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जेएनयू-डीयू हैं देश भर में फैले माओवादियों के भर्तीकेंद्रः रविंद्र कदम

अश्विन अघोर | Updated on: 18 February 2016, 12:39 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र में एक पुलिस अधिकारी का दावा है उनके पास ऐसे दस्तावेजी सबूत हैं जो जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को देश भर में विभिन्न माओवादी समूहों के भर्ती केंद्र साबित करते हैं. 
  • साईबाबा से बरामद दस्तावेजों से पता चलता है कि जेएनयू और डीयू से माओवादी समूहों के लिए नियमित भर्ती की जाती थी.

जहां एक ओर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कथित तौर पर राष्ट्र विरोधी प्रदर्शन पर बहस गर्म है और सभी राजनीतिक दल अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं. वहीं, महाराष्ट्र में एक पुलिस अधिकारी का दावा है उनके पास ऐसे दस्तावेजी सबूत हैं जो जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को देश भर में विभिन्न माओवादी समूहों के भर्ती केंद्र साबित करते हैं. 

प्रतिष्ठित जेएनयू युनिवर्सिटी की सांस्कृतिक घटना में कथित तौर पर भारत विरोधी नारे के बाद दिल्ली प्रेस क्लब में 9 फरवरी को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उछला यह मामला देश भर की सुर्खियों में छा गया. जैसे ही जेएनयू में हुए इस विरोध प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, दोनों पक्षों के समर्थकों ने जोरदार ढंग से एक-दूसरे पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. 

इस विवाद के राजनीतिक लाभ को देखते हुए सभी राजनीतिक दल इसमें कूद पड़े और अपने लाभ के लिए इस मुद्दे से फायदा उठाने की कोशिश शुरू कर दी. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया था, संयोगवश इस बार यह संसद पर हमला करने के दोषी अफजल गुरु की फांसी की तारीख से मेल खा गया. 

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दावा किया है कि उनके पास मौजूद दस्तावेजी सबूत बताते हैं कि जेएनयू माओवादियों का भर्ती केंद्र है

आयोजकों ने पोस्टर के जरिये छात्रों से अफजल गुरु और मकबूल भट्ट की 'न्यायिक हत्या' के विरोध में निंदा करते हुए मार्च निकालने और समारोह में भाग लेने की अपील की. जेएनयू परिसर के साबरमती ढाबे में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान कश्मीरी विस्थापितों के साथ एकजुटता का भी वचन दिया गया. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों ने इस मुद्दे को गर्माते हुए आरोप लगाया कि आयोजकों ने कथितरूप से राष्ट्र विरोधी कृत्य किया जिसमें भारत विरोधी नारे लगाते हुए कहा कि भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी.

इसके बाद अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता, राजद्रोह की कसौटी, अधिनियम की व्याख्या पर राजनीतिक बहस गर्म हो गई. कार्यक्रम के आयोजकों के खिलाफ की गई कार्रवाई नेे भी केंद्र सरकार के खिलाफ तेज प्रतिक्रियाओं और आलोचनाओं को मौका दिया. 

इस घटना से जुड़ी तमाम चीख-चिल्लाहट और कार्रवाई के बाद महाराष्ट्र में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दावा किया है कि उनके पास मौजूद दस्तावेजी सबूत बताते हैं कि जेएनयू माओवादियों का भर्ती केंद्र है.

गढ़चिरौली में नक्सल विरोधी ऑपरेशन के पुलिस महानिरीक्षक रविंद्र कदम, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा के इसमें शामिल होने की जांच कर रहे हैं. उनका कहना है कि साईबाबा से बरामद दस्तावेजों से पता चलता है कि जेएनयू और डीयू से माओवादी समूहों के लिए नियमित भर्ती की जाती थी.

कदम कहते हैं, "पिछले कुछ वर्षों में साईबाबा की गतिविधियों की जांच से यह उभरकर सामने आया है कि देश भर के माओवादी समूहों ने जेएनयू और डीयू छात्रों की नियमित रूप से भर्ती की है. बड़ी संख्या में छात्रों को वामपंथी विचारधारा से कट्टरपंथी बनाया जा रहा है. ऐसे छात्रों का जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी समूहों के साथ नियमित संपर्क है."

जेएनयू और डीयू में छात्रों के एक बड़े वर्ग को वामपंथी विचारधारा से कट्टरपंथी बनाया जा रहा है

उन्होंने कहा कि इस बात के कई सबूत हैं जो बताते हैं कि जेएनयू और डीयू में छात्रों के एक बड़े वर्ग को वामपंथी विचारधारा से कट्टरपंथी बनाया जा रहा है और जो हिंसा के माध्यम से क्रांति की बात कर रहे हैं. कदम ने बताया कि साईंबाबा जेएनयू और डीयू दोनों में छात्र यूनियनों के सदस्यों का  मार्गदर्शन किया करते थे. 

कदम कहते हैं, "अगस्त 2013 में गिरफ्तार हेम मिश्रा भी साईबाबा का चेला था और वह गढ़चिरौली में एक नक्सली समूह को माइक्रोचिप देने जा रहा था जिसमें कोडेड मैसेज था. हेम मिश्रा जेएनयू का पूर्व छात्र है. माओवादी लिंक को छिपाने के लिए उसने एक सांस्कृतिक मित्र के रूप में काम किया. जेएनयू की अपनी यात्राओं के दौरान उसने साईंबाबा से मुलाकात की और कई छात्रों को कट्टरपंथी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई."

उन्होंने यह भी कहा कि साईबाबा के छात्रों में से एक असम के गुवाहाटी निवासी रितुपर्णा गोस्वामी, जिसने जेएनयू से पीएचडी की थी वो फिलहाल भूमिगत माओवादी गतिविधियों में नवीन के नाम से सक्रिय है. माओवादी हलकों में इसे 'प्रोफेसर क्रांतिकारी' के रूप में जाना जाता है.

माओवादी नेता गणपति की एक बहुत करीबी सहयोगी बन चुकी गोस्वामी शहरी समर्थकों और भूमिगत माओवादियों के बीच समन्वयक के रूप में काम करती है. दो महीने पहले तक जीएन साईंबाबा जमानत पर बाहर थे लेकिन बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने जब उनकी जमानत रद्द कर दी थी तब उन्हें गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा.

First published: 18 February 2016, 12:39 IST
 
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