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कमलनाथ के बाद आशा कुमारी, कांग्रेस ने मारी कुल्हाड़ी पर कुल्हाड़ी

राजीव खन्ना | Updated on: 28 June 2016, 19:41 IST

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की सचिव आशा कुमारी को पंजाब के प्रभारी के रूप में नियुक्ति एक मिले-जुले आश्चर्य के रूप में सामने आई है. हरेक व्यक्ति जो राजनीति की थोड़ी-बहुत भी समझ रखता है, इस प्रसंग में एक ही सवाल कर रहा है कि पंजाब में जीत का सपना संजोए कांग्रेस से छोटी-छोटी गड़बडिय़ां क्यों हो रही हैं.

इससे अटकलों को भी बल मिला है कि आशा कुमारी जैसी कम रोबदार नेता को प्रभार देने से पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह को तो जैसे राजनीतिक प्रसाद मिल गया है. कांग्रेस आलाकमान क्यों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने को आमादा है? पहले राज्य के प्रभारी के तौर कमलनाथ को कमान देना, इसके बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों के उड़ते छीटों के बाद कमलनाथ का जिम्मेदारी से पीछे हटना और फिर आशा कुमारी को जिम्मेदारी सौंपना, जो पहले से ही एक जमीन विवाद में कोर्ट से सजा पा चुकी हैं. हालांकि आशा कुमारी हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से इस मामले में मिली जमानत पर हैं.

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कांग्रेस की सचिव और हिमाचल प्रदेश से पांच बार विधायक रहीं आशा कुमारी मूल रूप से छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर राजघराने से ताल्लुक रखती हैं. वे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव मदनेश्वर शरण सिंह देव की पुत्री हैं. आशा कुमारी का विवाह हिमाचल प्रदेश के चंबा राजघराने में स्व. आरके बृजेन्द्र सिंह से हुआ था.

जमानत पर रिहा आशा कुमारी एक जमीन विवाद में निचली कोर्ट से सजा पा चुकी हैं

आशा कुमारी छत्तीसगढ़ के कांग्रेस विधायक दल के नेता बाबा टीके सिंह देव की छोटी बहन हैं. 1955 में जन्मीं आशा कुमारी अपने छात्र जीवन से से ही पार्टी की छात्र इकाई एनएसयूआई के जरिए कांग्रेस की राजनीति करती रही हैं. वह बानीखेत और डलहौजी क्षेत्र से पांच बार 1993, 1998, 2003 और 2012 में विधायक निर्वाचित हुईं हैं.

उन्होंने राज्य के प्राथमिक शिक्षा मंत्री के साथ ही उच्च शिक्षा मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं. राजनीतिक विश्लेषक उन्हें ऐसा नेता बताते हैं जिनके कांग्रेस आलाकमान से अच्छे संबंध हैं.

शिमला के एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जब पार्टी के भीतर ही अपने विरोधियों से मिल रही चुनौतियों का सामना कर रहे थे उस समय अन्य लोगों के साथ वह भी इस सर्वोच्च पद की होड़ में थीं. लेकिन भूमि मामले में उन्हें सजा हो गई. इसके बाद उन्होंने रक्षात्मक रुख अपना लिया और उनकी कोशिशें असफल रह गईं.

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आशा कुमारी जमीन घोटाले में सजा पाए जाने तक कथित रूप से वीरभद्र की प्रखर आलोचक रहीं हैं. चम्बा की अदालत ने भूमि मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए एक साल की सजा सुनाई. यह बात और है कि हिमाचल हाईकोर्ट ने 26 फरवरी को एक अंतरिम आदेश के जरिए निचली अदालत के फैसले पर रोक लगा दी है. आशा कुमारी तथा छह अन्य पर वर्ष 1998 में धोखाधड़ी से राजस्व रिकॉर्ड में हेरा-फेरी कर 60 बीघे जंगल की जमीन हड़पने का आरोप है. कुलदीप सिंह की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था.

पंजाब के प्रभारी के रूप में आशा कुमारी की नियुक्ति को इसलिए आश्चर्य के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि उन्हें दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी की वजनदार नेता शीला दीक्षित की इच्छा के खिलाफ लाया गया है.

