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यह निरीह छात्रों का ताकतवर 'शटडाउन जेएनयू' समर्थकों को जवाब है

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 11 September 2016, 10:40 IST
(विकास कुमार)

पिछले छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने 14 साल बाद जेएनयू में वापसी की थी. सेंट्रल पैनल में संयुक्त सचिव के पद पर परिषद के सौरभ शर्मा जीते थे. डीयू के अलावा जेएनयू में एबीवीपी की परफारमेंस पर तब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था, ‘यह जीत राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति युवाओं के रुझान को प्रदर्शित करती है.’

मगर इस साल दोनों विश्वविद्यालयों में आए नतीजों से यह साफ होता है कि राष्ट्रवादी विचारधारा को लेकर युवाओं का मन सशंकित है. डीयू में एबीवीपी को अच्छी सफलता मिली है लेकिन एक सीट पर एनएसयूआई दो साल बाद वापसी करने में सफल रही है, वहीं जेएनयू में काउंसलर की एक सीट जीतने के लिए भी एबीवीपी को संघर्ष करना पड़ा. सेंट्रल पैनल की किसी भी सीट पर वह सीधी टक्कर नहीं दे पाई. बावजूद इसके कि इस बार जेएनयू में लेफ्ट यूनिटी बनाम एबीवीपी की सीधी लड़ाई मानी जा रही थी.

जेएनयू छात्र संघ के इन नतीजों में एबीवीपी को खारिज करने का भाव साफ-साफ देखा जा सकता है. इसे समझने के लिए इस साल नौ फरवरी को यूनिवर्सिटी में हुए घटनाक्रम को ध्यान रखना जरूरी है. ज्यादातर छात्र उस घटना के लिए एबीवीपी को जिम्मेदार मानते हैं. वरना इसी एबीवीपी को पिछले साल के नतीजों के बाद जेएनयू कैंपस में तेजी से बढ़ता हुआ छात्र संगठन माना जाने लगा था. सौरभ की जीत इसका उदाहरण थी.

दर्शनशास्त्र में एम फिल कर रही शिवांगी ने कहा, ‘मैंने इस बार मतदान अपनी यूनिवर्सिटी और यहां की स्वतंत्र संस्कृति को बचाए रखने के लिए किया है. जेएनयू शटडाउन कैंपेन ने मुझे बहुत परेशान कर दिया था.’

चुनाव के दिन शटडाउन जेएनयू का जवाब देने तकरीबन 80 फीसदी छात्र अपने कमरों और लाइब्रेरी से बाहर निकल आए

इसमें कोई शक़ नहीं कि नौ फरवरी की घटना के बहाने जेएनयू के मूल विचार पर दक्षिणपंथी संगठनों ने हमला किया था. बीजेपी सांसद महेश गिरी ने यहां के छात्रों के ख़िलाफ थाने में शिकायत दर्ज करवाई. यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा कहने के अलावा तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया समेत कइयों पर देशद्रोह का मुकदमा भी थोपा गया.

राज्यसभा सांसद चंदन मित्रा ने अपने लेख में लिखा कि यही मौका है जब जेएनयू को बंद कर दिया जाए या फिर इसका चरित्र बदल दिया जाए. चरित्र हनन की पूरी बोगी सक्रिय हो गई थी जिसमें ज्ञानचंद आहूजा जैसे अनपढ़ नेताओं के आधारहीन आरोप भी उड़ान भर रहे थे.

जेएनयू पर आरएसएस, बीजेपी और एबीवीपी के इन हमलों को कैंपस के सभी स्टूडेंट्स देख रहे थे. छात्रों में इस बात को लेकर एकराय थी कि भारत विरोधी नारे गलत लगाए गए. दोषियों की शिनाख़्त और उनपर कार्रवाई को लेकर भी एकराय थी, लेकिन सरकार की तरफ से किए गए हमले पूरी तरह से जेएनयू के प्रति दुर्भावना से प्रेरित थे.

