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सत्‍य का अर्थ के साथ पुराना रिश्‍ता है!

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 30 November 2015, 18:35 IST
QUICK PILL
  • आज उनका बचपन बचाओ आंदोलन खुद एक कानूनी विवाद में फंसा हुआ है और इसकी \r\nपंजीकृत मातृ संस्‍था एसोसिएशन फॉर वॉलन्‍टरी ऐक्‍शन को अपंजीकृत \r\n\'\'अभियान\'\' की तकनीकी व कानूनी स्थिति से संबंधित कागज़ात दिल्‍ली की एक \r\nअदालत में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं.
  • उनका कहना है कि एनजीओ क्षेत्र का \r\nपतन तब शुरू हुआ जब उसने सरकारी और विदेशी अनुदान लेना शुरू कर दिया. क्‍या\r\n वाकई ऐसा है? उनकी खुद की संस्‍था \'आवा\' 2013-14 के एफसीआरए रिटर्न के मुताबिक करीब \r\nपांच करोड़ रुपये का अनुदान भारत समेत आठ देशों से ले चुकी है?


यह बात 2004 की है जब बचपन बचाओ आंदोलन नाम के अभियान से जुड़े किन्‍हीं डॉ. आर्या ने पंजाबी बाग से नोएडा के एक टीवी पत्रकार को सूचना भेजी कि वे लोग उस इलाके के एक बंगले से एक बंधुआ बालिका को मुक्‍त कराने जा रहे हैं. वे चाहते थे कि समूची कार्रवाई कैमरे में कैद हो और उस पर खबर बने.

समाचार चैनलों के शुरुआती दिन थे और ऐसी घटनाओं को तब प्रायोजित तरीके से कैमरे में लाइव कैद कर के स्‍टोरी बनाने की रवायत नहीं थी. ज़ाहिर है, ऐसे में किसी भी रिपोर्टर के लिए यह सूचना एक्‍सक्‍लूसिव ही होनी थी. कैमरा टीम मौके पर पहुंच गई. आंदोलन की टीम ने पुलिस की मौजूदगी में कैमरे के सामने बंगले पर छापा मारा. बच्‍ची बरामद हुई. उसे थाने ले जाया गया, जहां उसे मुक्‍त कराने का श्रेय लेने की होड़ पुलिस और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच शुरू हुई.

पुलिस के मना करने के बावजूद यह सब कैमरे में कैद हुआ. इस बीच डॉ. आर्या ने किसी को फोन करके बताया कि ''काम हो गया है''. अभी कागज़ी खानापूर्ति चल ही रही थी कि थाने में बैठे लोगों के लिए एक बच्‍चा चाय लेकर आया. उसकी उम्र करीब आठ साल रही होगी. रिपोर्टर ने मौका ताड़कर कैमरा चालू करवा दिया और उस बच्‍चे की बाइट लेने लगा. उसे पुलिसवालों ने रोका.

इस बीच अभियान के कर्ताधर्ता भी पुलिसवालों के साथ खड़े हो गए. डॉ. आर्या से जब पूछा गया कि वे इस बच्‍चे को मुक्‍त कराने की कोई पहल क्‍यों नहीं करते, तो उनका टका सा जवाब था कि बच्‍चा काम नहीं करेगा तो खाएगा क्‍या. उनके मुताबिक यह तर्क उस छुड़ाई गई बच्‍ची पर लागू नहीं होता था जो झारखंड से वहां नौकरी करने आई थी और अपनी कमाई से मां-बाप का पेट पालती थी क्‍योंकि उनके पास उसे छुड़ाने का ''ऑर्डर'' था.

जिस शख्‍स को डॉ. आर्या ने फोन कर के ''काम हो गया'' की सूचना दी थी और जिसके ''ऑर्डर'' पर यह ''काम'' हुआ था, उसे जब महज एक दशक बाद 2014 के अगस्‍त में नोबल पुरस्‍कार मिलने की खबर दिल्‍ली की सिविल सोसायटी में फैली तो सभी की जबान पर सिर्फ एक प्रश्‍नवाचक शब्‍द था : ''क्‍या''?

