Home » इंडिया » Jignesh Mevani resigns from AAP. Wants BJP to suffer for Dalit atrocities
 

जिग्नेश मेवानी आप से अलग, बीजेपी को दलितों पर अत्याचार के लिये सिखाएंगे सबक

सुहास मुंशी | Updated on: 7 February 2017, 8:21 IST

हाल ही में संपन्न हुई दलित अस्मिता यात्रा बहुत तेजी से गुजरात की सीमाओं से बाहर फैलकर एक बड़े बीजेपी विरोधी आंदोलन का स्वरूप लेती जा रही है.

इस आंदोलन के पीछे के प्रमुख चेहरे 35 वर्षीय वकील और सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने पिछले हफ्ते शनिवार को आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देते हुए स्पष्ट किया कि उनका इरादा किसी भी चुनाव में भाग लेने का नहीं है.

नई दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में जिग्नेश ने कहा कि यह आंदोलन अब दलितों के अधिकार की लड़ाई का एक प्रतीक बन गया है और उनका इरादा इसके माध्यम से चुनावी लड़ाई लड़ने का नहीं है.

लेकिन सच्चाई यह है कि 10 दिन की इस अस्मिता यात्रा ने गुजरात में बीजेपी सरकार को खासा शर्मिंदा किया है और साथ ही बीजेपी के वोट बैंक, जिसका एक अच्छा-खासा हिस्सा पारंपरिक रूप से सामाजिक रूप से पिछड़े हुए समाज का प्रतिनिधित्व करता है, में एक संभावित सेंध लगाई है.

वास्तव में मेवानी आगे आते हुए कहते हैं, ‘मुझे पता है कि बीजेपी को इन यात्राओं का नतीजा भुगतना पड़ेगा और उसे भुगतना भी चाहिये. बीजेपी के राज में ही दलितों को सबसे अधिक भुगतना पड़ा है. उनके राज में ही सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों पर होने वाले अत्याचारों में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है. गौ-रक्षक समूह मोदी के सबसे बड़े तोहफों में से एक हैं.’

वे आगे कहते हैं कि इन जुलूसों के माध्यम से दलित बीजेपी के शासनकाल में अपने साथ अन्यायों को दुनिया के सामने ला रह हैं. ‘हम जातिगत या पार्टीवार गणनाओं को लेकर बिल्कुल भी परेशान नहीं हैं लेकिन बीजेपी को हमारे साथ हुए अत्याचारों का नतीजों जरूर भुगतना चाहिये.’

आप से इस्तीफा

मेवानी ने दलित अस्मिता यात्रा के दौरान इस बात को पूरी तरह से छिपाए रखा कि वे आम आदमी पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं. लेकिन शनिवार को दिल्ली में मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अब उनपर आप का सदस्य होने के आरोप लग रहे हैं और वे यह नहीं चाहते कि उनकी राजनीतिक संबद्धता के चलते किसी भी प्रकार से इस आंदोलन को नुकसान पहुंचे.

मेवानी ने कहा, ‘हमने जिस आंदोलन को अभी सिर्फ प्रारंभ ही किया है मैं उसकी पवित्रता को बनाए रखना चाहता हूं. मैं नहीं चाहता कि मेरे किसी पार्टी से जुड़े होने का दुष्परिणाम इस आंदोलन को भुगतना पड़े. हां यह एक सच्चाई है कि आप ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया है लेकिन अब मुझे लगता है कि इस आंदोलन को आगे ले जाने के लिये मुझे आप से अपने रास्ते अलग करने पड़ेंगे.’

मोदी को संदेश

मेवानी ने कहा कि उन्होंने दलित समाज की चिंताओं के बारे में चर्चा करने के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी समय मांगा है.

‘जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब वे खुद को सीएम - काॅमन मैन कहते नहीं अघाते थे. अब मैं उनके पास एक आम आदमी की तरह आया हूं, कृपया मुझे मिलने का समय दीजिये. हजारों की संख्या में दलितों ने मैला न ढोने का संकल्प लिया है. क्या आप उनके लिये भी स्टार्टअप इंडिया प्रारंभ करने जा रहे हैं? क्या आप उन्हें जमीन देंगे? या फिर आप चाहते हैं कि वे दोबारा उसी गड्ढे में गिरें जिससे वे बाहर आना और मुक्ति पाना चाहते हैं?’

मेवानी ने बताया कि दलितों ने न सिर्फ मैला ढोने से इंकार किया है बल्कि वे उस जमीन का भी इंतजार कर रहे हैं जिसका उनसे काफी पहले वायदा किया गया था.

‘अगर गुजरात के प्रत्येक दलित परिवार को पांच एकड़ जमीन नहीं मिलती है तो हम 15 सितंबर से रेल रोको आंदोलन प्रारंभ करेंगे. और ऐसा नहीं है कि हम सामान्य यातायात और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित करना चाहते हैं लेकिन जब हम विरोध प्रदर्शन और रैलियों जैसे अन्य तमाम समाधान अपना कर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं तो फिर हमारे पास अधिक विकल्प नहीं बचते हैं.’

आगे का रास्ता?

10 दिनी गुजरात यात्रा के बाद मेवानी अब उत्तर प्रदेश में कुछ प्रभाव छोड़ना चाहते हैं. दोनों ही राज्यों में अगले वर्ष अलग-अलग समय पर चुनाव होने वाले हैं.

इसके अलावा दलितों की 33 प्रतिशत आबादी वाला एक और राज्य पंजाब भी 2017 में चुनावी समर से गुजरने वाला है.

First published: 23 August 2016, 7:37 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

पिछली कहानी
अगली कहानी