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मीडिया ने 'राष्ट्रवाद' का बहुत ही संकुचित इस्तेमाल किया

विश्व दीपक | Updated on: 23 February 2016, 20:50 IST
QUICK PILL
विश्व दीपक ज़ी न्यूज़ के पूर्व प्रोड्यूसर हैं. उन्होंने जेएनयू विवाद के बाद चैनल से इस्तीफा दे दिया है.

अपने इस्तीफे का कारण बताने से पहले मैं संक्षेप में पूरे घटनाक्रम को रखना चाहूंगा ताकि सही परिप्रेक्ष्य में बात हो सके. ये सारा मामला जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) परिसर में कुछ छात्रों द्वारा किए विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ.

1- नौ फरवरी को जेएनयू के कुछ छात्रों ने अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया.(कहा जा रहा है कि कुछ चैनलों के लोग कार्यक्रम कवर करने के लिए वहां पहले से मौजूद थे)

 
2- कुछ चैनलों को लगा कि जेएनयू परिसर में जेएनयू के "कुछ छात्रों" ने "भारत विरोधी" नारे लगाए. इन चैनलों ने ऐसे वीडियो फुटेज चलाए जिसमें नारों के हवाले से कहा गया कि 'जेएनयू में राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां चल रही हैं."


3)   दिल्ली पुलिस और बीजेपी सासंद महेश गिरी ने अलग-अलग एफआईआर दर्ज करायी. जिनपर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया.

4)  कन्हैया कुमार को जब दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई के लिए ले जाया जा रहा था कि उनपर कुछ वकीलों ने हमला किया. जो पत्रकार वहां रिपोर्टिंग के लिए मौजूद थे उन्हें भी मारा गया. हमले के लिए जिम्मेदार लोगों की वीडियो फुटेज मौजूद है.

5) सोमवार को समाचार चैनल आज तक ने एक स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो जारी किया. इस स्टिंग के अनुसार कन्हैया और कुछ पत्रकारों पर जो हमले हुए वो पहले से सुनियोजित थे. ये हमले "राष्ट्रवाद" के नाम पर कन्हैया को सजा देने के मकसद से किए गए थे.

अफजल गुरु पर कार्यक्रम, मीडिया चैनलों पर कवरेज, पुलिस में एफआईर, कन्हैया की गिरफ्तारी समेत तमाम घटनाएं जिस तरह एक के बाद एक हुईं उनसे लगता है कि ये सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है. ये सब मीडिया और राजनेताओं के बीच किसी सोची-समझी योजना का हिस्सा लगते हैं. पूरे मामले में मीडिया ने "राष्ट्रवाद" का बहुत ही संकुचित इस्तेमाल किया.

जिस तरह "राष्ट्र-विरोधियों" से जुड़ी खबरें पेश की जा रही थीं उससे कोई भी सामान्य इंसान असहज हो सकता है

जिस तरह एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रों को मीडिया ट्रायल द्वारा ऐसे "राष्ट्र-विरोधी" के रूप में फ्रेम किया गया जिन्हें देश से प्यार नहीं है, वो देश के गद्दार हैं. इन सबसे मैं असहज हो गया. जाहिर है कि जिस तरह "राष्ट्र-विरोधियों" से जुड़ी खबरें पेश की जा रही थीं उससे कोई भी सामान्य इंसान असहज हो सकता है.

जिस तरह इस मामले की कवरेज की गई उससे जाहिर है कि कुछ मीडिया संस्थान "राष्ट्रवादियों" की लाइन पर काम करते हुए प्रतीत हो रहे थे. आखिर किसी विश्वविद्यालय के छात्रों को इस कदर "राष्ट्र-विरोधी" के रूप में कैसे पेश किया जा सकता कि कुछ लोग उनकी खून के प्यासे हो जाएं. मैं जिस संस्थान में काम करता था वहां इन्हीं चीजों को लेकर मेरा संपादकीय मतभेद शुरू हुआ.

