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जुवेनाइल जस्टिस बिल: कानून के नए दरवाजे नहीं आंख खोलने की जरूरत है

सौम्या शंकर | Updated on: 25 December 2015, 8:13 IST
QUICK PILL
संसद\r\nने जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम\r\nमें संशोधन कर नया कानून पास\r\nकर दिया है. संसद\r\nके अंदर और बाहर इसको लेकर\r\nजबर्दस्त गहमा गहमी रही.\r\nइस मुद्दे\r\nपर नेता और सामाजिक कार्यकर्ताओं\r\nके बीच कई\r\nतरह के टकराव रहे.किशोर\r\nअपराधों को लेकर पैदा हुई तमाम\r\nउलझनों को साफ करने के लिए कैच\r\nने राजेश कुमार से बात की.\r\nकुमार सोसाइटी\r\nफॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस\r\nके निदेशक हैं. कुमार\r\nको ऐसे नाबालिग बच्चों के साथ\r\nकाम करने का लंबा अनुभव है जो\r\nकिसी वजह से गलत रास्ते पर चले\r\nजाते हैं.
किशोर\r\nअपराधियों से कैसे निपटना\r\nहै, इसके\r\nलिए किस तरह की संवेदना और\r\nतकनीकों की जरूरत है इस पर\r\nकुमार से हुई बातचीत के अंश:

आप किशोर अपराधियों को सुधारने के लिए लंबे समय से काम कर रहे हैं. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन को आप किस तरह से देखते हैं?

मुझे इसमें संशोधन से कोई परेशानी नहीं है. असल समस्या ये है कि इस को लागू करने वाला ढांचा कमजोर है. देश में 664 जिले हैं, आप बताइए उनमें से कितने ज़िलों में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, ऑब्ज़र्वेशन होम और चिल्ड्रन होम हैं. अगर आप किसी कमजोर ढांचे पर नई जिम्मेदारियां लाद देंगे तो कल को वह ढह जाएगा. इसके असफल होने की सूरत में किशोर अपराधियों से जुड़े मामले ज़िला अदालतों में जाएंगे, अदालतें उन्हें ज़िला कारागारों में भेजेंगीं, वहां से ये किशोर कैसे निकलेंगे, किस रूप में इनका विकास होगा? इसकी कोई व्यवस्था बनाई है? पहले बुनियाद मजबूत कीजिए फिर उस पर कानून खड़ा कीजिए.

हम किशोर अपराधियों को दूसरा मौका नहीं देना चाहते. जरा सोचिए कि दुनिया भर में किशोरों के लिए अलग कानून का प्रावधान है तो इसके पीछे कुछ सोच रही होगी. साल 2000 में हमारे यहां जो जुवेनाइल जस्टिस कानून बना था उसका मसौदा इन्हीं मेनका गांधी ने तैयार किया था जो आज इसमें संशोधन ला रही हैं. किशोर कानून में निहित दूरदर्शी सोच को लोग समझ नहीं पा रहे हैं. ज्योति सिंह के साथ जो हुआ वो बहुत ही डरावना था, लेकिन इस घटना के आधार पर ऐसा कानून नहीं ला सकते जो पूरी ताकत पुलिस के हाथ में सौंप दे. अधिकतर गरीब बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं होता. हमारे पास ऐसे किशोरों की असली उम्र तय करने की कोई व्यवस्था है? दिल्ली जैसे शहरों में आप 'बोन डेंसिटी टेस्ट' करवा लेंगे पर बुलंदशहर या बदायूं जैसे छोटे शहरों में पुलिस कैसे निपटेगी इस समस्या से? इन बातों को नजरअंदाज करके हम किशोरों को खतरे में डाल रहे हैं.

आपके मुताबिक देश में कड़े कानून को सहारा देने के लिए ज़रूरी बुनियादी ढांचा नहीं है?

बिल्कुल... हमें तय करना होगा कि हम किशोरों के लिए ज्यादा स्कूल बनाना चाहते हैं या ज़्यादा जेल बनाना चाहते हैं. किशोर अपराध की ओर क्यों अग्रसर हैं, इस पर भी विचार होना चाहिए. देश में सबको शिक्षा के अधिकार का कानून लागू है. इसका सीधा अर्थ है कि हर बच्चे को स्कूल में होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. हम सुपरपावर बनने का सपना तो देखते हैं लेकिन अपने बच्चों की हिफाज़त नहीं कर सकते?

ये तो हुई कानूनी ढांचे की बात. सामाजिक ढांचे में किस तरह के बदलाव ज़रूरी हैं? आखिर क्यों 16-17 साल के किशोर अपराध की तरफ मुड़ रहे हैं? ऐसे किशोरों के प्रति समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी क्या है?

