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झारखंड पुलिस: मजदूरों के खिलाफ कोयला माफियाओं का सुलभ औजार

एन कुमार | Updated on: 4 October 2016, 8:05 IST

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास पिछले दिनों झारखंड के आलाधिकारियों के साथ अमेरिका में थे. वे अपने राज्य में निवेश लाने के लिए बड़े व्यापारियों को बुलाने के मकसद से विदेश गये थे.

इस बाबत अखबारों के पहले पन्ने पर उनकी और अधिकारियों की तसवीर और खबर छप रही थी, साथ में विज्ञापन भी छप रहे थे. लेकिन जिस दिन वे अधिकारियों के संग अमेरिका से लौटे अखबारों के पहले पन्ने की तस्वीर बदल गयी और उनका स्वागत हुआ बड़कागांव की खबर से.

अमेरिका से लौटने के बाद मुख्यमंत्री रघुवर दास को अपनी उपलब्धियों का बखान करने का मौका भी नहीं मिला. मुख्यमंत्री और तमाम अधिकारी आते ही बड़कागांव कांड को सुलझाने में उलझ गये हैं. बड़कागांव में एनटीपीसी कोयले का खनन कर रही है. वहां छिटपुट टकराव बीते कई माह से सुनने को मिल रहे थे. लेकिन इस बार टकराव ने अलग रंग ले लिया.

थाने में स्थानीय विधायक की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर पुलिस ने गोलीबारी की जिसमें चार ग्रामीणों की जान चली गई. मारे गये लोग स्थानीय कांग्रेसी विधायक निर्मला देवी को पुलिस-प्रशासन के कब्जे से छुड़ाने के लिए पहुंचे थे. निर्मला देवी वर्तमान में बड़कागांव की विधायक हैं. इसके पहले उनके पति योगेंद्र साव विधायक रहे हैं जिनकी छवि बाहुबली की रही है.ग्रामीणों की मौत के बाद से निर्मला और उनके पति योगेंद्र साव गायब हैं. विधायक समर्थकों का कहना है कि पुलिस ने उन्हें गायब कर रखा है. पुलिस के अधिकारी इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं. रविवार को मुख्य सचिव, डीजीपी समेत राज्य के तमाम आलाधिकारी वहां का दौरा कर चुके हैं. नेताओं की आवाजाही भी बढ़ रही है, लेकिन प्रशासन किसी को वहां नहीं जाने दे रहा.

घटना की पृष्ठभूमि

घटना के बारे में जानकारी यह मिली है कि बीते 15 सितंबर से स्थानीय विधायक निर्मला देवी अपने सर्मथकों के साथ वहां कफन सत्याग्रह नाम से धरना आयोजित कर रही थीं. करीब 15 दिनों तक यह धरना चला. उस इलाके में एनटीपीसी त्रिवेणी कोल कंपनी के साथ मिलकर कोयले का खनन करती है.

एनटीपीसी ने 30 सितंबर को पुलिस में मामला दर्ज कराया कि विधायक और उनके लोग एनटीपीसी के काम में बाधा पहुंचा रहे हैं. रात करीब दो बजे सर्किल आॅफिसर वहां पहुंचे. एएसपी कुलदीप भी पहुंचे. विधायक को गिरफ्तार कर वहां से ले जाया जाने लगा जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया, लेकिन पुलिस ने विधायक को गाड़ी पर बिठा लिया.

करीब दो किलोमीटर आगे जाकर विधायक के करीब सौ समर्थकों ने पुलिस की गाड़ी को घेर लिया. दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक शुरू हो गई. हजारीबाग के एसपी भीमसेन टूटी बताते हैं, 'जो लोग पुलिस की गाड़ी घेरने आये थे वे उग्र होकर पुलिस गाड़ी पर पथराव करने लगे.

इस पथराव में एएसपी कुलदीप, सर्किल आॅफिसर शैलेश कुमार समेत कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गये. कोई रास्ता नहीं बचा तो पुलिस टीम ने बचाव में फायरिंग की जिससे चार लोगों की मौत हुई.'

