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जस्टिस धींगरा विवादों में भले रहे हों उनकी ईमानदारी 'बेदाग' है

आकाश बिष्ट | Updated on: 5 July 2016, 7:06 IST
(गेट्टी)

जस्टिस एसएन धींगरा मीडिया की सुर्खियों में हैं. जस्टिस धींगरा एक सदस्यीय आयोग के प्रमुख के तौर पर गुड़गांव में कुछ कंपनियों के बीचे हुए जमीन के सौदों की जांच कर रहे हैं. 

इस जांच के घेरे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी और रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के बीच हुए एक सौदा भी है.

जांच की रिपोर्ट आने से पहले ही कांग्रेस पार्टी ने जस्टिस धींगरा के ऊपर तीखा हमला शुरू कर दिया. कांग्रेस ने उन पर बीजेपी शासित हरियाणा सरकार से लाभ लेने का आरोप लगाया है.

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कांग्रेस ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस धींगरा द्वारा 'पद के अनुचित लाभ लेने' के कारण 'आयोग को भंग' किए जाने की मांग की.

धींगरा पहली बार विवादों में नहीं आए हैं. अपने दो दशकों से लंबे करियर में धींगरा को त्वरित कार्रवाई के झंडाबरदार जज के तौर पर देखा जाता रहा है. वहीं उनका आलोचक उन्हें 'बड़बोला और पक्षपाती' कहते हैं. लेकिन अब तक उन पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप कभी नहीं लगा है.

कांग्रेस की धींगरा के प्रति नाराजगी के पीछे उनका इतिहास भी है. धींगरा ने जज रहते हुए दो पूर्व कांग्रेसी मंत्रियों को सजा सुनाई थी. उस समय धींगरा की छवि इतनी कद्दावर थी कि कांग्रेसी उनसे सीधे टकराने की हिम्मत नहीं कर सके.

धींगरा बनाम कांग्रेस

एसएन धींगरा ही वो जज थे जिसके चलते कांग्रेसी नेता एचकेएल भगत को 1984 दंगों से जुड़े मामलों में जमानत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ गया था. धींगरा से पहले इस मामले में 11 सालों से कोई खास प्रगति नहीं हुई थी. धींगरा ने पीड़ित विधवा का बयान दर्ज किया था, जिसकी वजह से भगत को जेल जाना पड़ा था.

धींगरा ने इस आधार पर भगत को जमानत देने से मना कर दिया कि वो गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं. बाद में अदालत में कई चक्कर काटने के बाद ही भगत को जमानत मिल पाई थी.

एक सुनवाई के बाद भगत ने सीने में दर्द की शिकायत की तो उन्हें तुरंत अस्पातल ले जाया गया लेकिन धींगरा ने उन्हें जमानत देने से मना कर दिया और मेडिकल रिपोर्ट की मांग की. जब डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भगत को जेल भेजने में कोई दिक्कत नहीं है तो धींगरा ने उन्हें जेल भेज दिया.

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जस्टिस धींगरा ने वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं एचएल भगत और कल्पनाथ राय के खिलाफ कड़े फैसले दिए थे

धींगरा की अदालत में सिख दंगों से पीड़ित पूर्वी दिल्ली के मामले विचाराधीन थे. इंसाफ का इंतजार करने वालों को उन्होंने निराश नहीं किया. 

मनोज मित्ता और एसएस फुल्का ने सिख दंगों पर लिखी अपनी किताब 'व्हेन अ ट्री शूक दिल्ली' में लिखा है, "1994-95 में जब धींगरा ट्रायल कोर्ट जज थे, तो उन्होंने करीब 100 मामलों को एक ही मामले के तहत कर दिया ताकि मुकदमे में गैर-जरूरी वक्त न खर्च हो. उन्होंने 1997 में मामले का फैसला भी सुना दिया."

धींगरा ने अपने फैसले में कहा था, "जिस तरह दंगों से जुड़े मामलों की सुनवाई चलती है उसकी किसी सभ्य देश में कल्पना भी नहीं की जा सकती. दरअसल, मुकदमे में असामान्य देरी दंगाइयों की हिंसा और अपराध को वैधानिक बना देती है. जिस व्यवस्था में अपराधियों की हिंसा और अपराध की प्रक्रियागत जटलिताओं से जांच को बाधित किया जाता है, वो आम जनता को न्याय देगी, इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. ये एक तरह से कानून व्यवस्था को पूरी तरह साफ कर देने जैसा है."

जस्टिस धींगरा को राजनीति और राजनेताओं के प्रति कड़े रुख के लिए जाना जाता है. उनके इस रुख का शिकार एक अन्य कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री कल्पनाथ राय भी हुए थे. चीनी घोटाले में राय को धींगरा की अदालत से राहत नहीं मिली और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी थी. हालांकि बाद में राय को भी आरोपों से बरी कर दिया गया.