ज्योति बलात्कार केस में शामिल किशोर को सबसे बड़ा शैतान बनाकर पेश किया गया. जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और दूसरे स्रोतों के मुताबिक वो लड़का गुनाह के वक्त मौजूद ज़रूर था लेकिन उसने वो सारी चीज़ें नहीं की जिसका आरोप उसपर लगा. ज्योति के बयान से भी इस बात की पुष्टि होती है. मैं सही या गलत का फैसला नहीं सुना रहा हूं मगर कुछ लोगों ने एक गलत तस्वीर पेश की और सब लोग उसे सच मानने लगे. उस लड़के को चरमपंथी भी कहा गया.

जिस बच्चे ने सड़क पर ज़िंदगी बिताई हो, जिसे न जात का पता है न धर्म का पता है, वो कैसे चरमपंथी हो सकता है? मेरे कुछ जानकारों ने मुझे बताया कि उसने कुछ वक्त के लिए शौकिया दाढ़ी बढ़ा ली थी. बच्चे अक्सर ऐसा करते हैं. इसका ये मतलब नहीं है कि वो आतंकवादी हो गया. तथ्यों को जाने बगैर हम इसे अंतिम सत्य नहीं मान सकते.

ये तो एक केस की बात हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर बात करें तो समाज से कहां गलती हो रही है?

बच्चा जब पहली बार गुनाह करता है तो हम उसे परिवार और समाज के स्तर पर नजरअंदाज करते हैं. ऐसे अपराधों में परिवार से बात करना या उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड तक ले जाना पुलिस की ज़िम्मेदारी है. लेकिन पुलिस भी इस जिम्मेदारी को नहीं निभाती. गुनाह की ओर बढ़ने वाले ज़्यादातर बच्चे नशे की लत का शिकार हैं. आप बताइये पूरे देश में बच्चों के लिए कितने नशा निवारण केंद्र हैं? एक बच्चा जो 500-600 रुपये का नशा रोज़ कर रहा है वो पैसा कहां से लाएगा? ये पैसा वो सिर्फ अपराध के ज़रिए ही कमा सकता है. ज्योति के मामले में भी अपराधियों ने पहले शराब पीने के बाद नशे की हालत में बलात्कार किया.

सरकारें राजस्व के लिए शराबखोरी को बढ़ावा दे रही हैं. लेकिन इसकी जो कीमत समाज को चुकानी पड़ रही है, उसके बारे में कोई नहीं सोच रहा है. हमारी सोच ये बन चुकी है कि कानून को कठोर कर देने से समस्या सुलझ जाएगी. क्या पोक्सो (POCSO) एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) आने के बाद बच्चों का शारीरिक शोषण बंद हो गया? हमने इसके लिए ज़रूरी ढांचा ही विकसित नहीं किया. स्कूलों में इस मसले पर जागरुकता नहीं बढ़ाई, इसलिए समस्या बरकरार है.

क्या वर्गीय भेदभाव भी ऐसे मामलों में जिम्मेदार है?

सारी सुरक्षा बड़े घरों के बच्चों के लिए है. ऐसे बच्चे स्थानीय स्तर पर ही सज़ा से बच निकलते हैं. वो महंगे वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं. हमने देखा है कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में काफी सीनियर वकील आ चुके हैं. मान लीजिए अभिषेक मनु सिंघवी किसी बच्चे की पैरवी के लिए पेश हो जाते हैं तो सामान्य मेजिस्ट्रेट के लिए विपरीत फैसला देना आसान नहीं होगा. गरीब बच्चों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है. स्टेट लीगल अथॉरिटी भी सब जगह मौजूद नहीं है. गरीब बच्चों के पास कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है. उन्हें ज़मानत तक नहीं मिल पाती.

कानूनी प्रक्रिया के इतर क्या आपको लगता है कि बच्चे आर्थिक असामनता के चलते अपराध कर रहे हैं?

ये बहुत हद तक मुमकिन है.

आपका अनुभव इस मामले में क्या कहता है?

मेरे सेंटर में एक बच्चा था. उसने स्वीकार किया कि वो मोबाइल चोरी करता था. उससे पूछा गया कि वो लोगों की गाढ़ी कमाई से खरीदे गए मोबाइल क्यों चुराता था. इसपर बच्चे का जवाब था कि वो सिर्फ अमीरों का मोबाइल चुराया करता था क्योंकि गरीबों के पास मुश्किल से पैसा आता है. अधिकारियों ने जानना चाहा कि उसे कैसे पता चलता था कि कौन अमीर है और कौन गरीब? बच्चे का जवाब था कि वो कपड़ों से ये भांप लेता था. यह बात कहीं न कहीं सही है. वर्ग-भेद का असर उस बच्चे के मन पर पड़ा होगा. हालांकि हम लोगों ने इस पहलू पर कोई शोध नहीं किया है. इसकी ज़रुरत है.

