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बिहार से तिहाड़ तक: एक सफ़रनामा जो क़दम-क़दम पर निराश करता है

श्रिया मोहन | Updated on: 6 November 2016, 7:39 IST
QUICK PILL
  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जन्मस्थली बेगुसराय से लेकर तिहाड़ में बिताए गए दिनों का सफ़रनामा प्रकाशित हो चुका है. 
  • मगर यह किताब हर मोर्चे पर कमज़ोर नज़र आती है. इक्का-दुक्का क़िस्सों को अगर किनारे रख दें तो यह सफ़रनामा ज़्यादातर सवालों के जवाब को बिना छुए आगे बढ़ जाता है. 

कई बार अच्छे लेखक उम्दा भाषण देने के गुर धीरे-धीरे सीख जाते हैं मगर ज़रूरी नहीं कि एक कुशल वक्ता भी पेशेवेर लेखक की तरह काम कर पाए. जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार दूसरी कैटगरी में आते हैं. कन्हैया ने अपने बिहार से तिहाड़ तक के अपने सफरनामे को किताब की शक्ल दी है. 264 पेज की किताब का नाम है, 'फ्रॉम बिहार टू तिहाड़: माई पॉलिटिकल जर्नी.' इसे प्रकाशित किया है जगरनॉट ने मगर इस किताब को पढऩे पर मायूसी ही हाथ लगती है.

कन्हैया कुमार के बारे में देश को तब पता चला, जब उन्हें 12 फरवरी 2016 की रात दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से देशद्रोह और आपराधिक षडयंत्र के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. लगातार 20 दिनों तक दिन और रात मीडिया के प्राइम टाइम में वह सुर्खियों में रहे थे. मीडिया उन्हें इस आधार पर हीरो बना रहा था कि एक ऐसे युवा को जेल में

डाल दिया गया है जिसका अपराध केवल इतना है कि रोहित वेमुला मामले से दुखी होकर उसने सरकार की नीतियों की निन्दा की है. 

रोहित वेमुला समेत पांच छात्रों को हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय हॉस्टल से सस्पेंड कर दिया गया था. साथ ही उनकी फेलोशिप भी रोक दी गई थी. नतीजतन, रोहित ने आत्महत्या कर ली थी.

मगर जब कन्हैया तिहाड़ जेल से बाहर आए, तब तक वह राष्ट्रीय राजनीति के हीरो बन चुके थे. उनकी हाज़िर जवाबी, भाषण देने की तर्कपूर्ण शैली और उनके हावभाव ने लगभग रोमांच पैदा कर दिया था. कन्हैया समर्थकों और प्रशंसकों की भीड़ उनके साथ फोटो लेने के लिए लालायित हो उठी थी. उनके भाषणों में गज़ब की बेबाक़ी होती थी और निशाना पर बार-बार मोदी सरकार. 

मगर अगर आप 'बिहार से तिहाड़ तक' किताब पढऩे जा रहे हैं तो आपको मायूसी हाथ आएगी. जाहिरा तौर पर उनकी कहानी बिहार के उनके जन्मस्थल बेगुसराय से शुरू होती है. किस तरह से वह गरीबी में रहे, पले-बढ़े और गांव के निजी और सरकारी स्कूल से लेकर पढऩे के लिए पटना जाना और आख़िर में दिल्ली के जेएनयू में एडमिशन पा लेना. मगर यह सारी बातें तो हम फरवरी की उस रात से ही जानते हैं.

शिक्षा राजनीति का आधार

किताब के दो टुकड़े ऐसे हैं जो दिल को छूते हैं. प्राइमरी स्कूलिंग के दौरान कन्हैया को पता चलता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम किस तरह उनके लिए गैरज़रूरी है. अंग्रेजी की कक्षा में उन्हें 'द रियल प्रिंसेस' की कहानी पढ़ाई जाती है. राजकुमारी सात गरम गद्दों पर सोती है लेकिन उसे बिस्तर पर किसी छोटे पत्थर के टुकड़े के होने का एहसास होता है. मगर वह पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि मटर का एक दाना होता है. कन्हैया की ज़िंदगी के शुरुआती दिनों में ऐसा नरम बिस्तर नहीं था. कई घंटों तक बिजली कटौती रोजमर्रा की बात थी. चाय के लिए ही दूध नहीं था और शौच के लिए भी खुले में जाना पड़ता था.

कन्हैया लिखते हैं कि वह एक ऐसा संसार था जहां रात का बचा खाना सुबह के नाश्ते के काम में आता था. बासी रोटी या बासी चावल. क्या ऐसा संसारिक दृश्य हमारे स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों में हैं? पढ़ाए जाने वाले ऐसे पाठ्यक्रम का हमारे लिए क्या उपयोग जो कभी उपयोग में ही न आ सके. 

सनराइज पब्लिक स्कूल, जो उनके गांव का पहला निजी शिक्षण संस्थान था, में जब वह पढऩे गए तो मफलर, दस्ताना न होने के नाते उन पर भद्दे कमेन्ट्स किए जाते थे. पहनने के लिए केवल एक ही यूनीफॉर्म थी. उनकी मेरिट भी कुछ नहीं थी. उनके स्कूल के दलित दोस्त जो पढऩे में अच्छे थे, उन्हें पिता के निधन के बाद परिवार का भरण पोषण करने के लिए स्कूल छोड़ देना पड़ा. आज वह गांव में साइकिल मरम्मत की छोटी सी दुकान खोले हुए हैं.

