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पुलिस और माओवादियों के बीच पिस रही बस्तर की पत्रकारिता

आलोक प्रकाश पुतुल | Updated on: 22 December 2015, 8:51 IST
QUICK PILL
  • छत्‍तीसगढ़ की जेल में माओवाद के कथित आरोप में जेल में बंद दो पत्रकारों संतोष यदव व सोमारू नाग की रिहाई का मुद्दा तूल पकड़ रहा है.
  • 21 दिसंबर, 2015 को जगदलपुर में पत्रकारों ने उनकी रिहाई के लिए महाआंदोलन किया. इसमें प्राख्यात बुद्धिजीवी, प्रतिष्ठित लेखकों, वरिष्ठ पत्रकारों, राजनेता और सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया.

बस्तर के तीरथगढ़ गांव में सोमारू नाग के बारे में बात करने के लिये कोई आसानी से तैयार नहीं होता.

इलाके की सरपंच सेवती नाग कहती हैं-"पूरा गांव जानता है कि सोमारु नाग निर्दोष है. हमारी पंचायत ने विशेष ग्राम सभा बुला कर प्रस्ताव पारित किया कि सोमारु निर्दोष है और पुलिस ने उन्हें फंसाया है. लेकिन हमारी कोई नहीं सुन रहा. बात कर के क्या फ़ायदा?"

सोमारू बस्तर के उन दो पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्हें पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में इस साल 19 जुलाई को गिरफ़्तार किया था. तब से वे जेल में हैं.

सोमारू के बाद 28 सितंबर को बस्तर में दरभा थाने के पास ही रहने वाले एक अख़बार के प्रतिनिधि संतोष यादव को माओवादी होने के आरोप में घर से उठा लिया गया. कहा गया कि संतोष अगस्त में माओवादियों के एक हमले में शामिल था, जिसमें पुलिस के एक जवान की मौत हो गई थी. ठीक थाने के पास रहने वाले संतोष की महीने भर बाद हुई इस गिरफ़्तारी से पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग नाराज़ था.

पुलिस ने एक तरह से मीडिया पर सेंसरशिप लगा रखी है और कोई भी पुलिस की प्रताड़ना की वजह से सच नहीं बोलना चाहता

इसके बाद इन दोनों पत्रकारों की रिहाई के लिये राज्य में कई जगहों पर धरना-प्रदर्शन हुआ. लेकिन सरकार ने इस मुद्दे पर कार्रवाई तो दूर, जांच का भी भरोसा नहीं दिया. इसके बाद पत्रकारों ने सोमवार को जगदलपुर में पत्रकारों का जेल भरो अभियान शुरू किया.

दोनों पत्रकारों की रिहाई के लिये आंदोलन की शुरुआत करने वाले पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति के महासचिव कमल शुक्ला का कहना है कि दोनों पत्रकारों को पुलिस के लिये काम नहीं करने का खामियाजा उठाना पड़ा है. पुलिस ने एक तरह से मीडिया पर सेंसरशिप लगा रखी है और कोई भी पुलिस की प्रताड़ना की वजह से सच नहीं बोलना चाहता.

कमल कहते हैं-"हमने सोमारू नाग और संतोष यादव की रिहाई के लिये कई आंदोलन किये लेकिन सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके बाद हमें मज़बूर हो कर धरना-प्रदर्शन और जेल भरो आंदोलन के लिये बाध्य होना पड़ा."

इस आंदोलन में राज्य भर से पत्रकार और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग एकत्र हुये और उन्होंने जगदलपुर में प्रदर्शन किया. इसके अलावा देश-विदेश के पत्रकार और सामाजिक संगठनों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है. सोमवार को विधानसभा में भी इस मुद्दे पर शोर-शराबा हुआ. विपक्ष ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिये बजट सत्र में विधेयक लाने की बात भी कही.

लेकिन बस्तर के पत्रकार मानते हैं कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिये विशेष नीति बनाये जाने की ज़रुरत है.

दंतेवाड़ा से प्रकाशित बस्तर इंपैक्ट अख़बार के संपादक सुरेश महापात्र बस्तर में पत्रकारिता को 'सैंडविच' की संज्ञा देते हैं. सुरेश कई उदाहरणों के साथ बताते हैं कि बस्तर में पत्रकारिता किस तरह अपने मुश्किल दौर में है. एक तरफ़ पुलिस का दबाव होता है तो दूसरी तरफ माओवादियों का.

