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पारदर्शिता नहीं तो जस्टिस चेलमेश्वर नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 September 2016, 8:11 IST

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे चेलामेश्वर ने मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम की बैठकों में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है. जस्टिस चेलामेश्वर के इस कदम से कॉलेजियम के प्रति उनके तेवर एक बार फिर से स्पष्ट हो गए हैं. उलेखनीय है कि कॉलेजियम के अन्य सदस्य जस्टिस अनिल आर देव, जेएस केहर और दीपक मिश्रा हैं. कॉलेजियम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश के लिए उत्तरदायी होती है.

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जस्टिस चेलमेश्वर के इस रवैए के पीछे उनका आधार है कि कॉलेजियम की बैठको में भाग लेने का कोई आधार नहीं है क्योंकि बैठकों में हुए विचार-विमर्श को गोपनीय रखा जाता है. जस्टिस चेलमेश्वर ने एक सितंबर को ही चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर को तीन पन्नों का पत्र लिखा है, जिसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. बताया जा रहा है कि इस पत्र में उन्होंने अपारदर्शी कॉलेजियम व्यवस्था के बारे में सवाल खड़े किए हैं. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज कर कॉलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा था.

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हालांकि पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कॉलेजियम और चयन प्रक्रिया में और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता जताई थी. पिछले दिनों हुए जजों के तबादलों पर आपत्ति जताने वाले जस्टिस चेलमेश्वर ने बैठकों में भाग लेने से असमर्थता जताते हुए कहा था कि पांच सदस्यों वाले कॉलेजियम में विचार-विमर्श का कोई ब्यौरा नहीं रखा जाता. इसके चलते बैठकों में भाग लेने का कोई औचित्य नजर नहीं आता.

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जस्टिस चेलमश्वर ने कॉलेजियम के एजेंडे को सदस्यों के बीच प्रसारित करने की जरूरत भी बताई है. सूत्रों के मुताबिक चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने जस्टिस चेलमेश्वर से यह पत्र वापस लेने का आग्रह भी किया था लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया..

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह पहला अवसर है जब ज्यादा पारदर्शिता के समर्थन में एक वरिष्ठ जज ने कॉलेजियम की बैठक का बहिष्कार करने का निर्णय किया है. जस्टिस चेलमेश्वर 2018 में रिटायर होंगे. एनजेएसी मामले में वे अकेले जज थे जिन्होंने पूरी पीठ से भिन्न मत दिया था. उन्होंने सरकार द्वारा प्रस्तावित एनजेएसी कानून के पक्ष में फैसला देते हुए कॉलेजियम व्यवस्था को अपारदर्शी और अप्रभावी बताया था.

जस्टिस चेलमेश्वर ने एक सितंबर को चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर को तीन पन्नों का पत्र लिखकर अपारदर्शी रवैए की बात कही

सरकार एक उपनियम पेश करना चाहती थी जिससे सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति, पदोन्नति उत्कृष्टता के साथ वरिष्ठता के आधार पर ही हो न कि वरिष्ठता के साथ उत्कृष्टता के आधार पर. केंद्र सरकार सेवानिवृत्त जजों को भी नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहती थी. पर वह कॉलेजियम को स्वीकार्य नहीं था क्योंकि इसका मतलब यह होता कि कोई वरिष्ठ जज जो भले ही हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश न हो लेकिन उसके सुप्रीम कोर्ट में पदस्थापन पर विचार किया जा सकता है. साथ ही इसका एक मतलब यह भी होता कि हाईकोर्ट में एक कनिष्ठ जज इस व्यवस्था में पदोन्नति पाकर वरिष्ठ जज के ऊपर हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश भी बन सकता था.

सरकार जजों की नियुक्ति में वीटो पॉवर भी अपने हाथ में रखना चाहती थी. इसके तहत वह किसी भी जज को, जिसकी नियुक्ति की अनुशंसा हुई है, राष्ट्रीय सुरक्षा और न्याय की सुरक्षा के नाम पर खारिज कर सकती थी. पूर्व में एमओपी के तहत केंद्र सरकार को किसी जज के नाम की अनुशंसा पर दोबारा विचार करने के लिए उसे कॉलेजियम के पास वापस भेजने का अधिकार था. पर अगर कॉलेजियम दोबारा उसके नाम की अनुशंसा कर देता तो केंद्र को उसे स्वीकर करना पड़ता. लेकिन संशोधित एमओपी में केंद्र सरकार ने कहा है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी भी नाम को खारिज कर सकती है.

इस उपनियम को स्वीकारने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के प्रस्ताव को नकार दिया. इस उपनियम के लागू होने की सूरत में कार्यपालिका नियुक्ति प्रक्रिया में सर्वोपरि हो जाती. कॉलेजियम को अहसास हुआ कि सरकार द्वारा प्रस्तावित नियम भविष्य में किसी उम्मीदवार के जज बनने की संभावनाओं पर आघात करेगा. जबकि सरकार की सोच थी कि इससे चयन में पारदर्शिता बढ़ेगी और भविष्य में किसी उम्मीदवार की नियुक्ति के दावों का आकलन किया जा सकेगा.

उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक जस्टिस चेलमेश्वर का कदम सरकार के कदम के साथ है. उनका पत्र भी ऐसे समय में आया है जब सरकार और न्यायपालिका नए एमओपी पर भिड़े हुए हैं. सीजेआई टीएस ठाकुर सार्वजनिक रूप से सरकार की 200 जजों की नियुक्ति और तबादले न करने को लेकर आलोचना कर चुके हैं.

जस्टिस चेलमेश्वर अब शायद भविष्य में होने वाली कॉलेजियम की बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे, जब तक की उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती. इन मीटिंग में भाग न लेकर जस्टिस चेलमेश्वर सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक योद्धा के तौर पर याद किए जाएंगे. देखना है कि उनकी यह लड़ाई कितनी फलदायक सिद्ध होती है.

First published: 7 September 2016, 8:11 IST
 
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