आपने किशोर अपराधियों को करीब से देखा है. क्या ऐसे अपराधों के पीछे आपको कोई पैटर्न नजर आता हैं?

जिन परिवारों में कलह है या कोई नशे की लत का शिकार है, उनमें किशोर अपराध ज़्यादा देखे गए हैं. हमने अपने यहां आने वाले बच्चों की पृष्ठभूमि पर शोध किया था. शोध में पाया गया कि बड़ी तादाद में ऐसे बच्चे उन परिवारों से आते हैं जिनमें कोई नशा करता है.

क्या किशोर अपराधों का किसी क्षेत्र और धर्म विशेष से भी ताल्लुक है?

ज़्यादातर किशोर अपराधी गरीब परिवारों से आते हैं. इनमें दलित, पिछड़े और मुस्लिम परिवारों के बच्चे ज्यादा होते हैं. अगड़ी जातियों में किशोर अपराधियों की तादाद कम है क्योंकि उनका सामाजिक ताना-बाना भिन्न है. अगड़ी जाति के ज़्यादातर परिवारों के पास बच्चों को जेल से बचाने का जरिया मौजूद हैं.

वीभत्स अपराधों वाले कितने मामले आपके सामने आए हैं?

हमारे पास आने वाले ज़्यादातर बच्चे नशे के आदी होते हैं. उन्हें अपनी लत पूरी करने के लिए रोज़ाना 1000-1500 रुपए की ज़रुरत होती है.

ऐसे बच्चे अमूमन किस तरह का नशा करते हैं?

ज़्यादातर बच्चे हेरोइन, स्मैक और गांजे की लत का शिकार होते हैं. अब ऐसे नशों के लिए बच्चे के पास पैसा कहां से आएगा? इसके लिए वो अक्सर लोगों को चाकू दिखाते हैं. अब वो चाकू कभी लग भी जाता है, कभी लोग डरकर पैसा दे देते हैं. इसमें हादसे की आशंका भी बनी रहती है. किशोर अपराध ज़्यादातर नशे से ही संबंधित होते हैं.

आपने अब तक किशोर अपराधों के कितने मामलों पर काम किया है?

करीब एक हज़ार...

इन दिनों सुधारवादी न्याय प्रक्रिया की बात चल रही है. ये दलील दी जाती है कि बच्चे जितनी जल्दी गुनाह की ओर मुड़ते हैं उतनी ही आसानी से सुधर भी सकते हैं. आपकी क्या राय है?

ये बिल्कुल सही बात है. बच्चों का हृदय परिवर्तन बहुत आसानी से होता है. मैंने ऐसे कई बच्चों को देखा है जिन्हें छंटा हुआ अपराधी कहा जाता था, लेकिन वो चार-छह महीनों में ही पूरी तरह सुधर गए...

क्या आप पाठकों को ऐसी कोई मिसाल दे सकते हैं?

हमारे पास सबसे पहले आने वाले किशोरों में मोहन (काल्पनिक नाम) था. उसकी उम्र करीब सत्रह साल थी. मोहन ने न्यायाधीशों के साथ भी अपनी कहानी साझा की थी. वो मर्डर, डकैती और लूट जैसे संगीन जुर्म कर चुका था. लेकिन हमारे यहां आने के बाद वो पूरी तरह सुधर गया. मैं उस पर इतना भरोसा करता था कि पूरी बिल्डिंग की चाबी भी उसे सौंप दिया करता था. पहले हमने उसे नशे की लत से छुटकारा दिलवाया फिर उसका पुनर्वास किया. अधिकतर बच्चे प्यार से ही बदल जाते हैं. एक बार वे बदलने लगते हैं फिर हम उनके भीतर छिपी प्रतिभाओं को बढ़ावा देते हैं.

आपकी राय में इसका सही उपाय क्या है, कठोर कानून या फिर इस तरह के सुधारवादी तरीके?

मैं अपने तरीके के प्रति सौ फीसदी आश्वस्त हूं. हमें ऐसे बच्चों के लिए सुधार कार्यक्रमों की ज़रुरत है. सुधार गृहों में बच्चों के साथ अपराधी की तरह बर्ताव करने की ज़रुरत नहीं है. हर बच्चे के सुधरने की अपनी गति होती है. यह बहुत धैर्य का काम है.

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को कड़ा करने के दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं?

असली दुष्परिणाम दो-चार साल बाद दिखेंगे. अगर कड़े कानूनों को लागू करने के लिए ज़रूरी तंत्र नहीं है तो उनके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है. हम आतंकवाद के खिलाफ कई कड़े कानून बना कर उनकी असफलता को देख चुके हैं.

ऐसे मामलों में पुलिस के रवैए को कैसे देखते हैं?

ज्यादातर पुलिसवालों को लगता है कि ये नाली के कीड़े हैं, उनको मर जाना चाहिए. हालांकि सभी पुलिसवालों के बारे में ये नहीं कह सकते. बहुत सारे पुलिसवाले इन मामलों में जरूरी संवेदना भी दिखाते हैं. समस्या निचले स्तर के पुलिसकर्मियों में ज़्यादा है.

पुलिस का रवैया किशोर अपराधियों के साथ इतना क्रूर क्यों होता हैं?

निचले स्तर के पुलिसकर्मी खराब हालात में काम करते हैं. काम के बोझ से दबे रहते हैं. ऐसे में किशोर अपराधी उनकी खीज निकालने का आसान जरिया बन जाते हैं.

क्या पुलिस को भी किशोर अपराधियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए किसी तरह के प्रशिक्षण की ज़रूरत है?

इस दिसा में बहुत सारे सुधार हो रहे हैं. लेकिन इन्हें और ज़्यादा व्यापक बनाने की ज़रुरत है. दिल्ली में हाईकोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमेटी ने काम करना शुरू किया है, हर थाने में दो-तीन पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग दी जा रही है.

लेकिन दिल्ली में किशोर अपराधों की तादाद में कोई कमी नहीं आई है?

इसका एक कारण यह भी है कि अब ज़्यादा मामले दर्ज हो रहे हैं. पोक्सो एक्ट में दर्ज होने वाले मामले भी इसी श्रेणी में रखे जा रहे हैं. किशोरों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले यौन संबंध भी इस कानून के दायरे में आते हैं. पहले ऐसा नहीं था. इससे किशोर अपराधों के आंकड़ों में इज़ाफा हुआ है. मेरा मानना है कि वास्तव में किशोर अपराध की दर में कमी आई है.

क्या आपको लगता है कि शराबबंदी से किशोर अपराध कम होंगे?

मुझे नहीं लगता उससे फर्क पड़ेगा. सबसे ज़्यादा अहम है स्कूलों की व्यवस्था में सुधार. हमारे पास आने वाले ज़्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. मैं व्यापक सुधारों के हक में हूं. हमें समझना होगा कि सभी बच्चे एक जैसे नहीं हो सकते. हमें शिक्षा में प्रतियोगिता की भावना को घटाना पड़ेगा.

आपको लगता है मीडिया के नए माध्यम भी किशोर अपराधों में इज़ाफे की वजह बन रहे हैं?

बहुत ज्यादा. इस दिशा में गहराई से विचार की ज़रूरत है.

बच्चों में सुधार के एक-दो उदाहरण और दीजिए?

ऐसे बहुत मामले हैं. एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में मेरे साथ एक बच्चा शरीक हुआ था. उसने बताया किस तरह उसके पिता ने नशे की लत में अपने परिवार को बर्बाद कर दिया था. सड़क पर आने के बाद वो बच्चा अपराध की ओर मुड़ा. लेकिन अब उसे सुधारा जा चुका है और वो अच्छी नौकरी कर रहा है.

आपको लगता है उन्मुक्त समाज से किशोर अपराध कम होंगे? या हमें ज़्यादा पाबंदियों की ज़रुरत है?

हमें बच्चों के साथ संवाद स्थापित करने की जरूरत है. नैतिकता का ढोल पीटने से कुछ नहीं होगा. आप आसाराम की मिसाल ले लीजिए. उन्होंने सारी ज़िंदगी नैतिकता का ही पाठ पढ़ाया. पर खुद किस मामले में जेल में हैं? एक और बाबा हैं रामदेव. कहने को बाबा हैं लेकिन करोड़ों का कारोबार करते हैं. उनके शिविरों के भी अलग-अलग रेट हैं. समाज में परिवर्तन से किशोर अपराध कम होंगे. आखिर बच्चे भी समाज का ही हिस्सा हैं. बेघर बच्चों की तादाद में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. मुद्दे का राजनीतिकरण होता रहेगा. हमें अपने काम पर ध्यान देना होगा.

First published: 25 December 2015, 8:13 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

A correspondent with Catch, Soumya covers politics, social issues, education, art, culture and cinema. A lamenter and celebrator of the human condition, she hopes to live long enough to witness the next big leap in human evolution or the ultimate alien takeover of the world.

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