Home » इंडिया » Justice Karnan becomes first High Court judge to retire while on the run
 

जाते-जाते भी जस्टिस कर्णन रच गए इतिहास

एस मुरारी | Updated on: 14 June 2017, 11:57 IST
एएफपी

कोर्ट की अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई जेल की सज़ा काटने वाले देश के पहले न्यायाधीश कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन 12 जून को ऐसे समय सेवानिवृत्त हुए जब उनके ख़िलाफ़ मुकदमा चल रहा है. देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. और देश की न्यायपालिका के इतिहास में भी पहली बार ही ऐसा हुआ है कि किसी सेवानिवृत्त होने वाले न्यायाधीश के सम्मान में उसकी बेंच की बार ने पारम्परिक विदाई समारोह का आयोजन न किया हो. दरअसल जस्टिस कर्णन 9 मई के बाद से ही फरार हैं.

सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट जस्टिस कर्णन को दी गई छह महीने की कैद की सजा के अपने आदेश पर अडिग रहता है या वह सजायाफ्ता जज के पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए अपना आदेश रद्द कर देता है. कर्णन दो दिन पहले ही रिटायर हुए हैं. फिलहाल अदालत को जस्टिस कर्णन को दोषी साबित करने वाला आदेश विस्तार से सुनाना है. 9 मई को जस्टिस कर्णन के खिलाफ आदेश आने के बाद से उनके मामले की सुनवाई कर रही सात सदस्यीय पीठ में से एक जस्टिस पिनाका चंद्र घोष रिटायर हो चुके हैं.

अब इस मामले की सुनवाई के लिए नए सिरे से पीठ का गठन होगा. हालांकि जब तक जस्टिस कर्णन को दोषी करार देने वाले आदेश पर कार्रवाई नहीं की जाती, इस संबंध में संदेह ही है कि जस्टिस कर्णन को किसी प्रकार के लाभ मिलेंगे. जस्टिस कर्णन ने अपनी सजा निलंबित करवाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगवाई है.

 

घटनाक्रम

सुप्रीम कोर्ट ने सारे तौर-तरीके आजमाने के बाद जस्टिस कर्णन के खिलाफ उक्त कड़ा फैसला सुनाया. दरअसल जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. न्यायिक कार्यवाहियों से बेदखल करने के बावजूद जस्टिस कर्णन ने देश के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर और उनके साथी छह अन्य जजों को अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम के तहत दोषी करार देते हुए उन्हें पांच साल के कठोर कारावास की सजा का आदेश पारित कर दिया था.

इस पर पीठ ने कहा कि जस्टिस कर्णन मानसिक तौर पर स्वस्थ नहीं हैं और अपना बचाव करने में अक्षम हैं. इसलिए उनका मनोचिकित्सकीय परीक्षण किया जाए. आशंकाओं को सही साबित करते हुए जस्टिस कर्णन ने चिकित्सकीय परीक्ष्ण करवाने से इनकार कर दिया. कोलकाता पुलिस इसके लिए उनके निवास स्थान पर गई थी. उन्होंने पुलिस को तर्क दिया कि संरक्षकों की अनुपस्थिति में उन्हें ऐसे किसी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

इस पर अदालत ने उन्हें छह महीने की कैद का आदेश सुना दिया. इससे ठीक एक दिन पहले ही जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के आठ जजों की गिरफ्तारी के आदेश दिए थे. अपने खिलाफ आदेश आने के बाद वे चेन्नई चले गए और जब कोलकाता पुलिस ने उनका पीछा किया तो वे फरार हो गए. इस तरह वे 9 मई से ही फरार चल रहे हैं. उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ है और पुलिस को सिर्फ इतना मालूम है कि वे आंध्र प्रदेश के एक धार्मिक स्थल श्रीहलहस्ति (चेन्नई के पास) की ओर गए थे. तमिलनाडु पुलिस की मदद के बावजूद जस्टिस कर्णन फिलहाल पुलिस गिरफ्त से दूर हैं.