नतीजा चुनाव के दिन इस सोच (शटडाउन जेएनयू) का विरोध करने तकरीबन 80 फीसदी छात्र अपने कमरों और लाइब्रेरी से बाहर निकल आए थे. यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रेज़िडेंट रहे संदीप सिंह कहते हैं, ‘जेएनयू राजनीतिक रूप से बेहद परिपक्व कैंपस है. सबसे ज़्यादा गुस्सा उनमें शटडाउन कैंपेन की वजह से था. वोटिंग भी इसी मुद्दे के आधार पर हुई है.’

लड़कियों में गुस्सा ज्यादा था

जेएनयू में कुल वोटर्स की संख्या आठ हज़ार के पार है. इनमें आधी से अधिक लड़कियां हैं. इस बार चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवार सिर्फ एबीवीपी से थीं. बावजूद इसके उन्हें लड़कियों का वोट नहीं मिला. वह 1048 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहीं.

फारसी में एम फिल कर रही एक छात्रा ने कहा, ‘ ज्ञानदेव आहूजा कौन हैं? बीजेपी एमएलए हैं राजस्थान से. वह कैंपस से हर दिन 2 हजार बीयर की बोतलें और 3 हजार कंडोम निकलने का दावा करते हैं तो क्या उनके साथ जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी को वोट करना चाहिए? मुझे उनपर बेहद गुस्सा आया था. क्या उनका काम कंडोम की गिनती करना है?’

आहूजा की तरह की हरियाणा सीएम के पूर्व ओएसडी जवाहर यादव ने एक ट्वीट के जरिये यहां की लड़कियों की तुलना वेश्या से कर दी थी. एआईएसएफ की नेता अपराजिता राजा पर भी इसी तरह के हमले हुए जो सीपीआई लीडर डी राजा की बेटी हैं. शिवांगी कहती हैं कि इन हमलों की वजह से लड़कियों में अलग तरह की नाराजगी थी. इस चुनाव में लड़कियों ने एबीवीपी को सबसे कम मतदान किया है.

मुसलमान छात्रों के मन में भी रोष

लड़कियों के अलावा मुसलमान स्टूडेंट्स भी ख़ासे आक्रामक थे. केंद्र में बीजेपी की सरकार के बाद देशभर में मुसलमानों पर हमले बढ़े हैं. गोहत्या के नाम पर हो रहे हमलों से उनमें भय और असुरक्षा बढ़ी है. हाफ़िज़ सईद के नाम से हुए फर्ज़ी ट्वीट के बाद धार्मिक कारणों से उनपर हमले हुए. बायोटेक में एम फिल कर रहे सैय्यद कहते हैं, ‘मतदान करते वक्त मैंने कैंपस के तमाम मुद्दों के अलावा अपने ऊपर होने वालों हमलों को भी ध्यान में रखा. यह ज़ाहिर है कि जिन्होंने समस्या पैदा की है, मैंने उन्हें वोट नहीं दिया है.'

जेएनयू के पूर्व छात्र और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार कहते हैं कि आम छात्र अपने विश्वविद्यालय को जानता है. वह अपनी यूनिवर्सिटी की अस्मिता के साथ समझौता नहीं करना चाहता क्योंकि वह उसका हिस्सा रह चुका होता है. यही वजह है कि आरएसएस, बीजेपी और एबीवीपी के अनायास हमलों से दुखी होकर एबीवीपी के पदाधिकारियों ने भी इस्तीफा दिया. नया मैंडेट दरअसल सभी छात्रों की एक सहज प्रतिक्रिया है जिसने कैंपस में एबीवीपी के बढ़ते जनाधार को रोक दिया है.

पूर्व छात्र और डीयू में अस्सिटेंट प्रोफेसर तारा शंकर ने कहा, ‘स्टूडेंट्स में यह भय भी था कि एक सीट निकलने पर कैंपस में माहौल इतना बिगाड़ दिया गया. अगर ये दोबारा ज़्यादा सीटें जीतकर आएंगे तो कुछ भी हो सकता है. इसलिए छात्रों ने इस आम सहमति के आधार पर मतदान किया कि एबीवीपी को हराना है.’

First published: 11 September 2016, 10:40 IST
 
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