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कानपुर रेल हादसा: ज़ीरो एक्सिडेंट की फ्लॉप नीति, वाजपेयी से कुछ सबक ले सकते हैं मोदी

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 February 2017, 1:41 IST
(संजय कन्नौजिया, एएफ़पी)
QUICK PILL
  • पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जर्जर हो रही रेलवे संपति को बदलने के लिए नॉन-लेप्सेबल सेफ्टी फंड्स के रूप में 17 हजार करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे. 
  • मगर अब भारतीय रेलवे में समय के साथ बदलाव नहीं किए जा रहे हैं. इससे यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है.
  • रेल मंत्रालय ने रेल सुरक्षा के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपए का प्रस्ताव दिया था जिसे वित्त मंत्रालय ने ठुकरा दिया.

जिस दिन कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस पटरी से उतरी और 145 यात्रियों की मौत और अन्य सैकड़ों घायल हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए रेल कर्मचारियों से कहा कि वे कोशिश करें कि रेल हादसे नहीं हों. 

मगर प्रधानमंत्री उस बात को आसानी से भूल गए कि इस साल की शुरुआत में रेल मंत्रालय ने रेल सुरक्षा का एक प्रस्ताव रखा था, जिसे उनके वित्त मंत्रालय ने ठुकरा दिया था. प्रस्ताव में अगले पांच साल के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपए की सुरक्षा राशि की मांग की गई थी. 

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक फंड की व्यवस्था नहीं होगी, इसी तरह दुर्घनाएं होती रहेंगी, और हाल में पटरी से उतरी रेल दुर्घटना जैसी घटनाएं भारतीय रेलवे इतिहास में फुटनोट्स बन जाती हैं. 

वाजपेयी ने क्या किया

एनडीए के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जर्जर हो रही रेलवे संपति को बदलने के लिए नॉन-लेप्सेबल सेफ्टी फंड्स के रूप में 17 हजार करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे. उनके उलट जीरो एक्सिडेंट का मोदी मंत्र इसके लिए गंभीर नहीं है.

विकसित देशों के उदाहरण देते हुए विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय रेलवे में समय के साथ बदलाव नहीं किए जा रहे हैं. इससे यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है. वाजपेयी की तारीफ करते हुए विशेषज्ञों ने बाद की सरकारों पर विश्व के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क को खराब करने का आरोप लगाया. 

रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जेपी बत्रा ने कहा, ‘1990-2000 में जब ज्यादा दुर्घटनाएं हो रही थीं, एनडीए सरकार ने कहा था कि इस तरह नहीं चल सकता. उन्होंने नवीनीकरण और पुरानी चीजों को बदलने के मकसद से सुरक्षा राशि की व्यवस्था की. और परिणाम देखने लायक थे, सुरक्षा के लिहाज से रेलवे में सुधार आया और काफी हद तक दुर्घटना्ओं की संख्या घटी. हमें इसी तरह के कदम उठाने की जरूरत है, और वह भी तुरंत.’

बत्रा के मुताबिक इस तरह के हादसों को रोकने के लिए सुरक्षा प्रबंधन और नई तकनीक पर जोर देना आवश्यक है, महज इंसानों पर भरोसा करना काफी नहीं है. उन्होंने आगे कहा, ‘तकनीकी सहयोग से प्रबंधन को यह जानने में मदद मिलेगी कि ट्रेक में कहीं दरारें तो नहीं हैं. पटरियों में दरारों के कारण ही इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसा हुआ. इस तरह की तकनीक विकसित देशों में उपलब्ध है और यह दुर्घनाओं को नियत्रित करने में महत्वपूर्ण रही है.’

काकोदकर समिति की सिफारिशें

बत्रा ने सुझाव दिया कि वर्तमान सरकार भी कुछ ऐसा ही कदम उठाए और पूर्व परमाणु ऊर्जा आयुक्त डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता वाली 2012 हाई-लेवल सेफ्टी रिव्यू कमेटी को लागू करे. काकोदकर समिति की सिफारिशें रेल मंत्रालय में धूल खा रही हैं, और कइयों का मानना है कि उन्हें लागू करने से रेलवे का चेहरा बदल सकता है. यह ऐसे हादसों को कम करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है.

इस साल के शुरूआत में रेल बजट पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने मिशन जीरो एक्सिडेंट की घोषणा की थी, मगर मंत्रालय रिपोर्ट की अधिकांश सिफारिशों को लागू नहीं कर सका है. संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, ‘अब तक समिति की 22 सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं और 20 सिफारिशें लागू होने के अंतिम चरण में है.’

