Home » इंडिया » Catch Hindi: jharkhand public hearing on loop holes in pds system
 

झारखंडः 'हम अपना कानूनी हक़ मांग रहे हैं, भीख नहीं'

श्रिया मोहन | Updated on: 16 June 2016, 22:58 IST
(कैच)

जून की चिलचिलाती गर्मी में झारखंड के भरनो ब्लॉक में एक अभूतपूर्व घटना घट रही थी. राज्य के गुमला ज़िले के इस गांव में करीब एक हजार ग्रामीण इकट्ठा थे. कुछ लोग पास के गांवों से भी आए थे. ये सभी लोग एक साथ मिलकर स्थानीय प्रशासन पर हंस रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे.

ये लोग राज्य में लागू राष्ट्रीय खाद्य गारंटी अधिनियम (एनएफएसए) को पर जनसुनवाई के लिए इकट्ठा थे. समाजशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा ने स्वयंसेवी छात्रों की मदद से इस योजना की जमीनी हकीकत की तहकीकात की. इस तहकीकात के नतीजे वहां मौजूद ब्लॉक डेवलमेंट ऑफिसर श्वेता वेद और दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों को असहज कर देने वाले थे.

सुप्रीम कोर्ट की फटकार: खाद्य सुरक्षा योजना को धता बता रहा गुजरात?

वेद ने अपना काला चश्मा हटाते हुए कहा, "मुझे अब पता चल गया है कि यहां के आधे लोगों को अनाज बांटने की जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) से बाहर कर दिया गया है. मैं अपने दफ्तर में कहके आप सब के नाम लिखवा लूंगी."

एक प्रशासनिक अधिकारी ने साफ-साफ कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि लोगों को राशन कार्ड दिलाना उनका काम है? इसपर गांववाले हंसने लगे और अधिकार से इस्तीफे की मांग की.

घर-घर जाकर की जांच

द्रेज और खेड़ा ने एक जून से 10 जून के बीच भारत के छह सबसे गरीब राज्यों (बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पश्चिमी बंगाल) में एक साथ ये सर्वे कराया था. 

स्वयंसेवियों ने हर राज्य में किन्हीं भी दो जिलों के छह गांवों को चुनकर घर-घर जाकर राशन कार्ड और अनाज वितरण के बारे में जानकारी जुटाई.

एनएफएसए साल 2013 में पारित हुआ था. हालांकि ज्यादातर राज्यों में ये पिछले दो सालों में ही लागू हो पाया. इस कानून के तहत 'प्राथमिक' कार्ड धारक परिवार के हर सदस्य को हर माह पांच किलो अनाज और 'अंत्योदय' कार्ड धारक परिवार को 35 किलो अनाज दिया जाता है. पहले गैर-अंत्योदय कार्ड धारकों को 25 किलो अनाज मिलता था.

यूएन: खाद्य संकट से भारत को तीन लाख करोड़ का नुकसान मुमकिन

इस सर्वे में कुल 3600 परिवारों से संपर्क किया गया. सर्वे के अनुसार नए कानून से सभी राज्यों में हालात में सुधार हुआ है. मसलन, ओडिशा और मध्य प्रदेश में एनएफएसए लागू होने के पहले क्रमशः 62 और 55 प्रतिशत परिवारों के पास राशन कार्ड था. अब इन राज्यों में क्रमशः 88 और 84 प्रतिशत परिवारों के पास राशन कार्ड है.  

बिहार में पीडीएस के तहत मिलने वाले अनाज की आपूर्ति और गुणवत्ता सबसे ज्यादा खराब

जनवितरण प्रणाली द्वारा अनाज वितरण के मामले में अभी भी सबसे आगे छत्तीसगढ़ है. वहीं पश्चिमी बंगाल, बिहार और झारखंड में हालात बेहतर करने की जरूरत है. बिहार में अनाज और आपूर्ति की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. 

बिहार के गया में रहने वाले लखन उरांव के परिवार के पास अंत्योदय कार्ड है. राशन की दुकान वाला उनके कार्ड पर "35 किलो" अनाज देने की बात लिख देता है लेकिन उन्हें इसका आधा अनाज ही मिलता है. कई बार उन्हें अनाज मिलता भी नहीं क्योंकि राशन की दुकान बंद रहती है.

दिल्ली: कनॉट प्लेस में रेस्टोरेंट ने गरीब बच्चों को नहीं दी एंट्री

उरांव कहते हैं, "अनाज इतना खराब होता है कि हम उसे खा नहीं सकते. जिस महीने हमें अनाज मिलता है मैं उसे बाजार में बेच देता हूं और उस पैसे से खाने लायक अनाज खरीदता हूं." पेशे से ड्राइवर उरावं बताते हैं कि उनके कुछ पड़ोसी सरकारी राशन की दुकान से मिलने वाले अनाज जानवरों को खिलाते हैं.

