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मी-लॉर्ड एंकर, आप की बात सर आंखों पर

शादाब मोइज़ी | Updated on: 25 February 2016, 23:02 IST

"मेरा पति देश द्रोही है" चौंकिए मत, क्यूंकि ये शब्द आज से 18 साल पहले बॉबी देओल की मूवी सोल्जर में मां का किरदार निभा रही अभिनेत्री राखी के माथे पर उस फिल्म के खलनायकों ने लिख दिया था. वो अलग बात है कि ये देशद्रोह शब्द आज कल फ़ैशन में है. जी हां आज रील नहीं रियल लाइफ में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, इस बार खलनायक हम हैं, हम से मतलब है हमारा मीडिया. हम ताल ठोक कर आप को या किसी को भी देशद्रोह की सज़ा सुना सकते हैं, क्यूंकि हमें अभिवयक्ति की आज़ादी आप से कहीं ज़्यादा है.

मैं उसी मीडिया की बात कर रहा हूं जिसका मैं खुद हिस्सा हूं. लोकतंत्र का कथित चौथा स्तंभ बहुत बदल गया है. अगर आप इसकी सोच से सहमत न हों तो यह आपके अंतिम संस्कार के लिए आग, उसमें स्वादानुसार घी और सब हो जाने के बाद चौथे तक का इंतज़ाम भी कर सकता है. हिम्मत हो तो एक बार असहमत हो कर दिखाइए.

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हाल ही में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कथित देशद्रोही नारा लगाने के मामले में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कनहैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. जी हां, ये हमारी वही पुलिस है जो हमेशा मौका-ए-वारदात पर देर से पहुंचने के लिए मशहूर है. इस बार भी मामला पुरानी फिल्मों की तरह ही है. पुलिस नारा लगाने वाले असली अपराधियों तक नही पहुंच सकी. लिहजा उसने अपनी पुरानी फिल्मी चाल चली. जो मिला उसे ही ले चलो.

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जिन लोगों पर आरोप थे वो तो देश भक्त न्यूज़ चैनल्स पर देशभक्त पत्रकार के साथ बैठे थें, सॉरी देशभक्त जजों के साथ बैठे थे. आप सोच रहे होंगे कि किस जज की बात हो रही है. मैं टीवी चैनलों के स्टूडियो में बैठे एंकर रूपी जजों की बात कर रहा हूं.

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मैं सिर्फ बेचारे देशभक्त पत्रकारों कि ही बात क्यों करूं. उन देशभक्तों कि बात भी होनी चहिये जो काले कोट में कोर्ट के बाहर जज बने बैठे हैं.

वैसे जेएनयू प्रकरण के बाद एक बात तो साफ हो गई कि सवाल पूछने का हक़ कुछ खास लोगों के पास है और वे खास लोग हर जवाब सिर्फ आपका हर जवाब सिर्फ हां या ना में चाहता हैं. उन्हें आपके तर्क में तनिक रुचि नहीं है. अगर आप मुस्लिम हैं और पत्रकार हैं तब तो सवाल करने की हिमाकत ही मत कीजये क्यूंकि या तो आप हाफिज सईद के रिश्तेदार या फिर गारंटीड देशद्रोही.

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हमारा समाज हमेशा से बंटा हुआ था. कभी दलित, कभी ब्राह्मण, कभी मुसलमान, कभी हिन्दू, कभी शिया, कभी सुन्नी, कभी अंग्रेज़ीभाषी तो कभी हिंदी, कभी बिहारी तो कभी बम्बईया. अब पत्रकार भी बंट गए. कोई स्क्रीन काला कर दे रहा है तो कोई पत्रकारिता का मुंह काला किए दे रहा है. सबके अपने-अपने रंग हैं.

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टीवी पर बैठे 9-10 लोग देश की सारी समस्या को हल किए दे रहे हैं. हर रोज की यही कहानी. पर जनता समझ चुकी है. उसे सममझ आ चुका है कि वे लोग ठगे जा रहें हैं.

अब बात अभिवयक्ति की आज़ादी की, मतलब बोलने की आज़ादी तो वो आप को किसने दिया? देखिये आज़ादी आपको एक बार 15 अगस्त 1947 को मिल चुकी है. यह बार-बार मिलने वाली चीज नहीं है. और हां हमारे टीवी स्टूडियो में बैठे "मी-लार्ड एंकर" ने जो संविधान अपने स्टूडियो में लिखा है वह "वर्ड ऑफ़ गॉड" है. बात खतम.

First published: 25 February 2016, 23:02 IST
 
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