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कर्नाटक: मद्य निषेध के मौसम में शराब को बढ़ावा देने वाली सरकार

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 10 May 2016, 21:49 IST
QUICK PILL
  • केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी की महत्वाकांक्षी मद्यनिषेध की नीति अबतक कई उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरते हुए 16 मई को होने वाले राज्य विधानसभा के चुनावों से ऐन पहले बहस का मुद्दा बन गई है.
  • वास्तव में राज्य का आबकारी विभाग इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया है और उसने वर्षों से मृतप्राय पड़े एक नियम को दोबारा जीवित करते हुए अनुमानित बिक्री का आंकड़ा पाने में असफल रहने वाले बार और रेस्टोरेंट से ‘‘जुर्माना’’ वसूलना प्रारंभ कर दिया है.

ऐसे समय में जब पूरे देश में शराबबंदी को लेकर एक किस्म की आम सहमति दिख रही है, सरकारों में खुद को मद्यनिषेध का सबसे बड़ा समर्थक साबित करने की होड़ दिख रही है, ऐसे में कर्नाटक की सिद्धरमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार धारा के विपरीत बहते हुए नजर आ रही है. कर्नाटक सरकार की नीतियां ऐसी हैं जो पीने-पिलाने की संस्कृति को और शह देने वाली हैं.

हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए पूरे राज्य में शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध आयद कर सबकोे हैरानी मेे डाल दिया था. इस प्रतिबंध के प्रभावी रूप से लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश की सीमाओं से सटे हुए इलाकों में रहने वाले लोग ट्रेन पकड़कर सीमा पार कर रहे हैं और अपना गला तर कर रहे हैं.

केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी की महत्वाकांक्षी मद्यनिषेध की नीति अबतक कई उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरते हुए 16 मई को होने वाले राज्य विधानसभा के चुनावों से ऐन पहले बहस का मुद्दा बन गई है.

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तमिलनाडु में संचालित होने वाले तमाम लोकलुभावन कार्यक्रम राज्य में शराब की बिक्री से प्राप्त होने वाले राजस्व (बीते वर्ष करीब 37 हजार करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित हुआ) पर निर्भर होने के बावजूद मुख्यमंत्री जयललिता भी शराबबंदी की चुनावी घोषणा करने को मजबूर हो गई. 

उन्होंने कहा कि अगर एआईएडीएमके इन चुनावों में दोबारा जीतकर सत्ता में आती है तो वे राज्य में चरणबद्ध तरीके से शराब की बिक्री को प्रतिबंधित करेंगी. उन्हें ऐसा करने का पूरा हक है क्योंकि उनके विरोधी पूर्व में ऐसा ही कर चुके हैं.

लेकिन अभी भी चुनावों से करीब दो वर्ष दूर खड़े सिद्धरमैया को अपने राज्य में लोगों को शराब की सुलभता सुनिश्चचित करने में कोई गुरेज नहीं है. ऐसा करके राज्य का खजाना भरने में मदद कर रहे हैं.

शराब नीति

वास्तव में राज्य का आबकारी विभाग इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया है और उसने वर्षों से मृतप्राय पड़े एक नियम को दोबारा जीवित करते हुए अनुमानित बिक्री का आंकड़ा पाने में असफल रहने वाले बार और रेस्टोरेंट से ‘‘जुर्माना’’ वसूलना प्रारंभ कर दिया है.

कर्नाटक आबकारी (भारतीय और विदेशी मदिरा की बिक्री) अधिनियम 1968 के नियम 14(2) के अंतर्गत बार लाईसेंस लेने वाले तमाम लाइसेंसधारक प्रतिमाह मदिरा के 52 केस या 468 बल्क लीटर ‘‘आवश्यक रूप से’’ उपयोग करेंगे. हालांकि विक्रेताओं के भारी विरोध के चलते वर्ष 2014 में इस अधिनियम को वापस ले लिया गया था.

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इसके बावजूद एक बेहद चैंकाने वाला कदम उठाते हुए आबकारी आयुक्त एसआर उमाशांकर ने बैंगलोर के करीब 200 बेहद मशहूर और प्रीमियम बार-कम-रेस्टोरेंट को लक्ष्य पूरा न करने का हवाला देते हुए करोड़ों की राशि में पहुंचने वाला ‘‘बकाया’’ चुकाने के लिये नोटिस जारी किया है. इसके अलावा उन्हें इस बात की चेतावनी भी दी गई है कि अगर उन्होंने 1 जून तक लाइसेंसों के नवीनीकरण की तारीख से पहले इस राशि का भुगतान नहीं किया तो उनके लाईसेंस निरस्त कर दिये जाएंगे.

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उमाशंकर कहते हैं, ‘‘जी हां, इस नियम को अगस्त 2014 में निरस्त कर दिया गया था और फिलहाल बिक्र के लिये कोई निर्धारित मात्रा निश्चित नहीं है. लेकिन हमनें अपना बकाया वसूलने के लिये नोटिस भेजा है और हमें ऐसा करने का पूरा अधिकार है.’’

आबकारी विभाग के एक बड़े अधिकारी इन लक्ष्यों को तय करने के पीछे का तर्क समझाते हुए कहते हैं, ‘‘हमारे ऊपर राजस्व को बढ़ाने के लिये सरकार के स्तर पर काफी दबाव है और चूंकि लाईसेंस बेहद सीमित हैं, और ऐसे में बक्री की एक न्यूनतम मात्रा निर्दिष्ट करना हमारा दायित्व है ताकि कम बिक्री के चलते ये लाइसेंस बेकार न हो जाएं.’’

