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जस्टिस ढींगरा रिपोर्ट: क्या यह रिपोर्ट अंतत: कांग्रेस और वाड्रा को बचाने का काम करेगी?

आकाश बिष्ट | Updated on: 2 September 2016, 8:29 IST

दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एसएन ढींगरा ने गुड़गांव में जमीन के सीएलयू (चेंज ऑफ लैंड यूज) और कॉमर्शियल कॉलोनियों के 250 लाइसेंस देने का मामला, जिसमें से एक रॉबर्ट वाड्रा को भी आवंटित किया गया है, की 182 पन्नों की जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को बुधवार को सौंप दी है.

मीडिया से बात करते हुए जस्टिस ढींगरा ने संकेत दिया कि कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कार्यकाल के दौरान भूमि आवंटन में अनियमितताएं बरती गईं. कहा जाता है कि उन्होंने उन सभी सरकारी अधिकारियों और निजी लोगों पर कार्रवाई की सिफारिश की है जो इस मामले में लिप्त थे.

हालांकि, इस रिपोर्ट को लेकर कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिन पर जस्टिस ढींगरा को खुद जवाब देने की जरूरत है.

जस्टिस ढींगरा की विफलता

एक साल लम्बी जांच अवधि के दौरान उन्होंने वाड्रा या हुड्डा को समन क्यों नहीं जारी किया? उनकी इस विफलता से रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा होता है. आश्चर्यजनक रूप से, उनकी इस असफलता पर मामले से जुड़े दोनों पक्षों ने सवाल खड़े किए- कांग्रेस और अशोक खेमका का समर्थन कर रही अधिकारियों की टीम, क्योंकि इसी कारण से वाड्रा जांच के घेरे में आए थे.

एक ब्यूरोक्रेट का कहना है कि उनकी राय है कि अदालत में ढींगरा की उनकी जांच का कोई मायने नहीं होगा. यह असल में निर्णय है जांच नहीं है. जस्टिस ढींगरा जांच और निर्णय का अंतर करने में विफल रहे हैं.

यह खेमका ही थे जिन्होंने डीएलएफ के साथ वाड्रा के विवादित भूमि सौदे की जांच की थी और सौदे को निरस्त किया था. फिर भी ढींगरा ने कभी भी किसी भी तरह के स्पष्टीकरण के लिए खेमका को तलब ही नहीं किया. जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो रिटायर्ड जज ने जवाब दिया कि ऐसा करने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी.

कैच से बातचीत करते हुए खेमका ने कहा कि अभी वह इस रिपोर्ट पर टिप्पणी करना पसन्द नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें अभी यह रिपोर्ट पढ़नी है. खेमका ने कहा, 'मैंने इस रिपोर्ट को नहीं पढ़ा है, ऐसे में मैं इस पर टिप्पणी कैसे कर सकता हूं. और जस्टिस ढींगरा ने मुझे बुलाने की जरूरत नहीं समझी, यह तो उन पर निर्भर है. इस सबके बाद, वह एक आयोग के मुखिया हैं न कि मेरे.'

कांग्रेस और खेमका की टीम के सदस्य जिनका कमीशन ऑफ इनक्वायरी एक्ट की धारा आठ-(बी) और (सी) के तहत हवाला दिया गया है, दोनों का दावा है कि रिपोर्ट के तथ्यों से कभी भी यह साबित नहीं होगा कि वाड्रा या हुड्डा ने कोई गलत काम किया है.

कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ढींगरा आयोग की रिपोर्ट पर कहते हैं कि जिस किसी के खिलाफ जांच होती है, उसे धारा आठ (बी) और (सी) के तहत अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है. हम सभी जानते हैं कि शाह जांच आयोग और बंसीलाल जांच आयोग की रिपोर्ट को रद्द कर दिया गया था क्योंकि किसी को अपनी बात कहने के लिए समुचित तरीके से नोटिस नहीं दिया गया था.

जस्टिस ढींगरा कहते हैं कि वाड्रा की कम्पनी को प्रश्नावली भेजी गई थी और हुड्डा को दो बार समन भी जारी किए गए थे

ऐसे तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का कोई मतलब नहीं रह जाता, यदि ऐसे व्यक्ति को ही अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया हो जिसके खिलाफ जांच की जा रही है. जब ऐसी रिपोर्ट का खुलासा होगा तो उसका क्या भविष्य होगा.