उनकी नियुक्ति से यह तथ्य भी सामने आता है कि कांग्रेस आलाकमान को उनकी पृष्ठभूमि की पूरी जानकारी थी. विश्लेषकों का कहना है कि कमलनाथ मामले के बाद पार्टी की काफी किरकरी हो चुकी थी. ऐसे में कांग्रेस को फूंक-फूंक कर कदम रखने थे. माना जा रहा है कि आशा कुमारी को जिम्मेदारी देने में कैप्टन की राय अहम रही है. कमलनाथ और आशा कुमारी दोनों से कैप्टन के अच्छे संबंध हैं.

कांग्रेस ने पहले कमलनाथ को पंजाब प्रभारी बनाया था, लेकिन विवाद होने पर उन्हें हटना पड़ा

पंजाब में अगले साल चुनाव होने हैं. आलाकमान इस बात से वाकिफ है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की तुलना में पंजाब में उसके लिए ज्यादा उम्मीदें है.

आशा कुमारी की नियुक्ति पर कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया रही कि दिल्ली में बैठकर ऐसे निर्णय कौन लोग लेते हैं. हमारे पास ऐसे कई नामी-गिरामी लोग हैं जिन्हें पार्टी प्रभारी बनाया जा सकता था. पार्टी नेता कहते हैं कि एक दागी नेता को प्रभारी बनाए जाने का क्या जरूरत आ पड़ी थी. उनका नाम सामने आते ही पंजाब में सक्रिय विरोधी पक्षों, आप, भाजपा और अकाली दल ने इस मामले को उछालना शुरू कर दिया और कांग्रेस पर उसके निर्णय को लेकर निशाना साधा है.

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कमलनाथ के प्रकरण के बाद कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर राज्य प्रभारियों को थोपे जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. उन्होंने इसकी तुलना राज्यपालों के पदों को खत्म किए जाने से की है? उन्होंने लिखा था कि जिस तरह से राज्यपाल का पद देश की संघीय व्यवस्था से मेल नहीं खाता है, उसी तरह से प्रभारी केवल पावर सेंटर की तरह काम करते हैं और इसके जरिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की हैसियत कम की जाती है.

इसकी वजह से पार्टी राज्यों में कमजोर होती जा रही है और क्षेत्रीय दल उभर रहे हैं. स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों को भी अपने निर्णयों की जानकारी आलाकमान को सुलभ करानी चाहिए. बिना कोई समय गंवाए आप और शिरोमणि अकाली दल ने इस नियुक्ति पर कांग्रेस को निशाने पर ले लिया.

आशा कुमारी की नियुक्ति पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने सवाल उठाया है

आप नेता और पंजाब के प्रभारी संजय सिंह कहते हैं कि वैसे तो यह पार्टी का अंदरूनी मामला है. लेकिन इससे यही लगता है कि कांग्रेस के पास स्वच्छ छवि वाले नेताओं का अभाव हो गया है. वह निष्कलंक नेताओं को अगुवाई के लिए नहीं तलाश पा रही है.

दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल नेता और केन्द्र सरकार में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि पंजाब में पार्टी के पास साफ छवि के नेता नहीं हैं. कमलनाथ और आशा कुमारी की नियुक्ति को रेखांकित करते हुए हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि दोनों की नियुक्ति इस बात का सबूत है कि कांग्रेस आलाकमान और गांधी परिवार पंजाब और पंजाब के लोगों के लिए उत्साहित नहीं है.

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ऐसा लगता है कि उसने एंटी पंजाब एजेंडा सेट कर लिया है. यदि ऐसा न होता तो भूमि घोटाले में सजा पाए व्यक्ति को प्रभारी नियुक्त करने की जरूरत न पड़ती. उन्होंने कहा कि अमरिंदर सिंह क्या अब कमलनाथ की तरह आशा कुमारी को भी क्लीनचिट देंगे और कहेंगे कि वह सताई गईं हैं. उनके खिलाफ कोई केस नहीं है.

उधर, राज्य के कांग्रेस नेताओं में आम धारणा यह है कि लोग धीरे-धीरे उनकी सजा के बारे में भूल जाएंगे. उनकी सजा पर तो रोक लगी हुई है. दूसरी बात, उनका मानना है कि आशा कुमारी की नियुक्ति मात्र एक औपचारिकता है. अमरिंदर सिंह को खुला हाथ दे दिया गया है. कुछ का यह मानना है कि राहुल गांधी ने स्थानीय नेताओं को प्रमुखता दिए जाने की बात कही थी. यह उसी रणनीति का हिस्सा है.

अब आशा कुमारी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पंजाब की राजनीति में अपनी भूमिका कैसे और किस तरह निभाएंगी, देखना बाकी है.

First published: 28 June 2016, 19:41 IST
 
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