कैलाश सत्‍यार्थी को आज सारी दुनिया जानती है, लेकिन भारत में उन्‍हें बरसों से जानने वालों के पास अभी भी जानने को बहुत कुछ बाकी है

कैलाश सत्‍यार्थी को आज सारी दुनिया जानती है, लेकिन भारत में उन्‍हें बरसों से जानने वालों के पास अभी भी जानने को बहुत कुछ बाकी है. हाल ही में उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्‍य' को जो लंबा साक्षात्‍कार दिया है, उस पर उनके करीबियों की प्रतिक्रिया मोटे तौर पर एक ही है जिसे एक मानक वाक्‍य में समेटा जा सकता है: ''मेरा उनसे कई बरस से कोई संपर्क नहीं रहा. इस बीच उनका वैचारिक विकास क्‍या हुआ है, इससे मैं वाकिफ़ नहीं हूं. वे अगर वामपंथी नहीं थे तो कभी दक्षिणपंथी भी नहीं रहे. ज्‍यादा से ज्‍यादा वे मध्‍यमार्गी जनवादी थे.''

कैलाश सत्‍यार्थी को पहली बार 2005 में नोबल के लिए नामित किया गया था. इस बात का प्रचार वे अपनी वेबसाइट पर लगातार पिछले दस साल से करते आ रहे थे, जब तक कि उन्‍हें मलाला यूसुफज़ई के साथ संयुक्‍त रूप से नोबल नहीं मिल गया. इस दौरान यमुना में काफी कचरा बहा. उनके जानने वालों की स्‍मृतियों पर भरोसा करें तो कैलाश जब तक स्‍वामी अग्निवेश के साथ काम करते रहे, दिल्‍ली के वाम जनवादी दायरे में उनकी आवाजाही होती रही.

नक्‍सली नेता नागभूषण पटनायक की फांसी के खिलाफ़ जब स्‍वामी अग्निवेश के साथ मिलकर कुछ लोगों ने एक मोर्चा बनाया, तो कैलाश उसमें अनिवार्यत: शामिल थे क्‍योंकि वे स्‍वामी की परछाईं थे. इतना ही नहीं, 1990 में जब पहली बार नेपाल में राजशाही के खिलाफ नेपाली कम्‍युनिस्ट पार्टी (एनमाले) के नेतृत्‍व में आंदोलन चला, तो यहां दिल्‍ली में उसके समर्थन में हुए संघर्ष में वे कुछ लोगों के साथ जेल भी गए.

1990 में जब पहली बार नेपाल में राजशाही के खिलाफ नेपाली कम्‍युनिस्ट पार्टी का आंदोलन चला, तो यहां दिल्‍ली में उसके समर्थन में कैलाश जेल भी गए

दिल्‍ली के एक पुराने वामपंथी बुद्धिजीवी बताते हैं कि जब से उन्‍होंने स्‍वामी से अलग अपनी राह चुनी, तब से जन आंदोलनों में उनका आना-जाना खत्‍म हो गया. इसके बाद ही उन्‍होंने बचपन बचाओ आंदोलन नाम का एक अभियान बनाया और उसके बैनर तले बंधुआ बच्‍चों को छुड़ाने का काम जारी रखा.

यह बात अलग है कि यह बैनर आज खुद एक कानूनी विवाद में फंसा हुआ है और इसकी पंजीकृत मातृ संस्‍था आवा (एसोसिएशन फॉर वॉलन्‍टरी ऐक्‍शन) को अपंजीकृत ''अभियान'' की तकनीकी व कानूनी स्थिति से संबंधित कागज़ात दिल्‍ली की एक अदालत में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं.