दरअसल इस तरह की कहानियों से कन्हैया यह बताने की कोशिश करते हैं कि किसे मौक़ा मिलता है और कौन इन  संसाधनों का बोझ उठा सकता है?

जेएनयू में खुशी

जब कन्हैया जेएनयू पहुंचते हैं, तब लगता है कि उन्हें सही ठिकाना मिल गया है. मगर कुछ वक्त के बाद यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती है. वह लिखते हैं कि कोई भी हॉस्टल पर निगाह दौड़ा सकता है. और आप कह सकते हैं कि यह

उन लोगों के लिए घर नहीं है जो यूनीवर्सिटी के छात्र हैं. किसी को भी जिसे दिल्ली में ठहरने के लिए जगह की जरूरत है और वह जेएनयू में एडमिशन लेने को तैयार है, उसे यहां जगह मिल सकती है. 

वह लिखते हैं कि मैंने अपने आप से एक दफ़ा पूछा कि मैं पहली दफा यूनिवर्सिटी में आया हूं. पढ़ाई के लिए सभी केन्द्र किस तरह के होने चाहिए? यहां रहकर मुझे एहसास हुआ कि मैं किसी भी प्रोफेसर को चुनौती दे सकता हूं और उनसे असहमत हो सकता हूं. हमारे साथ उनका विचार-विमर्श समान धरातल पर होता था और कभी-कभी हमारी खुद की भाषा में भी.

यहां यह निष्पक्ष रूप से कहना सही होगा कि यह जेएनयू ही था जहां कन्हैया को क्रांति के सपनों के लिए आधार मिला.

कन्हैया लिखते हैं कि मैंने जेएनयू में सीखा कि राजनीति में आने के लिए फर्राटेदार अंग्रेज़ी आना ज़रूरी नहीं है. अगर आप गरीब या वंचित वर्ग के परिवार से आते हैं और आप बात करते हैं तो आपकी बात ज्यादा प्रभावशाली होगी बजाय कार से आने वालों और महंगे कपड़े पहनने वालों के. जेएनयू में अगर कोई सचमुच में गरीब नहीं है और वह गरीबी पर बात करता है तो उसका कोई यकीन नहीं करेगा.

और वाक़ई मेरी यह समझ उस वक़्त हकीकत में बदल गई जब बेगुसराय का एक गरीब लड़का ऑल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) का हिस्सा बनने के बाद देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में साल 2015 में छात्रसंघ अध्यक्ष बना. 

मैंने किताब का हिन्दी संस्करण तो नहीं पढ़ा है, लेकिन कन्हैया की मिक्स हिंदी-अंग्रेज़ी पर आकर्षित तो हुआ ही जा सकता है. मेरी एक और साथी दुर्गा सेनगुप्ता ने जब एक इंटरव्यू में कन्हैया से सवाल किया कि वह इतने चुप क्यों हैं? तो उसका जवाब था, 'अरे वो एनर्जी क्राउड से आती है, वरना नहीं'. यक़ीनन कन्हैया की शांत, ईमानदार, राजनीतिक रूप से सही टोन सर्तक और सुविचारित है और जेल जीवन के बाद और होशियार हो गई है.

जेल जीवन

जिज्ञासापूर्वक, जब आप कन्हैया के जेल अनुभवों के बारे में पढ़ते हैं, आप वहां पहुंचकर हैरान हो जाते हैं कि कन्हैया भी जेल के बाहर क्यों आना चाहते थे. गार्डों ने उनके पास खाना पहुंचाया था, कपड़े दिए थे, टेलीविजन लगवाया था, उन्हें कहानियां सुनाईं थीं और देखभाल की थी. उन्होंने वीआईपी क़ैदी का लुत्फ़ लिया था. उनके दोस्त उससे मिलने आया करते थे.

इंडिया टुडे ने एक खास रपट में खुलासा किया था कि कन्हैया को पुलिस हिरासत में तीन घंटे तक पीटा गया, जब तक कि उनकी पैंट गीली नहीं हो गई. उन पर 'भारत माता की जय' बोलने के लिए दबाव डाला गया. लेकिन 378 पन्नों के ऑनलाइन वृतांत में इसका कोई ज़िक्र नहीं है.

उन्होंने संक्षेप में सिर्फ यही उल्लेख किया है कि जब उन्हें पटियाला हाउस में पेशी के लिए लाया गया था, तब कुछ वकीलों ने उन्हें ठोकर मारी थी. मगर किताब में असाधारण और निर्मम तरीके से किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों और पुलिस की निष्क्रियता को नजरअंदाज कर दिया गया है. 

कन्हैया ने खुद कैच से बातचीत में स्वीकार किया है कि किताब में बहुत कुछ अनकहा छोड़ दिया गया है. हो सकता है कि भविष्य में कुछ बड़ा करने के लिए उन्होंने अपनी ऊर्जा को बचाकर रखा है. हम तो सिर्फ़ यही उम्मीद कर सकते हैं कि कन्हैया ने अपनी मजबूती दिखाई है और इस किताब में समाधान के लिए बहुत कुछ अनकहा छोड़ दिया है.

First published: 6 November 2016, 7:39 IST
 
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