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Exclusive: जब ये लोग राजद्रोही कहते हैं तब मेरा देशप्रेम और बढ़ता है

तारेंद्र किशोर | Updated on: 4 March 2016, 18:02 IST

जवाहरलाल नेहरू विश्ववद्यालय (जेएनयू) के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का आरोप है. दिल्ली पुलिस ने उनके समेत जेएनयू के छह छात्रों पर कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाने के लिए मामला दर्ज किया है.

इन छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने नौ फरवरी को संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की बरसी के मौके पर भारत विरोधी नारे लगाए थे.

पुलिस ने कन्हैया को 12 फरवरी को जेएनयू परिसर से गिरफ्तार किया था. दो मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें छह महीने की सशर्त अंतरिम जमानत पर रिहा किया.

पेश है जेल से रिहा होने के बाद जेएनयू पहुंचे कन्हैया कुमार से विशेष बातचीत के अंशः

12 फरवरी को आपकी गिरफ्तारी हुई और तीन मार्च को आप रिहा हुए, जिस व्यवस्था के खिलाफ आप लड़ रहे थे इस बीच उससे आपका सामना हुआ. अब आप इसे किस तरह से देखते हैं?


देखिए सबसे पहले तो मैं उस अनुभव को शेेयर करता हूं जो मुझे सबसे अच्छा लगा. इस व्यवस्था को अभी भी संघ जैसी ताकतें इतना बर्बाद नहीं कर पायी हैं कि इसमें बदलाव ही संभव न हो सके या इसमें आशाएं ही नही बची हों. इसमें पर्याप्त उम्मीदें बची हुई है.

इस देश का कानून, संविधान, न्यायिक व्यवस्था के प्रति मेरा भरोसा और बढ़ा है. इससे चीजें सही रूप में सामने आएंगी, सत्य सामने आएगा. आज लोग सही को सही और गलत को गलत कह रहे हैं. ऐसे लोगों की संख्या और बढ़ेगी. हमारी लड़ाई और मजबूत होगी.

आपके ऊपर देशद्रोह का आरोप है. एक कन्हैया जो 12 फरवरी से पहले जेएनयू का अध्यक्ष था, पीएचडी का स्टूडेंट था, उसकी सार्वजनिक जीवन में एक गरिमा थी, उसे देशद्रोही सुनना कैसा लगता है?


पहली बात तो यह है कि मेरे ऊपर सेडिशन का चार्ज लगा है. सेडिशन का हिंदी अर्थ देशद्रोही नहीं होता, यह राजद्रोह होता है. जब हम इतिहास में जाते हैं तो पाते हैं कि अंग्रेज लोग राजद्रोह का मुकदमा चलाते थे. जो लोग इस देश में बदलाव की बात कर रहे थे, वे लोग सफल हुए आजादी देश को मिली. हमें एक संविधान मिला. उस संविधान में जो बातें कही गई हैं आज उन्हें ठीक से लागू करने की लड़ाई है.

इसके लिए अगर मेरे ऊपर वे लोग राजद्रोह का आरोप लगा रहे हैं तो मुझे लगता है कि इससे सिर्फ उनकी राजनीतिक मंशा लोगों के सामने उजागर हो रही है. आप अपने ही नागरिकों पर राजद्रोह का आरोप लगा रहे हैं. न सिर्फ विद्यार्थियों बल्कि दलितों, लेखकों, आदिवासियों पत्रकारों, कार्टूनिस्टों और शिक्षकों के ऊपर भी राजद्रोह का आरोप लगा रहे हैं. हमारी राजव्यवस्था इसे एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रही है. लेकिन देश यह नहीं कर रहा है. देश और राज अलग-अलग चीजें हैं. देश का संबंध उसमें रह रहे लोगों से होता है. इसीलिए जब ये लोग राजद्रोह कहते हैं तो मेरा देशप्रेम और बढ़ता है.

कन्हैया का इंटरव्यू

आपको लगता है कि इस मामले में आपके खिलाफ साजिश की गई. मीडिया की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?


मीडिया का एक हिस्सा जिसका वैचारक तौर पर संघ के विचारों से स्पष्ट तौर पर संबंध है उन्होंने बिल्कुल योजनाबद्ध तरीके से, नकली वीडियो के आधार पर न सिर्फ विद्यार्थियों बल्कि एक ऐसे संस्थान (जेएनयू) के बारे में गलतबयानी की जो समानता की बात करता है, बराबरी की बात करता है. इसके बारे में एक ऐसी मानसिकता तैयार की गई. सरकार की अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए यह सब किया गया. निश्चित तौर पर यह एक साजिश है.

इस देश की जनता की जो राजनीतिक समझ है उस पर मुझे बहुत भरोसा है. मैं उसे आज बहुत आशाभरी नजरों से देखता हूं. इस साजिश का पर्दाफाश होगा और साजिशकर्ता सामने आएंगे. कुछ लोगों की बोलती बंद हुई है, उनकी सच्चाई सामने आ चुकी है.

रोहित वेमुला को लेकर जो आंदोलन चल रहा था उस पर इस घटना का क्या असर आप देखते है. आगे क्या हो सकता है?


मौजूदा केंद्र सरकार की कोशिश थी रोहित वेमुला के आंदोलन को, समाजिक न्याय के आंदोलन को और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के विचारों को दबाने की. इसीलिए उसने जेएनयू प्रकरण में योजनाबद्ध तरीके से काम करना शुरू किया. लेकिन एक अच्छी बात यह है कि जो लोग जेएनयू के पक्ष में खड़ा हुए उन्होंने कोई बाइनरी नहीं बनाया.

जेएनयू का सवाल डेमोक्रेटिक राइट्स के पक्ष में खड़ा होने को लेकर है. साथ ही रोहित वेमुला इस समाज के अंदर मौजूद सामाजिक रूढ़ि को लेकर लड़ रहा था, वह सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक है. ये दोनों लड़ाईयां आपस में जुड़कर और मजबूत हुई हैं. इसे और मजबूत करने की जरूरत है.

पुलिस ने कहा कि कन्हैया ने जांच में सहयोग नहीं किया है. पहले वे कह रहे थे कि वे आपकी जमानत का विरोध नहीं करेंगे. बाद में कहा कि बाहर आकर कन्हैया जांच को प्रभावित कर सकता है. आपको क्या लगता है. अब आप मीडिया को, छात्रों को संबोधित भी कर रहे हैं. पुलिस का जो आरोप था कि आप जांच को प्रभावित करेंगे वो कहां तक सही है?


देखिए मैं आपको बता दूं कि मुझे इस देश के संविधान और इसकी न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा है. इसीलिए मैं केस के मेरिट पर कोई बात नहीं करना चाहता. मामला सबज्युडिस है.

मैं सिर्फ देश के जो हालात हैं उसको देखते हुए जेएनयू की जो विरासत है, लड़ने का जो इसका इतिहास है उसके बारे में बात कर रहा हूं. इसलिए मैं गरीब, शोषित लोगों को एकजुट करने की बात कर रहा हूं. मैं केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता.

आप जिस वैचारिक धारा से आते हैं उसमें बहुत सारे लोग इससे पहले जेल गए हैं. आपने कभी सोचा था कि आप भी कभी जेल जाएंगे. जेल के भीतर आपके 20 दिनों का अनुभव कैसा रहा?


मैं शुरू से साधारण किस्म का इंसान रहा हूं. साधारण जिंदगी जीता हूं, यह मेरी कल्पना से परे था कि मुझे जेल जाना पड़ेगा. लेकिन आज मैं कह सकता हूं कि जो आदमी समाज की भलाई-बुराई के बारे में सोचता है और जेल जाता है उसके लिए जेल जीवन का हिस्सा बन जाता है.

जेल में रहते हुए कभी लगा कि आपके माता-पिता भी हैं, परिवार है. उनकी चिंता हुई, इसे लेकर कभी कोई डर लगा. मन में कभी इसको लेकर कोई द्वंद्व हुआ?


देखिए द्वंद्व की जब आप बात करते हैं तो द्वंद्व हमेशा दो विपरीत चीजों के बीच होता है. जहां एकता होती है, वहां संघर्ष भी होता है. जहां डर होता है वहां साहस भी होता है. जहां हम व्यक्ति की बात करते हैं वहां सामूहिकता भी आती है. जहां हम परिवार की बात करते हैं वहां समाज भी आता है.

इसीलिए यह द्वंद्व सकारात्मक है, यह अंतरविरोध सकारात्मक है. यह मुझे अलग नहीं करता है बल्कि व्यक्ति औऱ समूह को एकाकार करके आगे बढ़ने की नसीहत देता है.

यानि द्वंद्व हुआ?


द्वंद्व ही गति के लिए उत्तरदायी है.

आपकी राजनीतिक विचारधारा और बातों से विकल्प की राजनीति की बात दिखती है. कुछ दिन पहले अरविंद केेजरीवाल का आंदोलन हमने देखा. वह भी वैकल्पिक राजनीति की बात करते थे. तो आपकी वैकल्पिक राजनीति और उनकी वैकल्पिक राजनीति में आप किस तरह का अंतर देखते हैं?


मैं सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं. कोई लंबी टिप्पणी नही करूंगा. मेरी वैकल्पिक राजनीति हमेशा जहां हैं वहां से बेहतर होने की है. और साथ ही एक बात और जोड़ दूं कि वैकल्पिक राजनीति में जिस तरीके से लोग साथ आए हैं, उसे दुनिया भर से समर्थन मिला है.

आपके मीडिया के माध्यम से मैं उन सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि, जिस तरीके से एक संस्थान की ऑटोनोमी पर हमला हो रहा है, एक खास तरीके की विचारधारा को थोपने की कोशिश की जा रही है और इसके खिलाफ सारे लोग एकजुट हो रहे हैं, एक नई यूनिटी बन रही है, यही राजनीतिक विकल्प है.

अब लोग कन्हैया को सिर्फ जेएनयू के छात्रंसंघ अध्यक्ष के रूप में नहीं देख रहे हैं. लोग कन्हैया को एक उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. कन्हैया में लोग अपना भविष्य का नेता देख रहे हैं. मौजूदा परिदृश्य में आप अपनी भूमिका जेएनयू से बाहर भी देखते हैं?


मैं कभी भी खुद को जेएनयू या जेएनयू से बाहर, आदि दायरों में सीमित नहीं रखता. जीवन यात्रा की तरह है. आप गांव, शहर, जिला, देश और फिर विदेश तक के स्तर पर जाते हैं. मैं उसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूं.

जेएएनयू में जो सवाल है वो मेरे गांव के सवाल से अलग नहीं है. सैनिकों का सवाल जेएनयू के सवाल से अलग नहीं है. कन्हैया का सवाल इस देश के हर नागरिक का सवाल है.

आप जिस संघर्ष की बात कर रहे हैं उसे जारी रखने के लिए अगर आपको एक नेता के तौर पर आगे आना पड़ेगा तो क्या लोगों को राह दिखाने के लिए ऐसा करेंगे?


देखिए मेरे ख्याल से नेता बनता नहीं है. नेता होना, कारीगर होना, ये सब हमारे समाज की जरूरतों के चलते उत्पन्न होता है. अगर मैं समाज के योग्य हुआ तो वह अपने प्रतिनिधि के तौर पर मुझे खुद ही चुन लेगा.

वामपंथ की राजनीति इस देश में उतनी ही पुरानी है जितनी कि संघ की राजनीति. इस टकराव से ऐसा दिख रहा है कि संघ की राजनीति और वामपंथ की राजनीति आमने-सामने खड़ी हो गई हैं. अक्सर कहा जाता है कि इस देश में संघ की सफलता असल में वामपंथ की असफलता है. आपको क्या लगा है, मौजूदा टकराव कहां तक जाएगा?


वामपंथ अपने आप में व्यापक शब्द है. वामपंथ जब हम कहते हैं तो इसका मतलब होता है बदलाव. और जब हम बदलाव की बात करेंगे तो मैं कह सकता हूं कि इस लड़ाई में सच की, समानता की, बराबरी की जीत होगी. यह जो विभाजनकारी शक्तियां हैं, दक्षिणपंथी हैं इन्हें शिकस्त खानी पड़ेगी.

आप सामूहिकता की बात करते हैं. एक तरह से आपको सबका साथ भी मिला है. इस देश के लेखक, पत्रकार, फिल्मकार सभी ने आपका साथ दिया है. एक स्तर पर यह आपकी जीत भी लगती है. उन लोगों को क्या कहना चाहेंगे?


इन सभी लोगों ने सही को सही और गलत को गलत कहा है. मैं सबको हमारा साथ देने के लिए शुक्रिया कहना चाहता हूं.

First published: 4 March 2016, 18:02 IST
 
तारेंद्र किशोर @catchhindi

दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार

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