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मैं उस संस्थान में एक साल से अधिक समय तक काम कर सका क्योंकि वहां मेरे सहकर्मियों का व्यवहार मेरी प्रति अच्छा था, संपादकीय नजरिए पर हमारे वैचारिक मतभेद भी इससे पहले उतने गहरे नहीं थे.

हालांकि मुझे इस बात का अंदेशा था कि इन सबकी आखिरी परिणति क्या होगी. "राष्ट्र-विरोधियों" की खबर को चैनल किस तरह पेश करेगा इसका भी अंदाजा था. लेकिन जब कन्हैया और कुछ पत्रकारों को कोर्ट परिसर में मारा गया उसके बाद मैं ज्यादा बेचैन हो गया.

मेरे एक जानने वाले ने हमले के तुरंत बाद खबर दी कि हमले के पीछे कुछ वकील और कथित "देशभक्त" और "राष्ट्रवादी" दक्षिणपंथी पार्टी से जुड़े लोग थे. मैंने तुरंत ये सूचना अपने साथी पत्रकारों और जेएनयू के दोस्तों की दी. मैंने  उनसे कन्हैया की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा.

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निजी तौर पर मुझे कन्हैया की सुरक्षा की चिंता थी लेकिन नौकरी की मजबूरी के चलते मुझे उसे और जेएनयू के दूसरे छात्रों को "देशद्रोही" के रूप में बरतना पड़ा. मुझे ऐसा लग रहा था कि न्यूजरूम में पत्रकार नहीं जज बैठे हुए हैं.

इसी बीच हमें कन्हैया के परिवार के बारे में पता चला. 15 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस ने उसके परिवार के बार में एक खबर "मीट द फेमिली ऑफ द स्टुडेंट हू इज अ डेंजर टू मदर इंडिया" प्रकाशित की. जिसमें बताया गया था कि वो बेहद गरीब परिवार से आता है.

राष्ट्रवाद का विचार उपनिवेशवाद के दौरान विकसित हुआ. 21वीं सदी आते आते इसकी प्रासंगिकता फीकी पड़ने लगी है

उसी समय मीडिया में खबर आयी कि उमर खालिद की बहन को धमकियां दी जा रही हैं. जो "देशभक्त" देश के लिए लड़ने का दावा कर रहे थे वो उसकी बहन को गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे. अगर ये "राष्ट्रवादी" उसे नुकसान पहुुंचाने के अपने मंसूबों में कामयाब हो गए तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?

तब मैंने खुद से ये सवाल पूछना शुरू किया कि क्या मैं पत्रकारिता कर रहा हूं या "राष्ट्रवाद" के नाम पर दक्षिणपंथियों द्वारा फैलायी जा रही नफरत का हिस्सा बन रहा हूूं.

पढ़ेंः आज तक का खुलासा: कन्हैया को जान से मारने की फिराक में वकील

राष्ट्रवाद का विचार बीसवीं सदी में उपनिवेशवाद के दौरान विकसित हुआ. इक्कीसवीं सदी आते-आते इसकी प्रासंगिकता फीकी पड़ने लगी है. यूरोपीय संघ और सार्क जैसे क्षेत्रीय संगठन कुछ हद तक राष्ट्रवाद के एंटी-थिसिस हैं.

फिर भी हम "देशभक्ति" के नाम पर "अंध-राष्ट्रवाद" फैला रहे हैं और खुद को सच्चे राष्ट्रवादी के रूप में तथा दूसरों को "राष्ट्रविरोधी" के रूप में पेश कर रहे हैं, क्यों? और फिर मैंने तय कर लिया कि मैं इस तरह की पत्रकारिता नहीं करूंगा. मैं खुद से लगातार सवाल पूछ रहा था.

अगर हम जनपक्षधर पत्रकारिता नहीं कर सकते तो कम से कम वस्तुनिष्ठता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन जरूर करना चाहिए, जिस पर पत्रकारिता की बुनियाद टिकी है.

अगर हम निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ बने रहें तो गलती होने की संभावनाओं के बाद भी उसेस समाज को कम नुकसान होगा. "अंध-राष्ट्रवाद" के चलते मीडिया द्वारा किसी की सुपारी किलिंग करना कहीं से न्यायोचित नहीं है. 