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लेकिन इसके बाद भी राय का धींगरा से पीछा नहीं छूटा. 1997 में धींगरा की अदालत ने राय को अंडरवर्ल्ड के अपराधियों को शरण देने के लिए 10 साल की सजा सुनाई थी. बाद में राय इस मामले में भी बरी हो गए लेकिन उन्हें जानने वालों के अनुसार तिहाड़ से निकलने के बाद राय पहले से बदल गए थे.

1996 में राय के मुकदमे की सुनवाई के दौरान धींगरा ने उन्हें संसद सत्र में शामिल होने की इजाजत नहीं दी थी. उन्होंने संसद को 'मछली बाजार' कह दिया था, जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने आपत्ति जताई. दिल्ली हाईकोर्ट से फटकार मिलने के बावजूद धींगरा के तेवर नरम नहीं हुए. वो उन पर कार्रवाई करने की मांग करने वाले सांसदों का सामना करने को तैयार थे.

धींगरा ने बहुचर्चित नीतीश कटारा मामले में भी ठोस और तेज सुनवाई की थी, जिसके बाद पूरे देश के न्यायविदों ने उनकी तारीफ की थी. संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के मामले में भी वही जज थे. दो पत्रकारों अनिरुद्ध बहल और सुहासिनी राज ने कई सासंदों का स्टिंग किया था. धींगरा ने दोनों पत्रकारों को सभी आरोपों से बरी कर दिया था.

विवाद

धींगरा विवादों से भी अछूते नहीं रहे हैं. 2006 में नवरत्न चौधरी से उन्होंने कहा था कि मुझे पता है कि महिला वकील किस तरह आगे बढ़ती हैं. जब नवरत्न ने जवाब देते हुए उनसे कहा कि आपको मेरी गरिमा को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए तो धींगरा ने कहा, "आपके पास कोई गरिमा नहीं है जिसे ठेस पहुंचाया जा सके." 

उनके बयान के खिलाफ नारीवादी कार्यकर्ताओं ने कड़ा प्रतिवाद किया. दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें इस मामले में समन भी किया था.

धींगरा ने पोटा की विशेष अदालत के जज के तौर पर संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु और एसएआर गिलानी समेत अन्य को दिसंबर 2002 में दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी. गिलानी ऊपरी अदालत से बरी हो गए थे. इस मामले में धींगरा की 'पूर्वाग्रह के कारण विद्वेष' दिखाने के लिए आलोचना हुई थी.

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सामाजिक कार्यकर्ता नंदिता हक्सर ने उनके फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए लिखा था, "...एसएन धींगरा ने बचाव पक्ष को सरकारी गवाहों से पूछताछ न करने देकर अपने विद्वेष और पूर्वाग्रह का प्रदर्शन किया. उसके बाद उन्होंने बचाव पक्ष के गवाहों के संग अभियोजन पक्ष की तरह बरताव किया." बाद में रद्द कर दिए पोटा कानून के तहत ये मौत की सजा सुनाने का पहला मामला था.

उनके आलोचक उन पर आसानी से प्रभावित हो जाने का आरोप लगाते हैं. 1996 में जब दो वकीलों ने उन पर सिख दंगों में उनका नाम घसीटने का आरोप लगाया तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने उनके खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था. दिल्ली हाई कोर्ट की राह धींगरा के लिए आसान नहीं थी.

पारिवारिक पृष्ठभूमि

1949 में जन्मे धींगरा साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता पंजाब से आए प्रवासी मजदूर थे. कठिन हालात में भी उनकी मां ने उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया. दिल्ली सरकार के नगर निगम स्कूल में पढ़ाई करने वाले धींगरा को परिवार की माली हालत के चलते कम उम्र में ही छोटी-मोटी कई नौकरियां करनी पड़ीं.

पढ़ाई में तेज धींगरा ने पहले डिप्लोमा इंजीनियरिंग की उसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीएससी किया. 1979 में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एलएलबी में प्रवेश लिया.

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धींगरा ने दिल्ली में करीब 10 सालों तक वकालत की. इस दौरान उन्होंने मैट्रिमोनियल लॉ रिपोर्टर का संपादन भी किया. 1985 से 1987 तक वो दिल्ली यूनिवर्सिटी में अस्थाई लेक्चरर भी रहे. 6 जनवरी 1988 को उन्होंने एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज के तौर पर पदभार ग्रहण किया.

संभव है कि धींगरा के कुछ पूर्वाग्रह हों लेकिन उनकी ईमानदारी पर कभी शक नहीं किया गया. जब कांग्रेस ने उन पर हमला किया तो दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मारकण्डेय काटजू तुरंत उनके बचाव में उतर गए. काटजू ने ट्वीट किया, "भारतीय मीडिया के एक तबके को शर्म आनी चाहिए जो जस्टिस धींगरा पर निशाना साध रही है. वो मेरे जानने वालों में सबसे ईमानदार जजों में हैं." काटजू ने एक ब्लॉग लिखकर भी धींगरा की ईमानदारी और काबिलियत का बचाव किया.

First published: 5 July 2016, 7:06 IST
 
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