सुरेश कहते हैं-"आप जान हथेली पर ले कर निष्पक्ष पत्रकारिता करते रहें लेकिन आपको चाहे-अनचाहे किसी न किसी खेमे में बांट दिया जायेगा. आप पर कौन-सा लेबल कब चस्पा कर दिया जाये, इस बात को जब तक आप समझेंगे, आप किसी न किसी मुश्किल में घिर चुके होंगे. नेमीचंद जैन से लेकर साई रेड्डी तक कई उदाहरण हैं."

किस्सा साई रेड्डी का

अपनी ग्रामीण पत्रकारिता के लिये चर्चित साई रेड्डी को मार्च 2008 में पुलिस ने छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ़्तार किया था. पुलिस का आरोप था कि रेड्डी के माओवादियों से गहरे रिश्ते हैं. रेड्डी कई महीनों तक जेल में रहे. बाद में सबूतों के अभाव में रेड्डी को छोड़ना पड़ा.

लेकिन पांच साल बाद 51 वर्षीय साई रेड्डी की 6 दिसंबर 2013 को बीजापुर के बासागुड़ा बाज़ार में दिन दहाड़े गला रेत कर हत्या कर दी गई. माओवादियों के स्थानीय प्रवक्ता ने इस हत्या की ज़िम्मेवारी लेते हुये आरोप लगाया कि साई रेड्डी पुलिस के लिये मुखबिर का काम करते थे.

महीनों बाद सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने इस हत्या पर अफ़सोस जताया और कहा कि साई रेड्डी की हत्या का निर्णय बहुत पहले लिया गया था. लेकिन 2008 में उनकी गिरफ्तारी के बाद हमने अपना फ़ैसला बदल लिया. अभय का दावा था कि ऊपरी कमेटी के इस निर्णय की जानकारी पांच साल बाद भी स्थानीय नेतृत्व को नहीं मिल पाई, इसी ग़लतफ़हमी में रेड्डी मारे गये.

2013 में ही सुकमा में माओवादियों ने नेमीचंद जैन की हत्या कर दी थी

सीपीआई माओवादी के स्पेशल जोनल कमेटी सचिव रामन्ना का बयान आया-"जब नेमिचंद जैन की हत्या हुई थी, थोड़ी भ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी. इस घटना को किसने और किसके निर्णय पर अंजाम दिया यह पता लगाने में काफी देरी हो गई. बाद में यह स्पष्ट हो गया कि हमारी एक निचली कमेटी के गलत आंकलन और संकीर्णतावादी निर्णय के चलते यह दुखद घटना घटी थी. हमें इस पर बेहद अफसोस है."

समझौता

पत्रकार संजीव पांडेय का कहना है कि बस्तर में अगर आपको काम करना है तो समझौता आपकी अनिवार्य नियति है. लेकिन इस समझौते के बाद भी आप सुरक्षित नहीं हैं, यह बात आपको समझ लेनी चाहिये.

लेकिन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का कहना है कि राज्य में पुलिस प्रताड़ना हाल के दिनों में और तेज़ी से बढ़ी है. उनका कहना है कि जब से छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा कानून लागू हुआ है, तब से पुलिस अपनी मनमानी पर उतर आई है. संतोष यादव सहित बस्तर के सैकड़ों निर्दोष नौजवान जेल में पड़े हैं. इस मनमानी को रोकने के लिये छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा कानून को रद्द किया जाना ज़रुरी है. पीयूसीएल ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी लगाई है.

लाखन सिंह कहते हैं-"बस्तर में कथित माओवादियों की आड़ में आईजी पुलिस एसआरपी कल्लुरी के निर्देशन में आदिवासियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है. आदिवासी लगातार मारे जा रहे हैं. लेकिन यह चौंकाने वाली बात है कि आईजी एसआरपी कल्लुरी के खिलाफ कई आपराधिक कृत्य की शिकायतें मानवाधिकार आयोग से लेकर कई मंचों पर लंबित हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है."

First published: 22 December 2015, 8:51 IST
 
आलोक प्रकाश पुतुल @catch_hindi

P { margin-bottom: 0.08in; पिछले25 सालोंसे पत्रकारिता के पेशे में.कई अखबारों, पत्र-पत्रिकाओंके लिये काम. कुछसंदर्भग्रंथों का सम्पादन, कईराष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीयसंस्थाओं के फेलो . माओवाद,आदिवासीसमाज, जल,जंगल,ज़मीन परप्रमुखता से लेखन. रायपुरमें निवास.

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