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राज्यपालों के इन फैसलों ने किसी को दिलाई सत्ता और किसी को किया बाहर

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 May 2018, 12:00 IST

कर्नाटक में सत्ता की होड़ में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही सारे दांव खेलते नजर आ रहे हैं. कर्नाटक चुनावों के नतीजे 15 मई को घोषित किये जा चुके हैं. बीजेपी ने राज्य में 104 सीटें जीतीं वहीं कांग्रेस को 78 सीटों पर संतोष करना पड़ा. लेकिन बहुमत से बीजेपी अभी भी 8 सीट दूर रही. ऐसे में कांग्रेस का सरकार बनाने का दावा भी मजबूती से सामने आ गया.

कर्नाटक की सत्ता पर कौन सी पार्टी काबिज होगी इसका फैसला अब कर्नाटक के राज्यपाल के हाथों में है. राज्यपाल जिस पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्योता देंगे, वो अपने हिसाब से विधायकों को 'जोड़-तोड़ कर' संख्याबल जुटाने में लग जाएगी. राज्यपाल को ये फैसला लेमे में सकता है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब राज्यों की सरकारों का फैसला राज्यपाल ने किया हो. कर्नाटक में ही 2004 से 2008 के बीच इस तरह का माहौल बना था. तब भी आज की तरह ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ का नजारा देखने को मिला था.

कर्नाटक (2009)
कर्नाटक में आज के पहले भी राज्यपाल के हस्तक्षेप का एक मामला देखने को मिला था, 2009 में तत्कालीन राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने अपने कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था. हंसराज भारद्वाज यूपीए की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके थे और उस समय राज्य के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा थे. यूपीए सरकार ने ही हंसराज भारद्वाज को वहां का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. 2009 में राज्यपाल ने सरकार पर आरोप लगाया था कि विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए गलत तरीकों का प्रयोग किया गया. राज्यपाल ने प्राप्त बहुमत को दुबारा साबित करने को कहा था.

कर्नाटक में 80 के दशक में भी राज्यपाल की राजनीतिक भूमिका देखने को मिली थी. 1983, जब कर्नाटक में पहली बार जनता पार्टी ने सत्ता संभाली थी. उस समय कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने एसआर बोम्मई की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था. विधानसभा में बहुतमत खोने की बात कह कर राज्यपाल ने ये फैसला सुनाया था. हालांकि इस फैसले के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. और कोर्ट ने फैसला बोम्मई के हक़ में सुनाया.

 

 

 

 

 

बिहार (2005)

बिहार की राजनीति में भी राज्यपाल का अहम् रोल रहा. राजयपाल से जुड़े फैसलों को लेकर बिहार पॉलिटिक्स कई विवादों में घिरी रही. मामला 2005 का है जब तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने आधी रात को बिहार विधानसभा भंग कर दी. 2005 में फरवरी में हुए चुनावों में किसी भी पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं किया था.

बिहार की राजनीति में उस वक़्त राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनाने के लिए जोड़ तोड़ चल रही थी. उस वक़्त राज्यपाल बूटा सिंह ने विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त रोकने की बात कह कर विधानसभा भंग कर दी थी. हालांकि इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई. जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. गौरतलब है कि उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार काबिज थी.

 

झारखण्ड (2005)

झारखण्ड में भी राज्यपाल के हस्तक्षेप का मामला साल 2005 में सामने आया था. तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई. त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति थी. राज्यपाल के इस फैसले से बिहार की राजनीति में काफी हलचल रही. हालांकि राज्यपाल के इस फैसले के बाद भी शिबू सोरेन विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए. अंत में उन्हें पद ग्रहण के नौ दिनों के बाद ही इस्तीफा देना पड़ा.

उत्तर प्रदेश (1998)
उत्तर प्रदेश में भी राज्य सरकार राज्यपाल के फैसले से प्रभावित रही. कल्याण सिंह के नेतृत्व की सरकार में तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया.
साल 1998 फरवरी में राज्यपाल ने सरकार बर्खास्त करने का ये फैसला दिया. उस समय राजनीति में कई उतार चढ़ावों के बाद जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. राज्यपाल के इस फैसले के बाद कल्याण सिंह ने इस फ़ैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी.

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कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक बताया. कोर्ट के इस फैसले के बाद जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनने के 2 दिनों के भीतर ही इस्तीफ़ा देना पड़ा. जिसके बाद कल्याण सिंह फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बने.

 

आंध्रा प्रदेश

1983-1984 में आंध्रा प्रदेश में भी राज्यपाल का राजनितिक किरदार देखने जो मिला. आंध्रा प्रदेश की राजनीति में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर रामलाल के एक फैसले ने हलचल मचा दी. ठाकुर रामलाल ने बहुमत पा चुकी एनटी रामराव की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था.

राज्यपाल ने सरकार के वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया था.उस समय एनटी रामाराव हार्ट सर्जरी के लिए अमरीका गए हुए थे. इस फैसले को लेकर काफी घमासान मचा रहा. मामला इतना गरमाया कि केंद्र सरकार को शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाना पड़ा. और नए राज्यपाल ने सत्ता फिर एनटी रामराव को सौंप दी.

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First published: 16 May 2018, 12:00 IST
 
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