समिति ने सुरक्षा बंदोबस्त के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाने और ऐसा सांविधिक रेलवे प्राधिकरण स्थापित करने पर जोर दिया, जिसके पास रेल-सुरक्षा पर नजर रखने की पर्याप्त शक्तियां हों. समिति ने यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम जैसी 20 हजार करोड़ रुपए की अनुमानित कीमत की उन्नत सिगनल प्रणाली अपनाने की भी सिफारिश की थी. 

समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिशों में एक यह थी कि इंटीग्रल कोच फैक्टरी के रेल के डिब्बों की जगह लिंके-हॉफमैन-बुश (एलएचबी)के डिब्बे काम में लिए जाएं. पर यह काम कछुआ चाल से हो रहा है. बत्रा ने अपनी बात जारी रखी, ‘हमें एलएचबी डिब्बे बढ़ाने होंगे, जो अभी भारत के कुल डिब्बों का महज दस प्रतिशत है. हादसे के दौरान ये डिब्बे एक दूसरे पर चढ़ते या उलटते नहीं हैं.’ 

काकोडकर समिति की सिफारिशों को लागू करने की उच्च लागत और भारतीय रेलवे की बहुत ही खराब आर्थिक स्थिति के कारण रेल पटरियां, सिगनल प्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था सहित बुनियादी परियोजनाओं पर खर्च करना मुश्किल हो रहा है, जबकि यात्रियों की सुरक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है. रिपोर्ट की सिफारिशों को पांच साल में पूरी तरह लागू करने में कुल अनुमानित खर्च 1 लाख करोड़ रुपए बताया गया था. 

सुरक्षा कर की मांग

बत्रा ने कहा कि रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की दुखद स्थिति के लिए वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा. सभी सरकारें इस सिलसिले में महत्वपूर्ण कदम उठाने में विफल रही हैं.  पिछले कुछ सालों में रेलवे घाटे के दौर से गुजर रहा है, और यह समितियों और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए नए इंवेस्टमेंट, खासकर सुरक्षा के, लागू करने के लिए यह जूझ रहा है. बत्रा का सुझाव है कि पैसों की व्यवस्था के लिए सरकार को महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी, सब्सिडी और खाद सहित अन्य प्राथमिकताओं में रेल सुरक्षा को भी रखना चाहिए. 

उनका दावा था कि काकोडकर समिति को लागू करना आसान नहीं होगा. रेलवे को इन हालात से उबारने के लिए, फंड की कमी को देखते हुए उन्होंने टिकटों पर सुरक्षा कर लगाने का सुझाव दिया. बत्रा ने आगे कहा, ‘यदि सरकार को टिकटों पर सुरक्षा कर लेना है, तो लागू करना ही होगा. लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए थोड़ा और देने में संकोच नहीं होगा. सरकार को इस तरह की स्थितियों को टालना है, तो इस तरह के आय के स्रोत बनाने होंगे.’

सरकार क्या करे

पूर्व रेल राज्य मंत्री अधीर चौधरी ने वर्तमान सरकार पर विशेषज्ञों द्वारा सुझाए सुरक्षा उपायों को अनदेखा करने का आरोप लगाया. उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार नोटबंदी जैसे मामूली मुद्दों में उलझी है और ऐसे महत्वपूर्ण विषयों को अनदेखा कर रही है. 

उन्होंने आगे कहा, ‘यह पटरियों के प्रबंधन की विनाशकारी विफलता है, और इसके लिए जो जिम्मेदार हैं, उनके विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए. सरकार बुलेट ट्रेन के लिए जापान जा रही है और यहां लोग जर्जर रेल व्यवस्था के कारण मर रहे हैं.’

यहां तक कि पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने एक प्रमुख समाचार पत्र को बताया कि उन्होंने किस तरह पिछले 30 महीनों में प्रधानमंत्री को कई चिट्ठी लिखी. 

उन्होंने गुज़ारिश करते हुए कि ‘लोगों को लुभाने वाली पर घाटे की बुलेट ट्रेन पर 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने की बजाय सुरक्षा और रेलवे के बुनियादी काम को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दें. पर कुछ नहीं हुआ. ’ यादव ने यह भी कहा कि काकोडकर सिफारिशें लागू की जाएं, खासकर 1.5 लाख करोड़ रुपयों का दूसरा स्पेशल रेलवे सेफ्टी फंड बनाया जाना चाहिए ताकि ऐसे हादसे फिर नहीं हों.

First published: 24 November 2016, 8:28 IST
 
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