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कल्लूरी मुक्त बस्तर? पुलिसिया दमन की शर्मनाक कहानी

सुहास मुंशी | Updated on: 26 October 2016, 7:15 IST
QUICK PILL
  •   हाल के सालों में यह पहली बार है जब छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार उल्लंघन की कई घटनाओं के दोषी को हिरासत में लिए जाने का सम्भावनाएं बन रहीं हैं. 
  • राज्य में निगरानी समिति के सदस्यों के जरिए हिंसा को बढ़ावा देने के मामले में सीबीआई की रिपोर्ट में बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लूरी को दोषी पाया गया है. 

बीते 21 अक्टूबर को सीबीआई टीम ने मार्च 2011 में बस्तर के तीन गांवों ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली गांव में हुई आगजनी मामले में पुलिस की भूमिका पर रिपोर्ट पेश की है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुडूम अभियान पर प्रतिबंध लगाए जाने के पहले बड़े पैमाने पर हिंसक घटनाएं हुईं थीं. सुप्रीम कोर्ट में पेश इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा के पीछे सुरक्षा बलों का हाथ है. रिपोर्ट की एक प्रति कैच के पास उपलब्ध है.

इसके दो दिन बाद ही आईजी कल्लूरी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मार्च 2011 में हुई हिंसक घटनाओं के दौरान जो कुछ हुआ, वह मेरे ही निर्देश पर हुआ था. एसआरपी कल्लूरी उस समय दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक थे. 

नक्सलियों से निपटने के नाम पर किए गए ऑपेशन में स्थानीय आदिवासियों के 252 घर जला दिए गए थे. तीन लोगों को मार डाला गया था, तीन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था. यह ऑपरेशन 11 से 16 मार्च 2011 के बीच स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ द्वारा संयुक्त रूप से चलाया गया था.

उनके सार्वजनिक बयान पर कल्लूरी के खिलाफ एक याचिका दायर कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है. कैच ने याचिकाकर्ताओं के साथ ही कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों से बात की जो मामले से इत्तेफाक रखते हैं. सीबीआई की रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों द्वारा स्थानीय आदिवासियों का उत्पीड़न करने, उनके घरों को आग के हवाले करने, कल्लूरी के ख़ुद के कुबूलनामे के आधार पर न सिर्फ़ कल्लूरी बल्कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ पर भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है.

सीबीआई की चार्जशीट

बस्तर में जब बड़े पैमाने पर हिंसा की खबरें आईं थीं तब पुलिस ने हिंसा की किसी भी घटना से होने से इनकार किया था. स्थानीय पत्रकार जब घटनास्थल पर गए और उन्होंने खबरें दीं तब पुलिस ने दावा किया कि घटनाओं के पीछे नक्सलियों का हाथ था. सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में पुलिस के सात कांस्टेबलों को स्थानीय आदिवासियों का उत्पीडऩ करने और उनके घरों को जलाने का दोषी ठहराया है. 

चार्जशीट में इस अभियान में 323 एसपीओ/पुलिस कर्मियों के अलावा सीआरपीएफ/ कोबरा के 95 जवानों के हिस्सा लेने का भी जिक्र है. सीबीआई जांच से खुलासा हुआ है कि ग्रामीणों ने पुलिस बल के लोगों को सामान्य इरादे से लोगों के घरों को आग में झोंकते, ग्रामीणों को पीटते देखा है. उनका यह अपराध आईपीसी की धारा 34/436 तक तहत आता है.

नई दुनिया के अनिल मिश्रा के साथ दि हिन्दू के अमन सेठी घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले पत्रकारों में थे. पुलिस ने तीनों गांवों में जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया था. दोनों पत्रकारों ने मोरपल्ली, ताड़मेटला, तिम्मापुरम जाने के लिए आंध्र प्रदेश होकर रास्ता पकड़ा था.

मिश्रा कहते हैं कि गांव के गांव जले हुए थे. गांव में कुछ नहीं बचा था. उनके पास गुजर-बसर करने के लिए कुछ भी नहीं था. वह कहते हैं कि सभी ने उन्हें बताया था कि बिना वर्दी के लोग आए, हत्याएं की, बलात्कार किया और उनके घरों में आग लगा दी.

कल्लूरी का खुला कुबूलनामा

आईजी कल्लूरी ने तीनों गांवों में जो कुछ हुआ, न सिर्फ उसकी पूरी जिम्मेदारी ली बल्कि वह कारण भी बताए कि क्यों 252 घरों को आग के हवाले किया गया था. वह कहते हैं कि पुलिस जब पहुंची तो वहां युद्ध जैसी स्थिति थी. गोलियां थीं. हथगोले फेंके जा रहे थे. हथगोले फेंके जाने से झोपडिय़ों में आग लग गई. वह कहते हैं कि हमने कभी नहीं कहा है कि झोपडिय़ां नहीं जली हैं. पुलिस कार्रवाई के दौरान यह घटना हुई है लेकिन पुलिस ने इन झोपडिय़ों में आग नहीं लगाई.