एसपी भीमसेन टूटी जो बात कहते हैं, उसी बात को कई पुलिस अधिकारी दोहराते हैं. दूसरी ओर ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस ने अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी. उनकी संख्या ज्यादा थी तो वे लोगों को मारने-पीटने लगे, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई.

यहां तक कहानी तो समझ आती है लेकिन एक दूसरा सवाल भी उठ रहा है, जिसका जवाब अभी कोई नहीं दे रहा. बताया जा रहा है कि इस लड़ाई में ग्रामीणों को बेवजह मोहरा बनाकर बली चढ़ा गिया गया.

असल लड़ाई कोयला खनन में वर्चस्व को लेकर थी, जिसमें एक ओर विधायक के पति योगेंद्र साव का गुट था तो दूसरी ओर एनटीपीसी ने त्रिवेणी कोल कंपनी के जरिये एक कुख्यात गैंग का सहयोग लेना शुरू कर दिया था.

बताया जा रहा है कि त्रिवेणी कोल कंपनी ने मशहूर सुशील श्रीवास्तव गैंग के सहयोग से कोयला खनन का काम शुरू किया था. सुशील श्रीवास्तव उस इलाके का कुख्यात अपराधी था, जिसकी हत्या विगत वर्ष हजारीबाग कोर्ट परिसर में हो गयी थी. अब उसके नाम पर उसके गैंग के लोग कोयले के खनन में दबंगई करते हैं.

इसकी पुष्टि इस बात से भी हुई कि रविवार को जब मुख्य सचिव, डीजीपी समेत तमाम बड़े अधिकारी घटना स्थल पर पहुंचे तो उन्होंने एनटपीसी और त्रिवेणी कोल कंपनी के अधिकारियों को फटकार भी लगायी कि समानांतर संगठन खड़ा करने की कोशिश न करें. हालांकि यह बात ज्यादा उछली नहीं.

झारखंड की पुलिस क्यों हो गयी है ऐसी?

बड़कागांव का मामला चर्चा में है. प्रशासन की कोशिश है कि यह जल्द से जल्द ठंडा हो जाय. हजारीबाग के जिला पदाधिकारी उपायुक्त रविशंकर शुक्ल कहते हैं कि राज्य के सभी बड़े पदाधिकारी इस मामले में खुद पहल कर रहे हैं और जल्द ही जांच के बाद सारी बातें सामने आ जाएंगी.

प्रशासन को हड़बड़ी इसलिए है क्योंकि बीते एक माह में यह दूसरा मामला है, जब झारखंड की पुलिस गोलीबारी में आम जनता की जान गई है. इसके पहले हजारीबाग से ही सटे रामगढ़ जिला के गोला में पुलिस ने 29 अगस्त को इनलैंड पावर कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर एक आईएएस अधिकारी के आदेश पर गोलीबारी की थी, जिसमें दो लोग मारे गए थे. वहां भी पुलिस ने यही तर्क दिया था कि भीड़ अनियंत्रित हो गयी थी, इसलिए गोलीबारी करनी पड़ी.

दिलचस्प बात यह है कि बड़कागांव की तरह ही गोला में भी कोयले के खनन और सप्लाई के धंधे पर कब्जे को लेकर टकराव हुआ जिसमें आम लोगों की जान गई.

झारखंड में करीब छह दर्जन संगठन नक्सल के नाम पर सक्रिय हैं, जो अलग-अलग इलाके में लेवी वसूलने का काम करते हैं

सवाल यही उठता है कि क्या झारखंड का खुफिया तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है, जो यह भी पता नहीं कर पा रहा कि जहां पर धरना-प्रदर्शन आदि हो रहे हैं, उसका मकसद क्या है और कौन लोग पीछे से हैं? और दूसरा बड़ा सवाल यह है कि पुलिस इतनी जल्दी अपना आपा क्यों खोती है?