कैलाश सत्‍यार्थी आर्य समाजी हैं. वेदों और उपनिषदों के विद्वान हैं, पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करते हैं और मध्‍यप्रदेश के ओरछा में एक तहसीलदार के रूप में अपने पूर्वजन्‍म की कहानियां भी लोगों को सुनाते रहे हैं. अब वे अपने ताज़ा साक्षात्‍कार में देश के स्‍कूलों में भागवत गीता को पढ़ाने की हिमायत कर रहे हैं और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं को ''नक्‍सलवाद से प्रभावित'', धर्म परिवर्तन में लिप्‍त और ''पैसे व ताकत के मद में चूर'' बता रहे हैं.

आज वे स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं को ''नक्‍सलवाद से प्रभावित'', धर्म परिवर्तन में लिप्‍त और ''पैसे व ताकत के मद में चूर'' बता रहे हैं

वे कहते हैं कि इस देश के एनजीओ क्षेत्र ने ''सामाजिक कल्‍याण और परिवर्तन को कारोबार में तब्‍दील'' कर डाला है. उनका मानना है कि एनजीओ क्षेत्र का पतन तब शुरू हुआ जब उसने सरकारी और विदेशी अनुदान लेना शुरू कर दिया. क्‍या वाकई ऐसा है? अगर उन्‍हें वास्‍तव में ऐसा लगता है, तो वे आज ही यह बात क्‍यों कह रहे हैं जब इस देश की सरकार तकरीबन इन्‍हीं बहानों की आड़ में कुछ चुनिंदा एनजीओ के विदेशी अनुदान रोकने में लगी है?

इससे भी ज्‍यादा अहम बात यह है कि क्‍या विदेशी अनुदान पर सवाल खड़ा करने के लिए उनके पास पर्याप्‍त नैतिक बल है, जबकि खुद उनकी संस्‍था 'आवा' 2013-14 के एफसीआरए रिटर्न के मुताबिक करीब पांच करोड़ रुपये का अनुदान भारत समेत आठ देशों से ले चुकी है?

विदेश मंत्रालय की एफसीआरए रिटर्न संबंधी सूचना के मुताबिक अपंजीकृत अभियान बचपन बचाओ आंदोलन का खाता प्रबंधन करने वाली संस्‍था एसोसिएशन फॉर वॉलन्‍टरी ऐक्‍शन ने वित्‍त वर्ष 2013-14 के दौरान अमेरिका, ऑस्‍ट्रेलिया, नीदरलैंड, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका और ताइवान समेत भारत के दानदाताओं से कुल 49584512.53 की अनुदान राशि प्राप्‍त की है. ध्‍यान रहे कि इन सभी विदेशी अनुदानों के उद्देश्‍य में ''बच्‍चों का कल्‍याण'' दिखाया गया है.

क्‍या विदेशी अनुदान आदि का सवाल 'पांचजन्‍य' में उठाकर कैलाश सत्‍यार्थी अपने लिए एक ढाल तैयार कर रहे हैं? यह सवाल और अहम इसलिए हो जाता है क्‍योंकि 'पांचजन्‍य' के जिस अंक में उनका साक्षात्‍कार आया है, उसी हफ्ते आरएसएस के अंग्रेज़ी मुखपत्र 'ऑर्गनाइज़र' में ''अच्‍छा काम कर रहे'' एनजीओ पर आवरण कथा प्रकाशित की गई है, जिसमें सत्‍यार्थी के सहयोगी रहे शमशाद भाई पर भी एक प्रशंसात्‍मक स्‍टोरी है जो भदोही में बच्‍चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्‍त कराने का काम करते हैं.

'ऑर्गनाइज़र' में सत्‍यार्थी के सहयोगी रहे शमशाद भाई पर भी एक प्रशंसात्‍मक स्‍टोरी छपी है जो भदोही में बच्‍चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्‍त कराने का काम करते हैं

यह वही जगह है जहां से सत्‍यार्थी ने अपने स्‍वतंत्र काम की शुरुआत की थी, जिसके चलते उन पर लगातार सवाल उठते रहे हैं कि क्‍या बच्‍चों को मुक्‍त कराने के नाम पर उन्‍होंने देश के व्‍यापारिक हितों को नुकसान पहुंचाया है.

