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करगिल में पाक को परास्त करने वाले 'पांच जांबाजों' की वीरगाथा

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 July 2017, 10:47 IST

पाकिस्तान की नापाक मांग कश्मीर जो भारत का ताज है. पाकिस्तान हमेशा इसे चुराने की कोशिश करता रहा है, लेकिन 1999 के करगिल युद्ध में पाकिस्तान ने ऐसी मुंह की खाई कि फिर दोबारा मुड़कर नहीं देखा. भारत माता के वीरों ने अपने जान की आहुति देकर हमारे सिर के मुकुट कश्मीर को दुश्मनों की बुरी नजरों से बचाये रखा.

कारगिल की पर्वत चोटी दुश्मन था वहां ऊंचाई पर.
चोरी से घुस आया बुजदिल था उतरा वह नीचाई पर.
वीरों ने धावा बोला और मारा फेंका गहराई पर.
देश गर्व करता है अपने युवकों की तरुणाई पर.


भारत के वीर सपूतों की शहादत को याद करते हुए देश हर साल 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस मनाता है. आइये आपको मिलवाते हैं भारत माता के पांच ऐसे रणबांकुरों से जिन्होंने करगिल विजय की नींव रखी.

विक्रम बत्रा

करगिल विजय के हीरो रहे कैप्टन विक्रम बत्रा को उनके सहयोगी शेरशाह बुलाते थे. यह उनका कोड नेम भी था और पाकिस्तानी भी इस कोड नेम से अच्छी तरह वाकिफ थे. कैप्टन विक्रम बत्रा वो नाम था, जिसकी पाकिस्तानी खेमे में दहशत थी. करगिल युद्ध के बाद जीत का जश्न मनाने के लिए कैप्टन बत्रा भले ही मौजूद ना रहे हों, लेकिन उनके द्वारा लगाया गया नारा 'ये दिल मांगे मोर' आज भी हर हिंदुस्तानी के जेहन में है.

कैप्टन बत्रा के अंतिम शब्द थे, "अगर मैं युद्ध में शहीद होता हूं तो भी तिरंगे में लिपटा आऊंगा और अगर जीत कर आऊंगा तो भी तिरंगे में लिपटा आऊंगा." देश की आन, बान और शान के के लिए कुर्बान कैप्टन बत्रा आज भी जवानों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं.

कैप्टन मनोज पांडेय

कैप्टन मनोज पांडेय उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ भारत माता का वीर सपूत जिसने हंसते-हंसते देश की लिए अपनी जान कुर्बान कर दी.पांडेय का जन्म 25 जून 1975 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के रुधा गांव में हुआ था. मनोज नेपाली क्षेत्री परिवार में पिता गोपीचन्द्र पांडेय और मां मोहिनी के पुत्र के रूप में पैदा हुए थे. मनोज की शिक्षा सैनिक स्कूल लखनऊ में हुई.

जाते-जाते मनोज पांडेय के आखरी शब्द थे, 'ना छोड़नु', जिसका मतलब होता है किसी को भी छोड़ना नहीं! और 24 साल का उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ देश का सिपाही शहीद हो गया. लेकिन जाते-जाते भी उसने अपनी ताकत दुनिया को दिखा दी थी. करगिल में अदम्य साहस के लिए 11 गोरखा राइफल्स रेजीमेंट के कैप्टन मनोज पांडे को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

कैप्टन सौरभ कालिया

पंजाब के अमृतसर में 29 जून 1976 को मां विद्या व पिता एनके कालिया के घर भारत मां के जांबाज पुत्र  कैप्टन सौरभ कालिया का जन्म हुआ था. कालिया के साथ पाकिस्तान ने बहुत ही अमानवीय सलूक किया था.

करीब 22 दिनों तक उन्हें पाकिस्तानी सेना ने बंदी बनाकर रखा और अमानवीय यातनाएं दीं. उनके शरीर को गर्म सरिए और सिगरेट से दागा गया. आंखें फोड़ दी गईं और निजी अंग काट दिए गए. पाकिस्तान ने इस वीर शहीद के शव को करीब 22-23 दिन बाद सात जून 1999 को भारत को सौंपा था.

राइफल मैन संजय कुमार

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के रहने वाले संजय कुमार को उनके अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र सम्मान मिला. कारगिल युद्ध के दाैरान  4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप प्वाइंट 4875 की ओर कूच करने के लिए राइफल मैन संजय ने इच्छा जताई थी.

संजय ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों पर धावा बोल दिया. राइफल मैन इस मुठभेड़ में खुद भी लहूलुहान हो गए थे. संजय ने दुश्मन के बन्दूक से दुश्मन का ही सफाया शुरू कर दिया. संजय कुमार को जंग में पराक्रम दिखाने के लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया.

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के औरंगाबाद अहीर गांव में जन्मा भारत मां का ये सपूत सबसे कम आयु में ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाला योद्धा बना. 27 दिसंबर, 1996 को सेना की 18 ग्रेनेडियर बटालियन में भर्ती हुए योगेंद्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सेना की ही रही है.

उनके पिता भी भूतपूर्व सैनिक थे. योगेंद्र ने रस्से के सहारे 16,500 फीट ऊंची बर्फ से ढकी,सीधी चढ़ाई वाली चोटी पर कब्ज़ा जमा कर दुश्मनों का डट कर सामना किया. यादव ने अपने ग्रेनेड से पाकिस्तानी सेना का बुरा हाल कर दिया और टाइगर हिल विजय में अहम भूमिका अदा की. उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

First published: 26 July 2017, 10:47 IST
 
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