द्रेज और खेड़ा के सर्वे के अनुसार बिहार में पीडीएस की हालात सचमुच खराब है. यहां मई में पीडीएस के तहत लाभान्वित परिवारों में केवल 15 प्रतिशत को ही इसका लाभ मिल पाया. राज्य में औसतन 84 प्रतिशत परिवारों को पीडीएस के तहत राशन मिल पाता है. वहीं 58 प्रतिशत लोगों को राशन की गुणवत्ता "अच्छी" या "ठीक" लगी.

झारखंड की स्थिति

46 वर्षीय लोकेश्वर उरांव के परिवार में नौ सदस्य हैं. एनएफएसए के तहत उनके परिवार को 45 किलो अनाज मिलना चाहिए. लेकिन कई बार उन्हें इससे कम अनाज मिलता है. पिछले महीने उन्हें 25 किलो चावल, 17 किलो गेहूं, दो किलो चीनी, तीन किलो नमक और चार लीटर केरोसीन मिला था.

सर्वे के अनुसार पिछले महीने पीडीएस के तहत आने वाले केवल 55 प्रतिशत परिवारों को ही राशन मिला था. हालांकि राज्य में सामान्यतः 84 प्रतिशत परिवारों को हर महीने राशन मिलता है.  लोकेश्वर उरांव कहते हैं, "बस ये दिक्कत है कि साल में दो-तीन बार दुकान खुलती ही नहीं."

बीजेपी मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई पर यू-टर्न लेने की तैयारी में है?

लोकेश्वर उरांव को मनरेगा के तहत साल में मुश्किल से 10 से 12 दिनों का काम मिलता है. इसलिए वो खेत मजदूर और इमारती मजूदर के रूप में काम करते हैं. पीडीएस के अनाज के अलावा उन्हें साल में करीब 100 किलो राशन बाजार से खरीदना पड़ता है. पैसे के अभाव के कारण उनके परिवार को दाल और सब्जी कभी कभार ही खाने को मिलती है.

सर्वे के अनुसार झारखंड और बिहार में एनएफएसए लागू होने से पहले क्रमशः 50 और 64 प्रतिशत परिवार ही पीडीएस के तहत आते थे. अब क्रमशः 76 और 83 परिवार पीडीएस के तहत आते हैं.

सर्वे के अनुसार कई परिवारों के सदस्यों के राशन कार्ड में नाम ही नहीं हैं. झारखंड और बिहार में क्रमशः 12 और 17 प्रतिशत परिवारों के कुछ सदस्यों के नाम राशन कार्ड पर नहीं थे.  

ग्रामीणों का कहना है कि वो भीख नहीं, एनएफएसए के तहत मिलने वाला अपना हक मांग रहे हैं

एनएफएसए के तहत कई दूसरे लाभ भी मिलते हैं, मसलन गर्भवती महिलाओं को हर महीने छह हजार रुपये मातृत्व लाभ के तहत मिलते हैं. ऐसी महिलाओं को आंगनवाड़ी से पोषक भोजन भी मिलता है. वहीं सभी प्राथमिक विद्यालयों में दोपहर का खाना दिया जाता है.

सूखे पीड़ित बुंदेलखंड में 'रोटी बैंक' बना वरदान

भरनो ब्लॉक के प्राथमिक स्कूल में बच्चे सफेद और नीली पोशाक में दिखाई दे रहे थे. गर्मी की छुट्टी के बाद स्कूल खुले हुए बस दो दिन हुए हैं. राज्य में सूखा घोषित है इसलिए सभी बच्चों को गर्मी की छुट्टी के दौरान भी दोपहरा का भोजन देने का आदेश था. 

हर स्कूल में हर बच्चे के लिए 100 ग्राम अनाज दिया जाता है लेकिन इस स्कूल में बच्चों को छुट्टी में भोजन नहीं मिला. सर्वे में शामिल एक स्वयंसेवी विश्वनाथ ने बताया, "गुमला के ज्यादातर स्कूलों में गर्मी की छुट्टी में भोजन नहीं दिया गया."

गुमला के एक मुस्लिम इलाके में जब इस रिपोर्टर ने मातृत्व लाभ के बारे में पूछा तो सभी महिलाओं ने इससे अनभिज्ञता जताई. इतना ही नहीं कैच ने जिन महिलाओं से बात की उनमें से किसी ने ऐसी किसी महिला के बारे में नहीं सुना था जिसे इस योजना का लाभ मिला हो.

दूसरी तरफ भरनो में चल रही जनसुनवाई में शामिल होने वाले ग्रामीणों को नियंत्रित करने में लगे एक स्वयंसेवी छात्र कहते हैं, "हम किसी की दया नहीं मांग रहे, न ही हम भीख मांग रहे हैं. हम अपना कानून हक मांग रहे हैं. जिसे हम लेकर रहेंगे." छात्र की आवाज में कई लोग अपनी आवाज मिलाते हैं.

जाहिर है आम अवाम की अपने हक के प्रति ऐसी जागरूकता से ही जमीनी हकीकत बदल सकती है.

First published: 16 June 2016, 22:58 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी