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क्या कन्हैया कुमार और उनके वैचारिक सहोदरों ने दिया कश्मीरियों को 'धोखा'?

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हुए. उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने सशर्त अंतरिम जमानत पर रिहा किया. उसके बाद से कन्हैया कुमार कश्मीर के मुद्दे से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं.
  • कन्हैया कुमार और उनके साथियों को ये नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर और पूर्वोत्तर समेत इलाकों के विभिन्न शोषितों की आवाज बनना उनका नैतिक दायित्व है. उन्हें ये समझना होगा कि उनकी चुप्पी से दिल्ली में कश्मीर जैसे विषयों पर विमर्श की गुंजाइश खत्म हो गई है.

जब जोसेफ स्टालिन ने 23 अगस्त 1939 को हिटलर से शांति समझौता कर लिया तो दुनिया भर के उन तमाम फासीवाद विरोधी लोगों को बड़ा झटका लगा जो कम्युनिज्म में उम्मीद की किरण देखते थे.

आर्थर केस्लर ने इस भावना को अपनी किताब 'डार्कनेस एट नून' में बखूबी उतारा है. स्पैनिश गृहयुद्ध में भागीदारी कर चुके जॉर्ज ऑरवेल ने भी अपनी उपन्यासों में कम्युनिज्म की सीमाओं पर तीखा प्रहार किया है.

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जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को ये किताबें पढ़नी चाहिए. इसलिए नहीं कि वो वामपंथी हैं बल्कि इसलिए कि इनमें पिछली सदी के इतिहास के सबसे बड़े सबक दर्ज हैं.

चूंकि कन्हैया भारत में दक्षिणपंथी के खिलाफ उठने वाली आवाज के प्रतिनिधि बन चुके हैं इसलिए उनपर ये जिम्मेदारी बनती है कि वो ऐतिहासिक गलतियों को न दोहराएं. 

कन्हैया कुमार और उनके वैचारिक दोस्तों की वजह से दिल्ली में कश्मीर पर विमर्श की जगह खत्म हो गयी है

युवा नेता के तौर पर शोषितों के साथ खड़े होना उनका दायित्व है. जिनमें मणिपुर और कश्मीर के लोग भी शामिल हैं.

सतत हिंसक संघर्ष के बीच जी रहे इन राज्यों के नाउम्मीद युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं की आवाज़ बनना उनका फर्ज है.

Kashmir Women anti India protest

'आज़ादी' कश्मीर में प्रतिरोध का प्रतीक है. कश्मीर घाटी की दीवारों और ये लिखा मिलता है. विरोध प्रदर्शनों में इसका नारा लगना आम बात है. लेकिन ये मुद्दा आम नारेबाजी से थोड़ा जटिल है. अगर इसपर विश्वविद्यालयों, स्कालरों, छात्रों और बुद्धिजीवियों के बीच इसपर चर्चा नहीं होगी तो कश्मीर का सवाल बेमौत मर जाएगा.

कन्हैया को ये जरूर पता होगा कि कई कश्मीरी नौजवान हमलों के डर से अपनी यूनिवर्सिटी छोड़ कर जा चुके हैं? क्या उन्होंने ऐसे छात्रों को आश्वस्त करने के लिए कोई क़दम उठाया.

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अगर कन्हैया देश के सबसे संवेदनशील तबके के साथ नहीं खड़ें होंगे तो दूसरा कौन होगा? अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो वो किन अल्पसंख्यकों के नुमाइंदे हैं?

कन्हैया जिन लोगों के लिए हीरो हैं उनमें से कितने लोग कश्मीर या अफ़ज़ल गुरु या कुनान पोशपोरा पर दोबारा सेमिनार या परिचर्चा आयोजित करेंगे?

धोखा


इन लोगों ने उन लोगों के संग धोखा किया है जो अफ़ज़ल गुरु की फांसी को अन्याय मानते हैं. जिन्होंने अपने जीवन में नागरिक आजादी को कभी महसूस नहीं किया. जिन्होंने खुद को कभी भारतीय गणतंत्र के लोकतांत्रिक अधिकारों का स्वाद कभी नहीं चखा. और इसीलिए वो 'आजादी' मांगते हैं.

ये वही लोग हैं जो दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों से सीधी लड़ाई से पहले तक कश्मीर, नगालैंड, छत्तीसगढ़, मणिपुर, असम समेत तमाम उन इलाकों के लोगों के साथ खड़ रहे हैं जो भारत से आजादी के मांग का समर्थन करते रहे हैं या कम से कम इनमें से कुछ राज्यों में लागू अफ्सपा जैसे कानूनों का विरोध करते रहे.

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सशर्त अंतरिम जमानत पर रिहा कन्हैया ने जेएनयू कैंपस में वापस लौटने के बाद इन मुद्दे से सुरक्षित दूरी बनाए रखी है. कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग से भी वो खुद को अलग रखते नजर आए.

जेल से बाहर आने के बाद कन्हैया पूरी तरह बदले हुए इंसान नजर आ रहे हैं. एक ऐसा आदमी जो ये भूल गया है कि  भारत से आजादी की मांग कन्हैया और उनके दोस्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

कन्हैया के इस रवैये से दिल्ली में दक्षिणपंथियों के कड़े संघर्ष के बाद हासिल किए गए कश्मीर जैसे मुद्दों पर विमर्श का स्थान खो गया है.

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अब कन्हैया कुमार और उनके साथी आरएसएस के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. दोनों में इस बात पर मौन सहमति बन गयी लगती है कि कश्मीर जैसे मुद्दे पर बहस नहीं हो सकती.

इस तरह कशमीरियों ने एक और दोस्त खो दिया जिनसे वो अपने दर्द की कहानियां साझा कर सकते थे.

दिल्ली की सबसे पुरजोर उदारपंथी आवाज समझे जाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक ने कहा कि कन्हैया को आजाद किया जाए और 'उन कश्मीरियों' को गिरफ्तार किया जाए.

कश्मीरी छात्रों के खिलाफ नफरत से भरे कई लेख लिखे गए. इन लेखों से ऐसा लग रहा था कि ये छात्र रातोंरात अपराधी बन गए हैं.

मेरी नजर में कन्हैया और उनके साथियों का विश्वासघात ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है. वो एक ऐसे वैचारिक समाज का हिस्सा हैं जो बौद्धिक रूप से दिवालिया हो चुका है. जो स्टालिन और हिटलर के समझौते और हंगरी पर सोवियत आक्रमण जैसे ऐतिहासिक सबक के बाद भी वैचारिक नेतृत्व के लिए रूस की तरफ देखता था. याद रहे कि इसी समुदाय ने ब्रितानी साम्राज्यवाद को फासीवाद से ज्यादा बड़ा खतरा बताया था.

ऐसा लगा रहा है जैसे कन्हैया कुमार और आरएसएस में मौन सहमति बन गयी है कि कश्मीर मुद्दे पर बात नहीं करनी है

कुछ लोग कह रहे हैं कि कश्मीर के मुद्दे पर बात न करना एक सोची-समझी कूटनीति है. तो याद रहे कि हिटलर से जब स्टालिन ने हाथ मिलाया था तब भी कुछ ऐसा ही तर्क दिया गया था.

इस समुदाय के लिए दुनिया का कोई भी विचार पूंजीवाद से अच्छा है. ये समुदाय शार्ली एब्दो के कार्टून या सलमान रश्दी की किताब के खिलाए दिए गए इस्लामी फतवों का बहुत ही अनमने ढंग से विरोध करता है.

ये समुदाय एक ऐसी भेड़ है जिसके चरवाहे नोम चॉम्स्की हैं. जिन्होंने पूर्वी तिमोर पर हमले की तीखी आलोचना की थी. उन्होंने तारिक अली और अरुंधति रॉय के साथ मिलकर दियाना जॉनस्टोन का समर्थन किया था जिसने बोस्नियाई मुसलमानों के नरसंहार को झूठ बताया था.

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इस समुदाय की उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को आजाद कराने में ज्यादा रुचि नहीं है. कन्हैया के समर्थन में जहां हजारों लोग सड़कों पर उतरे वहीं एसएआर गिलानी को ये पूरी तरह भूल गए. जबकि कन्हैया और गिलानी एक ही आरोप में गिरफ्तार किए गए थे.

ये लोग यही प्रार्थना कर रहे होंगे कि नौ फरवरी जैसा दिन फिर कभी न आए क्योंकि इस दिन ये लोग बेनकाब हो गए.

इतने सबके बाद भी ये लोग इस बात पर हैरत जताते हैं कि कश्मीरी छात्र उनके समर्थन में क्यों नहीं उतरते!

(लेखक कश्मीरी पंडित हैं. उन्हें 1990 के दशक में घाटी में बढ़ती उग्रवादी हिंसा के कारण विस्थापित होना पड़ा था.

ये लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

First published: 15 March 2016, 9:26 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

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