इस सवाल का जवाब हमने राज्य पुलिस के प्रवक्ता और आईजी एमएस भाटिया से जानना चाहा तो उन्होंने बताया, 'अगर बड़कागांव कांड को जानिएगा तो पता चलेगा कि पुलिस पर इस तरह अचानक अटैक होने लगा कि आत्मरक्षार्थ गोलियां चलानी पड़ी. 17 पुलिसकर्मी और अधिकारी घायल हो गये, तब पुलिस ने गोली चलायी.'राज्य डीजीपी डीके पांडेय कहते हैं कि मामले की जांच चल रही है, उसके बाद ही सही-सही कुछ बता पाना संभव हो पायेगा.

सभी पुलिस पदाधिकारियों के जवाब एक जैसे हैं लेकिन राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि आत्मरक्षार्थ एक ऐसा शब्द है, जिसे आसानी से प्रयोग में ला दिया जा रहा है जबकि यह सीधे-सीधे राज्य शासन की विफलता है. पुलिस के पास एक बड़ा तंत्र होता है. बड़कागांव में 15 दिनों से कफन सत्याग्रह नाम से धरना चल रहा था. क्या वहां की पुलिस को इसकी खबर नहीं थी कि विधायक क्यों धरना दे रही है? क्या पुलिस यह पता नहीं लगा सकी कि विधायक के पति किसलिए कुख्यात रहे हैं. बड़कागांव हो या गोला गोलीकांड, पुलिस क्यों यह पता नहीं कर सकी कि जो आमलोग सामने लाये गये हैं, वे ढाल की तरह इस्तेमाल किये जा रहे हैं.

अब क्या होगा आगे?

राजनीतिक तौर पर देखें तो बड़कागांव कांड का असर बहुत दूर तक नहीं जाएगा, क्योंकि झारखंड के प्रायः सभी राजनीतिक दल किसी घटना पर तुरंत बयान देने के बाद फिर अपने काम में लग जाते हैं. कोई आंदोलन नहीं होता. बड़कागांव कांड के बाद भाकपा माले जैसी पार्टी सक्रिय है, जो प्रतिवाद मार्च निकालने के साथ ही जमीनी स्तर पर इसे राजनीतिक मसला बनाने की कोशिश में लगी हुई है.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी राजनीतिक बयान देने के साथ ही घटना की जांच की मांग कर रहे हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों के बयान आ रहे हैं. लेकिन राजनीतिक पार्टियों के बयान से शायद आंदोलन खड़ा न हो.

बड़कागांव कांड को जानिएगा तो पता चलेगा कि पुलिस पर इस तरह अचानक अटैक होने लगा कि आत्मरक्षार्थ गोलियां चलानी पड़ी

बड़कागांव गोलीकांड के बाद यह माना जा रहा है कि आगे स्थिति और अराजक होगी, क्योकि एक माह में ही दो-दो पुलिस फायरिंग की घटनाओं से पूरे राज्य में संदेश गया है कि पुलिस बर्बर होती जा रही है. जहां भी इस तरह के खनन के काम चल रहे हैं, वहां पर गोलबंदी हो रही है. माफियाओं के जंग में पुलिस द्वारा मारे जा रहे आम आदमी की घटनाओं का फायदा अब नक्सल व माओवादी संगठन उठाना चाहेंगे.

एक पुलिस पदाधिकारी कहते हैं कि आगे देखिएगा कि अब असर कैसा होता है. झारखंड में करीब छह दर्जन संगठन माओवाद और नक्सल के नाम पर सक्रिय हैं, जो अलग-अलग इलाके में लेवी वसूलने का काम करते हैं. वे अब लोगों को समझाएंगे कि माफियाओं और पुलिस के सांठगांठ में जान गंवाने से बेहतर है कि आप हमारे संगठन का हिस्सा बने और समानांतर तौर पर संगठन को मजबूत करें.कंपनियों से लेवी की कमाई भी करें. यह सब जानते हैं कि झारखंड में तमाम नाम से चलनेवाले नक्सल व माओवादी संगठन इन दिनों तेजी से युवाओं की भर्ती करते हैं और उन्हें अच्छा-खासा वेतन देने के साथ ही लेवी में हिस्सेदारी भी देते हैं. माफियाओं के फेरे में फंसे पुलिस का रास्ता भटकना छद्म माओवादी और नक्सल संगठनों का विस्तार करेगा.

First published: 4 October 2016, 8:05 IST
 
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