पढ़ेंः क्या सत्ता लगातार जेएनयू को पढ़ने में चूक रही है?

रिपोर्टिंग के दौरान हमें तथ्य जांचना चाहिए और ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वो निष्पक्ष हैं, या कम से कम हमें कमजोर और गरीब के हित में निष्पक्ष तो रह ही सकते हैं. लेकिन कुछ कारणों से हमारे न्यूज चैनल इसके ठीक उलटा कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि वो टीआरपी के लिए किसी को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

प्रतियोगिता और चौबीस घंटों के प्रसारण के दबाव के चलते न्यूज चैनलों के ऊपर हर घटना को कवर करने का दबाव है, भले ही उसका जो भी परिणाम हो. जिससे दर्शकों को लुभाया जा सके, उनकी कच्ची विचारधारा को तुष्ट या पुष्ट किया जा सके.

जेएनयू और कन्हैया से जुड़ी खबरों ने पूरी देश में लहर पैदा की. जिससे "राष्ट्रवादी" "राष्ट्रविरोधियों" के खून के प्यास हो गए.

मीडिया में आई खबरों के अनुसार "अंध-राष्ट्रवाद" के इस प्रचार के चलते कई जगहों पर झड़पें हुईं. इन खबरों से ऐसा लग रहा जैसे देश में गृह युद्ध की स्थितियां बन रही हैं. देश के ही एक तबके को दूूूसरे तबके का दुश्मन बताया जा रहा है, उन्हें एक दूसरे से नफरत करना सिखाया जा रहा है.

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ये रवैया पिछले कुछ समय में मजबूत हुआ है. जेएनयू जैसे मुद्दों की रिपोर्टिंग के दौरान इसे एक ही मुल्क के दो समुहों के बीच झगड़े के रूप में पेश किया जा रहा है. जबकि दोनों अपने देश को एक समान ही प्यार करते हैं लेकिन उनकी राय अलग अलग है. जनता चैनलों पर जो कुछ देखती है उससे उसके विचार प्रभावित होते हैं.

इन टकरावों में मुझे गृह युद्ध की झलक दिखती है. एक न्यूज प्रोड्यूसर के तौर पर एक तरफ हम एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रों को 'देशद्रोही' बताने तक चले जाते हैं जिसस उनके परिवारवालों और शुभचिंतकों को गहरा सदमा और क्षति पहुंचती है, दूसरी तरफ हम खुद को देश की "राष्ट्रवादी चेतना के सबसे बड़े रक्षक" भी बताते हैं.

हम लोग खबरों को बढ़ाचढाकर और असंगत तरीके से पेश करते हैं. मैं जिस संस्थान में काम कर रहा था क्या उसमें "राष्ट्रवादी पत्रकारिता" के नाम पर यही नहीं हो रहा था?

आज तक के स्टिंग से सामने आ गया कि "राष्ट्रवादी" के लबादा है जिसके तहत शारीरिक और मानसिक हिंसा फैलायी जा रही है. कुछ लोग सत्ता में बने रहने के लिए जिन औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं कुछ लोग उनका इस्तेमाल वैचारिक असहमतियों का बदला लेने के लिए कर रहे हैं.

आज पत्रकारिता एक गहरे गहरे कुचक्र में फंस गई है. जो "राष्ट्रवाद" लोगों के बीच नफरत पैदा करे और एक को दूसरे का दुश्मन बना दे वो शर्मनाक है. ऐसे "राष्ट्रवाद" से हमारे देश को फायदा कम नुकसान ज्यादा है. ये मेरे लिए सबसे उचित वक्त था कि मैं ऐसी पत्रकारिता से अलग हो जाऊं.

First published: 23 February 2016, 20:50 IST
 
विश्व दीपक @CatchHindi

एक दशक से अधिक समय से मीडिया में कार्यरत. आज तक, डॉयचे वैले(जर्मनी) और बीबीसी हिंदी,न्यूज नेशन में काम कर चुके हैं.

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