सत्‍यार्थी जब अग्निवेश के अलग होने के बाद दुनिया भर की यात्राएं करने लगे, तो वह दौर गैट (जनरल अग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ) नियमों के तहत भारत पर बंदिशें लगाए जाने का था. भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को तब पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्‍व में खोला गया था और पश्चिमी देश विकासशील देशों से होने वाले निर्यात पर सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों की आड़ में प्रतिबंध लगाने के रास्‍ते तलाश रहे थे.

ऐसे में सत्‍यार्थी ने भदोही और मिर्जापुर के इलाके से कालीन के कारोबार में लगे बच्‍चों को मुक्‍त कराने के लिए 1998 में 103 देशों की ऐतिहासिक यात्रा की और पश्चिमी देशों के लोगों को इस बात के लिए राज़ी करने की कोशिश कि वे भारत से बने कालीन न खरीदें. इसके बाद भदोही के परंपरागत कालीन उद्योग का पतन शुरू हुआ और बचपन बचाओ आंदोलन की चमक लगातार बढ़ती गई.

बाद में वहां हुई सामाजिक तबाही की कल्‍पना सिर्फ इस आधार पर की जा सकती है कि आज से करीब बीस साल पहले भदोही का कालीन कारोबार सालाना 2000 करोड़ रुपये का था.

कैलाश सत्‍यार्थी आज सफलता के ऐसे शिखर पर हैं जहां उनके शुरुआती दिनों के संघर्ष के साथियों में से कोई भी अब साथ नहीं है. उनका दफ्तर संभालने वाले बुजुर्ग आर.एस. चौरसिया अकेले उनके साथ अब तक बने हुए हैं जो कि लंबे समय तक भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के मिर्जापुर जिला सचिव रहे.

कैलाश के अभियान के बाद भदोही में हुई सामाजिक तबाही की कल्‍पना सिर्फ इस आधार पर की जा सकती है कि आज से बीस साल पहले भदोही का कालीन कारोबार सालाना 2000 करोड़ रुपये का था

आज भी कालकाजी के दफ्तर में लोग उन्‍हें 'कामरेड' कह कर ही बुलाते हैं. अधिकतर बड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नब्‍बे के दशक में ही सत्‍यार्थी का साथ उनकी निजी महत्‍वाकांक्षा के चलते छोड़ दिया था. इन्‍हीं में से एक 1999 में उनसे अलग होने वाले बनारस के लेनिन रघुवंशी भी हैं, जो पूछते हैं कि नेपाली संगठनों समेत जिन लोगों ने भी अतीत में उनके संघर्ष में साथ दिया है, वे आज भूखे मर रहे हैं, लेकिन ''कैलाशजी क्‍या कर रहे हैं? क्‍या नोबल शांति पुरस्‍कार उन्‍हें राष्‍ट्रवाद के लिए मिला है?"

जवाब तब भी अधूरा रह जाता है कि आखिर कैलाश सत्‍यार्थी को राष्‍ट्रवादी एजेंडे को पुष्‍ट करने वाला साक्षात्‍कार देने की ऐसी क्‍या ज़रूरत आन पड़ी? एनजीओ पर बंदिशों के इस दौर में क्‍या यह अपनी अंटी बचाने का एक सोचा-समझा अवसरवाद है? जिस क्षेत्र ने उन्‍हें कामयाबी के शिखर तक पहुंचाया है, उसे नक्‍सलवाद से जोड़कर वे क्‍या साबित करना चाह रहे हैं? लेनिन इसका एक आसान सा जवाब सुझाते हैं, ''इसका मतलब बस इतना है कि वे नहीं चाहते कि शांति का अगला पुरस्‍कार हिंदुस्‍तान में किसी और को मिले.'' अगर बात इतनी सी है, तो भी क्‍या मामूली है?

(लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं, संस्थान का उससे सहमत होना आवश्यक नहीं है)

First published: 30 November 2015, 18:35 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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