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क्यों झारखंड के आदिवासी महीनों से आंदोलनरत हैं?

महताब आलम | Updated on: 9 March 2017, 7:49 IST

सोमवार 6 मार्च को झारखंड से दो हजार से ज्यादा आदिवासियों ने मंडी हाउस से लेकर दिल्ली की संसद तक मार्च किया. बाद में भाजपा को छोड़कर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी इसमें शामिल हुए. नेता उनके समर्थन में बोले और उनकी समस्याओं को संसद और विधानसभा में उठाने का वादा किया.

जहां तक मुझे जानकारी है, दिल्ली में आदिवासियों का इस स्तर पर विरोध पिछले 15 सालों में नहीं हुआ. दिल्ली में शायद यह उनका पहला विरोध मार्च था, पर झारंखड में ये आदिवासी महीनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. सोमवार को जब दिल्ली में विरोध चल रहा था, हजारों आदिवासी राजधानी रांची समेत झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

पर वे विरोध क्यों कर रहे हैं? सबसे पहले तो वे ‘छोटा नागपुर टेनेंसी (सीएनटी) और संथाल परगना टेनेंसी (एसपीटी) अधिनियमों में रोलबैक संशोधन चाहते हैं.’ दोनों विधेयक राज्य में जमीन हस्तांतरण के बारे में हैं. पिछले नवंबर विधानसभा में ठीक से विमर्श किए बिना जुबानी मतों से सीएनटी और एसपीटी में संशोधन कर दिए गए. विधानसभा में विपक्ष ने भी इन संशोधनों का विरोध किया था.

चिंताजनक कानून

इन संशोधनों के बाद सरकार को गैर कृषि और व्यावसायिक मकसद से कृषि जमीन लेने का अधिकार हो गया. इससे पहले इन अधिनियमों में ऐसा नहीं था. अब इससे आदिवासी अपनी जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से वंचित रहेंगे, जो उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत हैं. इसके अलावा, सीएनटी में पहले गैर-आदिवासियों को जनजातीय जमीन बेचने पर पाबंदी थी. और एसपीटी के तहत पूर्वी झारखंड के जिलों की ज्यादातर जमीन ना तो हस्तांतरित की जा सकती थी और ना ही बेची जा सकती थी, चाहे उस पर जनजातीय लोगों का स्वामित्व हो या नहीं हो.

झारखंड आदिवासी संघर्ष मोर्चा ने एक सूचना सर्कुलेट की है. उसके अनुसार, ‘इससे पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज एक्ट 1996, द राइट टू फेयर कंपेंशेसन एंड ट्रांसपरेंसी इन लेंड एक्विजिशन, रिहेबीलिटेशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट 2013, फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 पर विपरीत असर पड़ेगा. ये विधेयक आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों के अधिकारों के संरक्षण के लिए हैं.’ सूचना में यह भी था कि ‘ये संशोधन अविवादित रूप से झारखंड के आदिवासी और अन्य पिछड़े लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को और कमजोर करने के लिए हैं. गौरतलब है कि इससे पहले भी कई संशोधन और अध्यादेश इसी मकसद से थे.’

गौरतलब है कि ये प्रगतिशील कानून आदिवासियों और समाज के अन्य पिछड़े वर्गों द्वारा सालों संघर्ष के बाद अधिनियमित हुए थे. 1837 के विलकिंसन कानून समेत सीएनटी और एसपीटी विधेयक विद्रोह के बाद बने थे. संथाल परगना में संथालियों ने, कोल्हन में कोलों ने और छोटानागपुर में उलगुलानों ने विद्रोह किया था. इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों के जमीन के अधिकारों को मान्यता, परंपरागत स्व-शासन और उनकी संस्कृति का संरक्षण था. दरअसल झारखंड राज्य के निर्माण के पीछे भी भाव यही था कि आदिवासियों के अधिकारों और उनकी अलग पहचान को मान्यता दी जाए.

आदिवासियों की दुश्मन भाजपा

संघर्ष मोर्चा का आरोप है कि ‘जब से भाजपा सरकार राज्य में (बहुमत से) सत्ता में आई है, यह आदिवासियों के अधिकारों पर खुल्लमखुला हमले कर रही है, कारपोरेट लूट और डाके के लिए रास्ता बनाने के लिए.’ यह राजनीतिक वाक्पटुता लग सकती है, पर सच्चाई विरोधियों के दावों से अलग नहीं है. भाजपा से तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा कुछ और मानते हैं.

जनवरी के मध्य प्रकाशित एक खबर में उनके कथन को उद्धृत किया गया था-‘जमीन से जुड़े दो विधेयकों में किए गए संशोधनों पर मुख्यमंत्री को पुनर्विचार करना चाहिए. ऐसे फैसले लेने से पहले उसके दीर्घावधि असर पर भी सोचना चाहिए था. मैंने भी मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी थी, पर सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया.’