अपने बचाव में जस्टिस ढींगरा कहते हैं कि वाड्रा की कम्पनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्रा लि को प्रश्नावली भेजी गई थी और हुड्डा को दो बार समन भी जारी किए गए थे लेकिन वे जवाब देने के लिए हाजिर नहीं हुए.

इस पर हरियाणा कैडर के एक ब्यूरोक्रेट का कहना है कि यदि वह लोग सहयोग नहीं कर रहे थे तो आयोग को कुछ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी ताकि सौदे से सम्बंधित और ज्यादा जानकारी ले पाना सुनिश्चित होता.

इस ब्यूरोक्रेट के अनुसार इस मामले में तीन अन्य अधिकारियों को भी तलब नहीं किया गया जिन्होंने 2008 में इस सौदे को क्लीन चिट दी थी. यहां तक कि ओमकारेश्वर प्रॉपर्टी, जिससे वाड्रा की कम्पनी ने जमीन खरीदी थी, उससे भी पूछताछ नहीं की गई. 

इस अधिकारी ने यह भी कहा कि ओमकारेश्वर प्रॉपर्टी ने सौदे में गड़बड़ी वाला कोई चैक बैंक में नहीं पेश किया. इस अधिकारी ने यह भी कहा कि यह रिपोर्ट शर्म करने वाली है जिसे ऐसे व्यक्ति ने पेश किया है जो कानूनी मुद्दों का विशेशज्ञ है. उसके द्वारा ऐसा करना भयावह है.

उन्होंने कहा कि ऐसे निर्णयों से रिपोर्ट में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और उसकी सत्यनिष्ठा पर संदेह खड़ा होता है. वैसे हुड्डा सरकार द्वारा कॉलोनियों के लिए 250 लाइसेंस जारी किए गए थे. इसमें वाड्रा का 3.5 एकड़ का वह प्लाट भी है जो सुर्खियों में रहा है. 

हरियाणा सरकार पूर्व की कांग्रेस सरकार की लाइसेंस आवंटन नीति को अभी तक कैसे जारी रखे हुए है

खेमका हतप्रभ थे कि कैसे 2008 में 7.5 करोड़ में खरीदे गए प्लॉट को कुछ ही महीनों में 58 करोड़ रुपए में डीएलएफ को बेच दिया गया. यह विवाद तभी से सबके सामने है. हरियाणा में सरकार बदली तभी जांच शुरू हुई.

इस बीच कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि रिपोर्ट के अंश मीडिया में कैसे लीक हो गए. और हरियाणा सरकार पूर्व की कांग्रेस सरकार की लाइसेंस आवंटन नीति को अभी तक कैसे जारी रखे हुए है. 

सुरजेवाला कहते हैं कि इस सरकार, विशेषकर मोदी और अमित शाह का उद्देश्य घातक, पूर्वाग्रह के तहत कार्रवाई वाला और कांग्रेस पार्टी को निशाने पर लेना वाला है. वह आगे कहते हैं कि किसी भी गड़बड़ी किसी भी गलत नीति और कानून के किसी उल्लंघन की चर्चा तक नहीं होती.

जस्टिस ढींगरा को नवजात आयोग बताते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने हरियाणा में भाजपा सरकार से कुछ कृपादृष्टि स्वीकार कर एक स्वतंत्र निर्णायक की अपनी स्थिति से समझौता कर लिया है.

वाड्रा के वकील सुमन खेतान ने कहा है कि यदि सरकार यह महसूस करती है कि मेरा मुवक्किल बुरा इंसान है और जमाई बाबू हैं तो वे रिपोर्ट को छिपा क्यों रहे हैं. रिपोर्ट को सामने लाइए. 

वह आगे कहते हैं कि अब आप मुझे बताएं यदि आप किसी को समन जारी नहीं करते तो आप उसमें कैसे रुकावट डाल सकते हैं. क्या यह धारा आठ (बी) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त को तोड़ना नहीं है. लेकिन इसका श्रेय दीजिए, जस्टिस ढींगरा ने मेरे मुवक्किल के खिलाफ कुछ नहीं कहा है.

First published: 2 September 2016, 8:29 IST
 
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