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जस्टिस हकीम को हटाकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने दिया संगे-मील फैसला

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 23 February 2016, 21:08 IST
QUICK PILL
  • कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने डिस्ट्रिक्ट जज एएन हकीम को यौन शोषण के आरोप में पद से हटा दिया. अपनी तरह का ये अकेला मामला है.
  • जजों पर यौन शोषण के पहले भी कुछ आरोप लग चुके हैं लेकिन उनकी जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. पढ़िए ऐसे ही तीन मामलों के बारे में.

राष्ट्रीय मीडिया ने 22 जनवरी को कर्नाटक हाई कोर्ट को दिए गए ऐतिहासिक फैसले को ज्यादा तवज्जो नहीं दी. जबकि इसका देश की न्यायपालिका से जुड़े मामलों पर दूरगामी असर पड़ सकता है.

22 जनवरी को कर्नाटक हाई कोर्ट की फुल बेंच ने एक डिस्ट्रिक्ट जज एएन हकीम को यौन शोषण के आरोप में बर्खास्त कर दिया. इस बेंच प्रमुख थे कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसके मुखर्जी. इस फैसले के बारे में लोगों को करीब एक महीने बाद तब पता चला जब ये खबर अखबारों में छपी.

57 वर्षीय हकीम कर्नाटक के बेलागावी जिले की एक अदालत में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज के रूप में तैनात थे. उन्हें करीब चार साल लंबी जांच के बाद पद से हटाया गया. जांच में ये "प्रमाणित" हुआ था उन्होंने अपने नीचे काम करने वाली एक न्यायिक कर्मचारी के संग "अभद्रता" की थी और उसका "यौन शोषण" किया था. 

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हकीम शायद देश के पहले सीनियर जज हैं जिन्हें इस तरह के आरोपों के कारण पद से हटाया गया है. 1990 के दशक में बने विशाखा गाइडलाइन के बाद से कार्यालयों में यौन शोषण के मामलों में काफी गंभीरता आयी हैं.

ये फैसला काफी महत्व रखता है क्योंकि इस समय  सुप्रीम कोर्ट और हाई कोरट् के कई जजों के खिलाफ यौन शोषण के मामले चल रहे हैं. इनमें से ज्यादातर मामले लंबे समय से खिंच रहे हैं.

यौन शोषण के आरोपी 57 वर्षीय हकीम को करीब चार साल लंबी जांच के बाद पद से हटाया गया

हकीम न्यायिक सेवा में 1987 में आए थे. उनपर न्यायिक सेवा की कनिष्ठ अधिकारियों पर अपने आधिकारिक लैपटॉप पोर्न वीडियो और तस्वीरें देखने के लिए मजबूर करने का आरोप था.

उनपर डिक्टेशन देते समय अपने अधीनस्थ कर्मचारी के पैर छूने, अश्लील भाषा का प्रयोग करने, उनका शरीर छूने, अपना यौनांग दिखाने और सहकर्मियों के यौनांग छूने समित कई अन्य आरोप है.

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कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश को नवंबर, 2011 में इस बाबत एक अज्ञात पत्र मिला था. उन्होंने तत्काल इसकी प्रारंभिक जांच का आदेश दिया. एक हफ्ते के अंदर एक महिला कर्मचारी ने लिखित रूप से शिकायत दर्ज करायी.

जांच अधिकारी को जांच में अलग-अलग जगहों पर साल 2008 से 2011 के बीच चार महिला अधिकारियों के यौन शोषण के सबूत मिले. लेकिन वो महिलाएं शिकायत नहीं चाहती क्योंकि अभियुक्त ने ऐसा करने पर "गंभीर परिणाम" भुगतने की धमकी दी थी.

जज का लैपटॉप जब्त करने के बाद जांच अधिकारी ने हाई कोर्ट के कम्प्यूटर विंग और बाहरी विशेषज्ञों की मदद से उसमें इस्तेमाल की गई पोर्न सामग्री को बरामद करवाया.