पुलिस जब पहुंची तो वहां युद्ध जैसी स्थिति थी. गोलियां थीं. हथगोले फेंके जा रहे थे-कल्लूरी

बस्तर के एक स्थानीय पत्रकार, जो अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते, ने कैच से बातचीत में तीनों गांवों का ख़ाका खींचते हुए उन कारणों को भी गिनाया कि क्यों कल्लूरी का बयान यक़ीन के लायक़ नहीं है. वह कहते हैं कि बस्तर के जंगलों के बारे में जानिए. एक गांव दूसरे गांव से काफी दूर है. हर गांव एक मोहल्ला है जिसमें लगभग एक दर्जन घर हैं और

किसी भी दो मोहल्लों के बीच की दूरी चार किमी से कम नहीं है. अगर आप सभी तीनों गांवों और मोहल्लों को एकसाथ मिला लें तो यह इलाक़ा कम से कम 25 वर्ग किमी के आसपास का होगा. इतने बड़े फैलाव में झोपड़ी की आग दूसरी झोपड़ी तक नहीं फैल सकती. यह सुनियोजित संहार पांच दिनों तक चलता रहा. 

सामाजिक कार्यकर्ता और डीयू प्रोफेसर नंदिनी सुंदर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले से काफी नजदीकी से जुड़ी हुईं है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है. वह कहती हैं कि वह इस मामले की जांच के लिए सीबीआई पर दबाव डालेंगी ताकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके. 

वह कहती हैं कि सीबीआई ने इन अपराधों के लिए केवल सात कांस्टेबेलों को दोषी ठहराया है. क्या आप यह भरोसा कर सकते हैं कि केवल सात कांस्टेबल ही 252 घरों को आग में झोंकने के साथ ही अन्य अपराध को अंजाम देने में सक्षम हैं? 

यह कैसे मुमकिन हो सकता है जबतक कि उनके वरिष्ठों को इसकी जानकारी न हो. हम सीबीआई पर भी दबाव डालेंगे कि वह अन्य नामों को भी सामने लाए जिनके इशारों पर ये वीभत्स कार्रवाई की गई.

सामाजिक कार्यकर्ता अग्निवेश कहते हैं कि घटना के बाद वह तीन बार राहत सामग्री लेकर तीनों गांवों में गए लेकिन कल्लूरी ने उन्हें जाने से ही रोक दिया. वह कहते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री रमन सिंह से मुलाकात की थी. उन्होंने हर मुमकिन मदद का वादा किया था, पर कल्लूरी, जो इन घटनाओं के मास्टरमाइंड हैं, ने हर बार मुझे रोक दिया. 

उनका आतंक इतना था कि दो वरिष्ठ नौकरशाह, जिसमें एक क्षेत्र के जिलाधिकारी भी थे, ने मुझसे कहा था कि कल्लूरी ने धमकी दी थी कि वे उन गांवों की ओर बढ़े तो जान से मार डालेंगे.

स्वामी अग्निवेश पर जब हमला किया गया तब बस्तर के वरिष्ष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला उनके साथ थे. शुक्ला कहते हैं कि घटना की जांच एक नया मील का पत्थर साबित हुआ है. कई ऐसी चीज हैं जो जांच एजेंसी की नजर में नहीं आ पाईं हैं या उन्हें अनदेखा किया गया है. 

क्या 7 कांस्टेबल बिना अपने वरिष्ठ की जानकारी या उनके समर्थन के हिंसा को अंजाम दे सकते हैं

वह कहते हैं कि सीबीआई ने सभी रहस्यों पर से पर्दा नहीं उठाया है. बहुत से लोगों को आज भी नहीं मालुम कि पुलिस के डर से आज भी कोई पत्रकार इन गांवों में नहीं जा सकता. वारदात के दौरान भी यही हालात थे. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुले तौर पर हिंसा करने के लिए उकसा रहे थे. सीबीआई को यह समझना चाहिए और ऐेसे लोगों को पकड़ना चाहिए.

तथ्य यह है कि सीबीआई की चार्जशीट में स्थानीय पुलिस की भूमिका को कमतर किया गया है जबकि इस बात के सुबूत हैं कि किस तरह से मीडिया से दूरी बनाए रखने वाले कुल्लरी ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर अपनी स्थिति साफ़ की. सोमवार को देश में पहली बार पुलिस के जवानों ने नेताओं और नंदनी सुंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले फूंके है. पुलिस जवानों ने वर्दी में मार्च निकाला और उसके बाद पुतले फूंके.

बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर के अलावा कोंडागांव में पुतले फूंके गए हैं. जैसे-जैसे बस्तर के वरिष्ठ पुलिस अफसरों पर दबाव बढ़ता जाएगा, अगले कुछ दिन कार्रवाई से भरे होंगे. उन लोगों के भी जो कुल्लरी के आतंक से छुटकारा चाहते होंगे. उनमें उम्मीद की किरण तो बना हुई ही है.

First published: 26 October 2016, 7:15 IST
 
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