी के बारे में यह धारणा है कि उसे पुलिस के समर्थन से ही खड़ा किया गया है ताकि वे भाकपा माओवादियों से लड़ाई लड़कर उन्हें कमजोर कर सके.

झारखंड में नक्सली संगठनों के खड़ा होने की वजह सिर्फ और सिर्फ लेवी वसूली को माना जाता है

यह भी माना जा रहा है कि पलामू की घटना के बाद एक बार फिर से विभिन्न नक्सली संगठनों के बीच आपसी संघर्ष तेज होगा. पलामू में जंगल का फैलाव ज्यादा है. चतरा के कोल माइंस इलाके में टीपीसी की मजबूती के बाद भाकपा माओवादी किसी तरह पलामू को अपने पास बचाये रखना चाहता है ताकि झारखंड में सक्रिय रहने और असतित्व बनाए रखने का एक मजबूत आधार बना रहे. टीपीसी किसी तरह पलामू से भी माओवादियों को आउट कर अपने धंधे और दायरे का विस्तार चाहती है.

First published: 29 January 2016, 23:48 IST
 
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