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जेएनयू विवाद: देशद्रोह की राजनीति राजनाथ सिंह की राजनीतिक साख पर बट्टा है

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • पठानकोट हमला और अब कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने से गृह मंत्री राजनाथ सिंह की साख गिरी है.
  • गृहमंत्री ने कन्हैया की गिरफ्तारी के मामले में गलतबयानी की. उन्होंने जेएनयू विरोध प्रदर्शन को हाफिज सईद के समर्थन से जोड़ा और यह सूचना एक गलत हैंडल से की गई ट्वीट पर आधारित थी.

कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद हुए विवाद से अगर किसी को नुकसान होगा तो वह देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह होंगे. जेनएयू छात्रसंघ के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. कैंपस में पुलिस को भेजे जाने का फैसला और फिर यह कहना कि जेएनयू में हुए प्रदर्शन को जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद का समर्थन था, राजनाथ सिंह की छवि औऱ उनकी राजनीति को बहुत महंगा पड़ सकता है.

विपक्ष के हमले के बाद उनकी प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगने शुरू भी हो चुके हैं. इस वाकए से सरकार में उनकी स्थिति कमजोर होगी साथ ही राजनाथ सिंह की छवि एक कमजोर गृहमंत्री की बननी शुरू हो गई है.

जेएनयू के बारे में उन्होंने हाफिज सईद के समर्थन का जो बयान दिया था वह एक गलत ट्वीट पर आधारित था. देश के गृहमंत्री से इस गैरजिम्मेदारी की उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि वह बाद में यह लगातार कहते रहे कि उन्हें अलग-अलग एजेंसियों से सूचनाएं मिली थीं. अब यह साफ हो चुका है कि वह ट्वीट गलत था लेकिन इस मामले में किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई न ही उन्होंने इस गलतबयानी को लेकर माफी मांगी.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि गृहमंत्री ने देश की सुरक्षा को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा की हो. उन्होंने पठानकोट हमले के दौरान भी ऐसे ट्वीट किए थे जिससे भ्रम का माहौल पैदा हो गया था. इस बार उन्होंने गलतबयानी कर बजट सत्र के पहले राजनीतिक उलझन की स्थिति पैदा कर दी है.

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हालांकि तब उन्होंने ट्वीट डिलीट कर दिया था लेकिन उससे पहले आतंकवादियों की संख्या को लेकर अच्छी खासी दुविधा पैदा हो चुकी थी. उन्होंने ऑपरेशन खत्म होने से पहले ही सुरक्षा बलों को बधाई दे डाली. हालांकि उनके ट्वीट के तीन दिन बाद तक पठानकोट में ऑपरेशन जारी रहा.

राजनाथ सिंह ने पठानकोट हमले के दौरान भी ऐसे ट्वीट किए थे जिससे भ्रम का माहौल पैदा हो गया था

भारत की सुरक्षा को बेहद गंभीर खतरा है. लेकिन अगर गृहमंत्री और खुफिया इकाइयां इस तरह काम करते रहेंगे तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या वह अपने पद के योग्य भी हैं? 23 फरवरी से बजट सत्र की शुरुआत हो रही है और संसद में यह मुद्दा बेहद मजबूती के साथ उठने की उम्मीद है.

पिछले एक हफ्ते में बीजेपी ने जो किया है वह ज्यादा अहम है. वह एक अलग तरह की राजनीति की जमीन तैयार करने में सफल रही है. बीजेपी की कोशिश 'राष्ट्रवाद' की आड़ में अपनी विफलताओं को छिपाने की है.

ऐसे वक्त में जब मोदी सरकार के लिए कुछ भी सही नहीं हो रहा है वहां इस तरह के विमर्श से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है. सरकार न केवल राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों से बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों से निपटने में विफल रही है.

हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रकरण के बाद सरकार की कोशिश दलित विरोधी छवि से भी छुटकारा पाने की है. अगर इन सभी मुद्दों को मिला दिया जाए तो मोदी सरकार की विफलताओं की सूची बेहद लंबी हो जाएगी.

ऐसे में सार्वजनिक विमर्श को राष्ट्रवाद और देशद्रोह की तरफ मोड़े जाने से दो फायदे होते हैं. इससे न केवल बीजेपी के पारंपरिक समर्थकों में जोश आएगा बल्कि उसे अपने साथ अन्य लोगों को भी जोड़ने में मदद मिलेगी. बीजेपी की सरकार को यह पता है कि लोकप्रिय राष्ट्रवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं और अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए इसका किस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है.