जजों को पद से हटाने के एक ही तरीका है कि भारत के राष्ट्रपति ऐसा निर्देश दें या उनपर महाभियोग चलाया जाए

जांच अधिकारी ने अपनी 70 पन्ने की रिपोर्ट में कहा कि "डिस्ट्रिक्ट जज पर उनके सहकर्मी और अधीनस्थ कर्मचारी पूरा भरोसा करते हैं" और इस मामले में इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होंने इसका दुरुपयोग किया.

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि जज का व्यवहार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है और उन्हें इसके लिए कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

जजों को पद से हटाने के एक ही तरीका है कि भारत के राष्ट्रपति ऐसा निर्देश दें या उनपर महाभियोग चलाया जाए. ऐसे में कर्नाटक हाई कोर्ट ने कर्नाटक सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स के आधार पर हकीम को हटाने का आदेश दिया.

यहां पेश है न्यायपालिका से जुड़े यौन शोषण के तीन चर्चित मामलेः

1. एसके गंगेले


मार्च, 2015 में राज्य सभा में 58 सांसदों ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले के खिलाफ उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के समक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाए. इन सांसदों में दिग्विजय सिंह(कांग्रेस), सीताराम येचुरी(सीपीएम), डेरेक ओ'ब्रायर(टीएमसी), राम गोपाल यादव(एसपी) और जया प्रदा(एसपी) भी शामिल थे. गंगेले पर ग्वालियर में एक महिला जज के यौन शोषण समेत कई गंभीर आरोप थे.

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उनपर लगे आरोपों की जांच के लिए तीन जजों की एक कमेटी बनायी गई. जिसके प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के जज विक्रमजीत सेन थे. उनके अलावा कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मानुला चेल्लुर और न्यायविद केके वेणुगोपाल कमेटी में शामिल थे. कमेटी ने अप्रैल, 2015 में जांच शुरू की.

जस्टिस सेन पिछले साल दिसंबर में रिटायर हो गए. अभी तक ये स्प्ष्ट नहीं है कि वो जांच कमेटी के प्रमुख बने रहेंगे या नहीं. एटॉर्नी-जनरल मुकुल रोहतगी के न्यायिक राय के अनुसार सेन कमेटी के प्रमुख बने रह सकते हैं क्योंकि जजेज इन्क्वायरी एक्ट 1968 में इसपर कुछ कहा नहीं कहा गया है. लेकिन अंसारी ने कानून मंत्रालय के उस राय को माना जिसमें कहा गया था कि कोई रिटायर्ड जज जांच जारी नहीं रख सकता. अंसारी ने सेन की जगह सुप्रीम कोर्ट के जज रंजन गोगोई को जांच कमेटी का प्रमुख नियुक्त किया.


2. एके गांगुली


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एके गांगुली पर एक इंटर्न की शिकायत पर यौन शोषण की शिकायत दर्ज की गई थी. तीन जजों की एक कमेटी ने मामले की जांच के बाद पाया कि गांगुली के "अवांछित यौन व्यवहार के प्रथम दृष्टया सबूत मिलते हैं."

गांगुली रिटायर होने के बाद पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष थे. आरोप के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया.

जब सुप्रीम कोर्ट के सामने गांगुली को उचित दंड देने का मामला आया तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम ने कहा  था कि अदालत प्रशासनिक तौर पर "किसी रिटायर्ड जज के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं कर सकती."


3. स्वतंत्र कुमार


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज स्वतंत्र कुमार पर भी एक इंटर्न के यौन शोषण का आरोप लगा था. पी सदाशिवम ने ये कहते हुए स्वतंत्र कुमार को क्लिन चिट दे दी कि वो रिटायर्ड जज के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं कर सकते.

कुमार इस राष्ट्रीय हरित अधिकरण(एनजीटी) के चेयरमैन हैं जो पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले देखता है.

First published: 23 February 2016, 21:08 IST
 
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