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मराठवाड़ा का दुर्भाग्य: सूखे से उबरे तो नोटबंदी ने मारा

पार्थ एमएन | Updated on: 17 November 2016, 7:37 IST
QUICK PILL
  • आधे दशक से सूखा पड़ने के बाद मराठवाड़ा में इस साल मानसून मेहरबान हुआ था. अच्छी बारिश हो जाने से किसान खरीफ की फसल से बेहद ख़ुश थे. 
  • उन्हें लग रहा था कि इस फसल को बेचकर उन्हें काफी रकम मिल जाएगी और फिर रबी के लिए अच्छी तैयारी कर लेंगे. 
  • मगर अब सबकुछ चौपट होता दिख रहा है. बीज और उर्वरक की दुकानों पर पुराने नोट लेकर आ रहे किसानों को भारी मन से लौटाना पड़ रहा है. 

कई साल से मराठवाड़ा और सूखा एक दूसरे के पर्याय हैं. आधे दशक से लगातार बारिश की कमी से यहां खेती का संकट बढ़ता गया. फिर साल 2016 में इन्द्र देव मराठवाड़ा पर मेहरबान हुए लेकिन किसानों की ज़िंदगी से सूखा नहीं गया. इस बार यह सूखा नोटबंदी के रूप में आया है. किसान जिनका हर लेन-देन नगद होता है लेकिन आठ नवंबर की रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 5000 और 1,000 के नोट पर पाबंदी की घोषणा से वे पंगु हो गए हैं.

लातूर ज़िले के निलंगा कस्बे के किसान पदमाकर लोंधे पिछले हफ्ते अपनी सोयाबीन की फसल बेचने लातूर शहर की अनाज मंडी में आए तो मौजूदा हालात को उन्होंने भयावह बताया. उन्होंने कहा, 'दूर दराज के गांवों के किसान अपनी कृषि जिंसें बेचने आ रहे हैं लेकिन खरीदारों के पास उन्हें देने के लिए पैसे ही नहीं हैं.' लाचार किसान लोंधे ने भी अपनी 20 क्विंटल सोयाबीन की मंडी में ढेरी लगा दी और कुछ रकम हासिल किए बिना वापस अपने गांव चले आए. 

अगले हफ्ते फिर आने की बात पर वह बोले, 'अपना पैसा पाने के लिए आने-जाने में बेवजह खर्चा और करना पड़ेगा जबकि अभी मेरे पास घर लौटने या एक कप चाय के लिए भी पैसे नहीं हैं. वापस आने के लिए अब मुझे उधार लेना पड़ेगा. हालात बहुत भयावह हैं. मैं पैसे का इंतजार कर रहा हूं. इसके बिना रबी की बुआई नहीं कर सकता.'

इस बार मानसून के दौरान अच्छी बारिश हो जाने से किसान खरीफ की फसल से बेहद ख़ुश थे. उन्हें लग रहा था कि इस फसल को बेचकर उन्हें काफी रकम मिल जाएगी और फिर रबी के लिए अच्छी तैयारी कर लेंगे. मगर अब सबकुछ चौपट होता दिख रहा है. किसानों के लिए यह वक्त बेहद नाजुक है. उन्हें सही समय पर सारे काम निबटाने होते हैं, देरी की कोई गुंजाइश नहीं रहती.

किसान कैसे करें इंतज़ार

लातूर मूल के वरिष्ठ पत्रकार और कृषि विशेषज्ञ अतुल देउलगांवकर ने बताया कि अभी 25 फ़ीसदी किसान रबी की बुआई का इंतज़ार कर रहे हैं. जिन्होंने बुआई पूरी कर ली, उन्हें बाकी काम के लिए पैसे की सख्त जरूरत है. इसमें देरी या अड़चन आने पर पूरा सीजन बेकार हो जाएगा और नोटबंदी ने आर्थिक गतिरोध पैदा कर दिया है. 

शहर में अपनी उपज बेचने के बाद किसान आम तौर पर उर्वरक, बीज, घर का राशन, दवाएं आदि खरीद लाते हैं. लेकिन पैसे के अभाव में उनका सारा आपसी लेन-देन ठप हो गया. लातूर में उर्वरक और बीज के दुकानदार और किसान शिवाजी सोनावने ने कहा कि शहर में ऐसी करीब 80 दुकानें हैं और 8 नवंबर से पहले सभी दुकानदार लगभग 1 लाख रुपए रोजाना बिक्री कर लेता था. मगर पिछले कुछ दिन से उनका धंधा 5 हजार रूपए तक लुड़क गया. पुराने नोट लेकर आ रहे किसानों को भारी मन से मना करना पड़ रहा है. 

गोवा की रैली में मोदी ने नागरिकों से 50 दिन सहयोग करने की भावनात्मक अपील की थी लेकिन आगामी रबी के कृषि संबंधी सारे कामकाज के लिए वे देरी कैसे कर सकते हैं? सोनावने ने आगे कहा कि उनके 6 एकड़ के अंगूर के खेत खाली पड़े हैं क्योंकि मजदूर ही नहीं मिल रहे. मार्च में होने वाले अंगूर के सीजन के लिए तैयारी तो अभी से करनी पड़ती है. वे अंगूर का निर्यात भी करते हैं. उनकी आमदनी का अच्छा स्रोत अब चौपट नजर आ रहा है. खेती-बाड़ी के सारे कामों में वीरानी छाई है. 

नोटबंदी की मार

इस बीच नोटबंदी के विपरीत प्रभाव साफ नज़र आने लगे हैं. इस सप्ताह सोयाबीन के दामों में 150 रुपए प्रति क्विंटल की गिरावट आई है. इसका मतलब है किसान को एक सप्ताह पहले की अपेक्षा भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. कई ग्राहक उधारी पर भी खरीद-फरोख्त करते हैं. थड़ी-ठेलों वालों को जल्दी खराब हो जाने से हरी सब्जियां औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ रही हैं. 

लातूर कृषि उपज मंडी के प्रमुख ललित शाह का कहना है कि 8 नवंबर के बाद कारोबार तेजी से गिरा है. पहले सोयाबीन के 75 हजार कट्टे रोजाना आ रहे थे जो अब 20 हजार तक आ गिरे हैं. अपनी जिंसों के पास बैठे किसान भी व्यापारियों की मुश्किलें समझते हैं. अगर ऐसे ही हालात रहे तो कारोबार बंद हो जाएगा.

लातूर के बाहरी इलाके में 20 एकड़ जमीन के मालिक गणेश मेदजे ने कहा कि करीब 80 क्विंटल उपज नहीं बेच पाने के कारण घर में पड़ी है, इसलिए रबी के लिए पूंजी भी नहीं जुटा पाया. बैंक कम हैं और दूर भी. खेती-बाड़ी का काम छोड़ पूरे दिन घंटों तक चार हजार रुपए के लिए लाइन में खड़े रहना किसानों के लिए संभव नहीं है.

ज्यादातर किसानों के खाते जिला बैंकों में हैं जिन्हें अपने स्तर पर पुराने नोट बदलने का अधिकार नहीं है. जबकि गिने-चुने किसानों के खाते ही राष्ट्रीयकृत बैंकों में हैं. पिछले कुछ सालों से हमारे पास पैसा नहीं आया. हमारी हालत इस समय बड़ी नाजुक है. हम अपने पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे.                     

First published: 17 November 2016, 7:37 IST
 
पार्थ एमएन @catchhindi

Parth is a special correspondent with the Los Angeles Times. He has a degree in mass communication and journalism from Journalism Mentor, Mumbai. Prior to journalism, Parth was a professional cricketer in Mumbai for 10 years.

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