संसद में स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद पार्टी और सरकार को वांछित वैधता नहीं मिल पाई है. मौजूदा समय में बीजेपी को मिल रही चुनौती से ऐसा लगता है कि बीजेपी अभी तक हिंदू भारत को नेहरूवाद और पश्चिमी समर्थित उदारवादी चिंतकों की गिरफ्त से पूरी तरह बाहर नहीं निकाल पाई है. 

बीजेपी और आरएसएस को लगता है कि कॉस्मोपॉलिटन विचारकों ने हिंदू मूल्यों को नुकसान पहुंचाया है

यह जानना जरूरी है कि बीजेपी और उसके पुराने विचारकों का भारत की आजादी के लड़ाई में कोई योगदान नहीं था. बल्कि यह कहा जा सकता है कि उन्होंने आजादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या कर देश का माहौल बिगाड़ने की जरूर कोशिश की.

बीजेपी और आरएसएस को लगता है कि कॉस्मोपॉलिटन विचारकों ने हिंदू मूल्यों को नुकसान पहुंचाया है. उन्हें लगता है कि भारत के विचार को समाजवादी और साम्यवादी विचारकों ने नुकसान पहुंचाया है और देश की सुरक्षा को राष्ट्रद्रोहियों से खतरा है.

उन्हें लगता है कि 'राष्ट्रविरोधी' हिंदू भारत की राह में रोड़ा है. ऐसे में एक वैसे दुश्मन को बनाने की जरूरत होती है जिससे समर्थकों को एकजुट बनाए रखने में मदद मिल सके. वैचारिकी दुश्मन की इस लड़ाई का सबसे पहला शिकार हैदराबाद यूनिवर्सिटी का दलित छात्र हुआ और अब इसके निशाने पर जेएनयू है.

जेएनयू लंबे समय से हिंदुत्व ब्रिगेड के निशाने पर रहा है. पांचजन्य ने विशेष अंक निकालकर इसे राष्ट्रद्रोही विश्वविद्यालय करार दिया था. नवंबर 2015 में छपे विशेष अंक में कहा गया था, 'जेएनयू वैसी जगह है जहां राष्ट्रवाद को अपराध समझा जाता है. जहां भारतीय संस्कृति को गलत परिप्रेक्ष्य में रखा जाना आम है. कश्मीर से सेना को हटाए जाने का समर्थन किया जाता है. इसके अलावा वहां कई राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है.'

पांचजन्य के पूर्व संपादक ने 2010 में जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए 'कश्मीरी छात्रों को ओसामा बिल लादेन का दलाल' कहा था. राजनाथ सिंह का आरोप है कि जेएनयू का विरोध प्रदर्शन हाफिज सईद से प्रेरित है. उनका यह बयान उसी विचारधारा के प्रति गहरे जमे दुराग्रह से आता है. हालांकि अब यह बात अलग है कि ऐसा बयान देश के गृह मंत्री की तरफ से आ रहा है.

पांचजन्य के पूर्व संपादक ने 2010 में जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए 'कश्मीरी छात्रों को ओसामा बिल लादेन का दलाल' कहा था

उदारवादी संस्कृति को लेकर जारी मतिभ्रम की स्थिति को ऐसे भी समझा जा सकता है कि पटियाला हाउस कोर्ट में वकीलों और अन्य पार्टी समर्थकों ने पत्रकारों को भी पीट डाला. पीटने वालों में एक विधाकय भी थे. बीजेपी के समर्थकों के लिए दुश्मनों से निपटने का यही तरीका है.

बीजेपी के विचारकों के लिए सभी सामाजिक संघर्ष एक ही जगह आकर खत्म हो जाता है और वह है राष्ट्रप्रेम बनाम राष्ट्रद्रोह. इसमें किसी और विमर्श की गुंजाइश ही नहीं बचती है.

हालांकि बीजेपी की अब यह कल्पना नियंत्रण से बाहर होती जा रही है. पार्टी भी राष्ट्रद्रोह के पागलपन को हवा देने में जुट गई है और इस सबका पहला नुकसान गृह मंत्री को उठाना होगा.

First published: 19 February 2016, 8:43 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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