दो सप्ताह बाद उन्होंने मीडिया से कहा, ‘उनके कार्यकाल में टीनेसी एक्ट में संशोधन के लिए ‘खास लॉबी’ का दबाव था.’ लॉबी का कहना था कि ये परिवर्तन उनके हित में किए जा रहे हैं, पर मुंडा ने दावा किया कि उन्होंने उन्हें अनुमति नहीं दी क्योंकि ये परिवर्तन गैरसंवैधानिक थे. इसकी बजाय उन्होंने मामला ट्राइबल एडवाइजरी बोर्ड को सौंप दिया.

रघुबर की सफ़ाई

दुख की बात यह है कि राज्य सरकार और उसके अधिकारियों ने लोगों की बात सुनने की बजाय संदेशवाहकों को शूट करने या इन आंदोलनों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पिछले सितंबर द इकोनॉमिक टाइम्स को एक इंटरव्यू में मुख्यमंत्री रघुबर दास ने ईसाई मिशनरियों पर विरोध को भडक़ाने का आरोप लगाया.

एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा था, ‘कुछ पार्टियां नहीं चाहतीं कि आदिवासी आगे बढ़ें; वे चाहती हैं कि जनजातीय लोग गरीब रहें, उन्हें बिजली नहीं मिले. हम विकास और प्रगति लाने की योजना बना रहे हैं, हालांकि जो परिवर्तन में शामिल हैं, वे इसके विरोध में हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि वे वैसे ही रहें जैसे हैं. वे गरीब रहेंगे, तो उनका धर्म परिवर्तन आसानी से होगा.’

कुछ महीनों बाद, राज्य के गृह विभाग ने झारखंड के 96 एनजीओ के फॉरेन कंट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट लाइसेंस निरस्त करने की सिफारिश की. आरोप था कि वे अपना पैसा धार्मिक परिवर्तन में इस्तेमाल कर रहे हैं. यह संदेशवाहक को डराने और सीधा दबाव डालने का साफ मामला था क्योंकि इन एनजीओ में कई सीएनटी और एसपीटी विधेयकों के संशोधन के विरोध में हो रहे विद्रोह में सबसे आगे थे.

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार इस तरह के बेधड़क एक्शन ले रही है. पिछले साल मई में साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार प्राप्त लेखक और सरकारी डॉक्टर हंसदा सौवेंद्र शेखर को पब्लिक सर्वेंट कंडक्ट रूल्स के सेक्शन के तहत कारण बताओ नोटिस भेजा गया था. उनका ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस के लिए झारखंड की सरकार की नई आवास नीति की आलोचना करते हुए एक आलेख लिखा था.

यह नीति 7 अप्रेल 2016 में बनी. इसके अनुसार जो लोग राज्य में रह रहे हैं, और जिनके पास पिछले 30 सालों से अचल संपति है, उन्हें वहां का वासी माना जाएगा. सौवेंद्र को यह आदिवासी-विरोधी कदम लगा, जिससे आदिवासी और हाशिए पर आ जाएंगे और उनकी जगह गैर आदिवासी लोग राज्य में छा जाएंगे. ‘हाल में गैर आदिवासी काफी संख्या में झारखंड आए हैं. 1970 और 1980 के दशक में, जब उद्योग पनपे, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल. उड़ीसा और अन्य जगहों से गैर आदिवासी झारखंड में फैक्ट्रियों में काम करने आए. उन्होंने संपति खरीदी और यहीं बस गए.’ खुशकिस्मती से लोग समझदार थे और सरकार की ओर से नीति पर कोई कदम नहीं उठाया गया. ना ही लेखक ने अहम मुद्दों पर लिखना बंद किया.

पिछले महीने रांची प्रशासन ने राजधानी में ग्लोबल इंवेस्टमेंट समिट से पहले जन प्रदर्शनों, धरनों और सडक़ रोकने वालों पर नजर रखने के लिए धारा 144 लगाई थी. इसके अलावा, पुलिस ने भी माना कि उसने भारतीय पीनल कोड की 107वीं धारा के तहत 50 लोगों को नोटिस भेजे. एक औपनिवेशक तरीका, जिसका अक्सर इस्तेमाल विरोध को दबाने और एक्टिविस्टों को डराने के लिए किया जाता है.

उल्लेखनीय है कि वैध आंदोलन को कुचलने के सारे प्रयासों के बावजूद आदिवासियों के हौसले बरकरार हैं. सोमवार को संसद की ओर उनका विरोध मार्च इसका प्रमाण है. मार्च के आयोजकों में से एक अरुण ओरेऑन ने कहा, ‘आने वाले दिनों में इस संघर्ष को हम और आगे ले जाएंगे. हम कॉंस्टीट्यूशन क्लब पर ओपन हाउस मीटिंग का आयोजन करने की प्रक्रिया में हैं, जहां हम विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के नेताओं को बुलाएंगे और पूछेंगे कि उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए क्या किया है.’

First published: 9 March 2017, 7:49 IST
 
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