राज्य के आबकारी विभाग के इस कठोर रवैये के खिलाफ 30 लाइसेंसधारकों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. नेशनल रेस्टोरेंट्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया की बैंगलोर शाखा के अध्यक्ष आशीष कोठारी कहते हैं कि कई मामलों में तो वसूली जाने वाली बकाया राशि वर्ष 2004 तक ही दर्शायी गई है.

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असल में इस समस्या का मूल उस पुरानी आबकारी नीति में छिपा है जिसे वर्ष 1992 में बंगारप्पा सरकार ने राज्य में बढ़ते हुए आबकारी लाईसेंसों पर लगाम लगाने के मकसद से बनाया था. उसके बाद से प्रदेश में सत्तारूढ़ रही कोई भी सरकार इस नीति में किसी तरह का संशोधन करने का साहस नहीं जुटा पाई.

अगर कोई नया बार खोलना चाहता है तो उसे अपना व्यवसाय समेट रहे या बंद हो चुके किसी पुराने बार मालिक से उसका लाइसेंस खरीदना होगा. सरकार भी अधिक से अधिक कर निचोड़ने के क्रम में साल दर साल लाईसेंस शुल्क में बढ़ोत्तरी करती रहती है और इसके फलस्वरूप कम बिक्री करने वाले बार और रेस्टोरेंट अपना व्यापार जारी रखने के मुकाबले अपने लाइसेंस को बेचने में ही अधिक फायदा देखते हैं.

ऐसा कहा जाता है कि बैंगलोर में प्रमुख स्थानों पर किसी पर भी बार के लाइसेंस में 50 से 60 लाख रुपये का प्रीमियम मिलता है लेकिन यह काम बेहद जोखिमभरा भी है. वर्ष 2007 में बैंगलोर के आसपास की 7 नगरपालिकाओं और 100 गांवों के शहरी समूह में समायोजन के बाद शहरी लाइसेंस की संख्या में इजाफा तो हुआ है लेकिन यह भी बढ़ती हुई मांग को पूरा करने में सक्षम प्रतीत नहीं होता है.

लगातार बढ़ती बिक्री

कुल मिलाकर नतीजा यह है कि पब सिटी के नाम से मशहूर बैंगलोर में खाना और पेय पदार्थ देश के किसी भी अन्य हिस्से के मुकाबले अधिक महंगे हैं. स्थानीय निवासी लगातार बढ़े रहने वाले इन दामों के लिये 10 लाख रुपये से अधिक का सालाना वेतन पाने वाले आईटी विशेषज्ञों की बढ़ी हुई संख्या को इसका जिम्मेदार बताते हैं और सस्ते विकल्पों की तलाश में क्लबों और रिसाॅर्ट का रुख करते हैं.

बिक्री को बढ़ाने के इरादे से राज्य सरकार ने बार और रेस्टोरेंट के बंद होने का समय भी रात के 11ः30 बजे से बढ़ाकर एक बजे तक कर दिया है. हालांकि तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सरकार के इस फैसले के विरोध में थे क्योंकि उनका मानना था कि इसके चलते अपराध और दुर्घटनाओं की संख्या में काफी इजाफा हो सकता है.

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एक तरफ तो राज्य का आबकारी विभाग लोगों को अधिक पीने के लिये प्रोत्साहित करने के तरीके ढूंढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ एक और सरकारी अमला यानी स्थानीय पुलिस ने शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का क्रम और तेज कर दिया है.

पुलिस ने शराब पीकर वाहन चलाने वाले चालकों को चिन्हित करने का जिम्मा खाली हाथ सिपाहियों को दिया है जो बिना किसी सुरक्षा के तेज गति वाहन चला रहे लोगों को रोकने के प्रयास में अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं.

24 वर्षों से लगभग न के बराबर नए लाईसेंस देने वाला आबकारी विभाग अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागा है 

लेकिन इस कवायद के अपने छिपे फायदे भी हैं जो अक्सर रात के धुंधलके में सड़क पर ड्यूटी दे रहे पुलिसकर्मियों की जेब में चुपचाप आते हैं.

अगर हम वर्तमान कानूनों पर नजर डालें तो उनके अनुसार किसी भी व्यक्ति में खून में पाये जाने वाले एल्कोहल (ब्लड एल्कोहल काॅन्टेंट) का स्तर एक बीयर की बोतल जितनी भी नहीं हो सकती जिसको बढ़ाने की मांग लंबे अर्से से हो रही है. बैंगलोर के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां प्रतिदिन अनगिनत सड़क दुर्घटनाएं घटित होती हैं जिनमें औसतन रोजाना तीन व्यक्तियों की मौत होती है.

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बीते करीब 24 वर्षों से लगभग न के बराबर नए लाईसेंस देने वाला आबकारी विभाग अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागा है और बढ़ती हुई जनसंख्या के आधार पर उसने 1750 अतिरिक्त लाइसेंस देने का विचार बनाया है. उनकी इस पहल को आबकारी मंत्री मनोहर तहसीलदार और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया का समर्थन प्राप्त है.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हाल ही में राज्य बीजेपी की कमान संभालने वाले बीएस येदियुरप्पा के आक्रामक रवैया अपनाने के बाद सिद्धरमैया इस विवादस्पद कदम को उठाने का जोखिम ले पाएंगे?

First published: 10 May 2016, 21:49 IST
 
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