 

रहम की अपील

एक ओर तो जस्टिस कर्णन फरार है, वहीं दूसरी ओर, एक वकील ने उनकी ओर से याचिका दायर कर उनकी गिरफ्तारी के आदेश की समीक्षा के आदेश दिए हैं. याचिका में जस्टिस कर्णन ने अपील की है कि न तो वे देश के मुख्य न्यायाधीश और न ही सात सदस्यीय पीठ के मातहत काम कर रहे थे, इसलिए केवल राष्ट्रपति ही उन पर दोषारोपण कर सकते हैं.

मुख्य न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने हालांकि उनकी याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि उन्होंने गंभीर तौर पर अदालत की अवमानना की है. सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने जस्टिस कर्णन की एक अन्य याचिका भी खारिज कर दी जिसमें उन्होंने कहा था कि दोषी करार दिए जाने के बावजूद अदालत की अवमानना करने वाले की सजा माफ़ की जा सकती है, अगर वह बिना शर्त माफी मांग ले.

सच्चाई तो यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने कोर्ट से अपील की कि जस्टिस कर्णन को सेवानिवृत्त कर दिया जाए, तो सीजेआई ने नाराजगी जताते हुए कहा था, "अदालत की अवमानना के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जाता...न ही यह देखा जाता है कि दोषी पदासीन है या नहीं. अगर उन्होंने सोचा कि वे पद पर हैं, इसलिए हम उन्हें सजा नहीं देंगे, तो यह ग़लत है."

 

विवादों से पुराना नाता

जस्टिस कर्णन मद्रास हाईकोर्ट के जज रहते हुए भी विवादों में घिर गए थे, जिसका नतीजा यह हुआ कि उनका तबादला कलकत्ता हाई कोर्ट में कर दिया गया. वर्ष 2011 में कर्णन ने अपने साथी जज पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाने के लिए चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली थी. इसके बाद 2015 में उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल के खिलाफ स्वतःस्फूर्त अवमानना मामले की सुनवाई शुरू कर दी. कर्णन का आरोप था कि कौल ने दलित होने के नाते उन्हें प्रताड़ित किया.

एक बार जस्टिस कर्णन मद्रास हाईकोर्ट में जबरन अदालत के एक कक्ष में घुस गए और मांग की कि उन्हें भी मामले की सुनवाई सुनने की इजाज़त दी जाए. उस वक्त उन्होंने कहा था, "कॉलेजियम प्रणाली मनमाने तरीके से काम करती है." साथ ही कहा कि संगठित तौर पर काम करने वाली न्याय प्रणाली के लिए प्रस्तावित न्यायिक नियुक्ति आयोग सर्वाधिक उपयुक्त है. जब उन्होंने खंडपीठ के फ़ैसले में दखल देने की कोशिश की और सीजेआई को इस बारे में अवगत करवाया गया, तो उन्होंने तुरंत जस्टिस कर्णन का तबादला कोलकाता कर दिया.

 

न्यायिक दांव-पेंच

जजों के अनुशासन के लिए न्यायाधीश (पूछताछ) अधिनियम 1968 के अनुसार, दोष कम करने के कोई उपाय नहीं हैं. अब सवाल यह उठता है कि क्या अदालत स्वप्रसंग ज्ञान से अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकती है? दूसरा, क्या किसी जज को अवमानना की कार्यवाही के तहत पदच्युत किया जा सकता है, जबकि उसकी नियुक्ति महामहिम राष्ट्रपति द्वारा की गई हो या फिर उन्हें पद से हटाने के लिए दोषी करार देना ही एक मात्र विकल्प है?

ऐसा संभव है कि 62 की उम्र में रिटायर होने वाले जस्टिस कर्णन के आग्रह पर एक दोषी जज को दी जाने वाली कैद की सजा रद्द कर दी जाए और भारत के न्यायिक इतिहास का यह काला अध्याय बंद हो जाए.

First published: 14 June 2017, 11:57 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी