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जन्मदिन विशेष: स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक, महान समाज सुधारक.. ज्योतिबा फुले

आदित्य साहू | Updated on: 11 April 2018, 12:41 IST

एक महान भारतीय विचारक, समाज सेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले को कौन नहीं जानता. सितम्बर 1873 में इन्होने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया. महिलाओं व निर्बलों के उत्थान और उनकी शिक्षा के लिए इन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया. समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे.

महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल सन् 1827 को पुणे में हुआ था. उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था. इसलिए माली के काम में लगे ये लोग 'फुले' के नाम से जाने जाते थे. ज्योतिबा ने कुछ समय पहले तक मराठी में अध्ययन किया, बीच में पढ़ाई छूट गई और बाद में 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी की सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की.

इनका विवाह 1840 में सावित्री बाई से हुआ, जो बाद में स्‍वयं एक मशहूर समाजसेवी बनीं. दलित व स्‍त्री शिक्षा के क्षेत्र में दोनों पति-पत्‍नी ने मिलकर काम किया.

ज्‍योतिबा फुले भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन और भेदभाव के खिलाफ थे. उन्‍होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया. उन्होंने किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किए.

ज्योतिबा फुले की संत-महत्माओं की जीवनियां पढ़ने में बड़ी रुचि थी. उन्हें ज्ञान हुआ कि जब भगवान के सामने सब नर-नारी समान हैं तो उनमें ऊंच-नीच का भेद क्यों होना चाहिए. स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा फुले ने 1851 में एक स्कूल खोला. खास बात यह है कि स्त्रियों की शिक्षा के लिए देश में यह अपनी तरह का पहला विद्यालय था.

लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया. एक तरफ उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया. इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए.

निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की. उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी गई. ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली.

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वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे. अपने जीवन काल में उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं. जिसमें तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि उनकी प्रमुख हैं. महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया. 28 नवंबर सन् 1890 को उनकी मृत्यु हो गई.

First published: 11 April 2018, 12:41 IST
 
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