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कश्मीर की आजादी की मांगः अब जम्मू और लद्दाख की राजनीति भी गरमाई

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 September 2016, 8:13 IST

एक ओर जहां कश्मीर में भारत से आजादी के स्वर मुखर हो रहे हैं, वहीं जम्मू और लद्दाख में राजनीतिक समूह और सिविल सोसायटी कश्मीर घाटी से अलग होने का राग अलापे जा रहे हैं. वे फिर से उसी मांग पर अड़े हैं कि उन्हें राजनीतिक पटल पर अलग पहचान मिले. हालांकि दोनों ही क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय द्वारा इसका व्यापक विरोध किया जा रहा है.

सोमवार को सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के साथ हुई बैठक में द चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ऑफ जम्मू ने जम्मू को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग का समर्थन किया. एक दिन पहले ही ऊधमपुर के निर्दलीय विधायक पवन गुप्ता ने यह मांग की थी.

सीसीआई (चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज) के अध्यक्ष राकेश गुप्ता ने सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल को कहा ‘हम कश्मीर का शांतिपूर्ण तरीके से संवैधानिक समाधान चाहते हैं. हालांकि हमारी मुख्य मांग व्यापार परिलाभ और जम्मू के व्यापारियों को हुए नुकसान की एवज में मुआवजा लेना है. लेकिन अगर केंद्र ने इस मसले को नहीं सुलझाया तो हमारे पास जम्मू को अलग करना ही एक मात्र विकल्प होगा.'

हम क्यों सहें?

सीसीआई ने प्रतिनिधिमंडल के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसमें जम्मू को कश्मीर की समस्याओं से मुक्त करने की बात कही गई थी. ज्ञापन में कहा गया कि हम तीन टुकड़ों में नहीं बंटना चाहते लेकिन अगर प्रशासन इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं रख सका और कोई हल नहीं कर सका तो जम्मू के लोगों के पास क्या चारा रह जाएगा? और जम्मू व लद्दाख के लोग क्यों पीड़ित हों, जो हमेशा देश के साथ खड़े रहे.

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 370 को हटा दिया जाए क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर के लोगों के खिलाफ हथियार की तरह इसतेमाल किया जा रहा है न कि उनके हितों की रक्षा के लिए.

प्रतिनिधि मंडल का बहिष्कार करने वाले पवन गुप्ता कुछ ज्यादा ही तीखे तेवर लिए हुए थे. उन्होंनेे कहा, ‘कश्मीर के सड़े हुए हिस्से को स्वस्थ जम्मू से अलग करने का समय आ गया है. भारत को कश्मीर समस्या का हल अकेले कश्मीर के छोटे से भू-भाग में ही करना होगा न कि जम्मू और लद्दाख के लोगों का बलिदान देकर.’

चिंता के स्वर

जम्मू-कश्मीर में काफी लम्बे समय बाद राजनीतिक और सिविल सोसायटी के लोगों ने सार्वजनिक रूप से जम्मू को अलग करने की मांग की है.

हालांकि संघ परिवार द्वारा इस अभियान से अलग हो जाने के बाद से यह मांग ही बन कर रह गई है. 2002 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कुरुक्षेत्र में हुई बैठक में जम्मू को अलग राज्य बनाने संबंधी प्रस्ताव लाया गया था. संघ ने इसी वर्ष इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए जम्मू स्टेट मोर्चा का भी गठन किया. लेकिन धीरे-धीरे संघ ने संवेदनशील और संघर्ष से जूझते कश्मीर में इस मांग की सुनवाई न होने पर स्वयं को इस मुद्दे से अलग कर लिया.

फिर जब 2002 में चुनावों का समय नजदीक आया तो संघ ने जनता से अपील की कि वह भाजपा के जम्मू विशेष एजेंडा का समर्थन करें. भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी के कहने पर पार्टी के रवैये में फर्क आया. इसके बाद से ही फिर जम्मू को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग का राजनीतिक महत्व खत्म हो गया.

लंबा है इतिहास?

जम्मू को अलग राज्य बनाने की इस मांग का इतिहास लंबा है. भारतीय जनसंघ के नेता बलराज मधोक ने जम्मू-कश्मीर के भारत के हिस्से में आने के छह दिन बाद ही एक नवम्बर 1947 को पहली बार यह मांग उठाई थी.

लगभग इसी समय लद्दाख के प्रमुख लामा कुशक बकोला रिनपोछे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से कहा कि वह प्रांत के प्रशासन को सीधे दिल्ली से ही चलाएं. ये दोनों ही मांगें पिछले दशकों में वक्त के साथ बदलती रहीं लेकिन नब्बे के दशक की शुरुआत में इस मांग को प्रबल जन समर्थन मिला. इसके चलते ही आज कश्मीर अलगाववादी हिंसा के दौर से गुजर रहा है.

विरोध के स्वर

कश्मीर से जम्मू को अलग करने की मांग को मुस्लिमों का विरोध झेलना पड़ रहा है. इसे लेकर हाल ही में गठित पीर पांजाल यूनिटी फोरम की रविवार को जम्मू में हुई बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि यह साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया जाए कि पीर पांजाल दर्रें के पहाड़ी इलाकों को इस सबसे दूर ही रखा जाए, क्योंकि यह क्षेत्र किसी और क्षेत्र में मिलना ही नहीं चाहता. ये इलाके हैं- किश्तवाड़, डोडा, रामबन, रियासी, राजौरी और पुंछ जो ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक तौर पर एक बिल्कुल अलग क्षेत्र है.

बैठक में इस बात की निंदा की गई कि साम्प्रदायिक आधार पर जम्मू और कश्मीर को बांटने वाली कुछ ताकतें फिर से सिर उठा रही हैं.

पीपीयूएफ ने एक वक्तव्य जारी कर कहा, ‘जो लोग जम्मू को अलग राज्य बनाने की मांग कर रहे हैं, उन्हें यह भी अनुमान होना चाहिए कि जम्मू देखने में कैसा लगेगा. ऐसी अनैतिक मांग का विरोध तो होगा ही.’ राज्य के पूर्व महाधिवक्ता मुहममद असलम गनी भी इस बैठक में शामिल थे.

और लद्दाख क्या चाहता है?

दूसरी ओर लद्दाख से भाजपा सांसद थपस्रूटन चुवांग ने हाल ही केंद्र को पत्र लिख कर कहा है कि प्रांत को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया जाए.

उन्होंने कैच से कहा, 'लद्दाख न तो कभी कश्मीर का अंग रहा और न ही जम्मू का. डोगरा शासकों ने हमें बिना वजह इकठ्ठा कर दिया. लद्दाख बाकी दो क्षेत्रों से पारम्परिक और सांस्कृतिक रूप से अलग है.’

हालांकि चुवांग ने बताया कि प्रांत के करगिल जिले के ज्यादातर लोग लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे और कश्मीर का ही हिस्सा बने रहना चाहते थे.

उन्होंने कहा, 'हम उनको पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. हम करगिल संगठनों के साथ अक्टूबर में बैठक करेंगे.' उन्होंने कहा हम उन्हें मना लेंगे. चुवांग ने कहा, करगिल के मुस्लिम अधिकांशतः शिया समुदाय से जुड़े हैं और इसीलिए वे घाटी में सुन्नी समुदाय से अलग ही रहे हैं.

इसके जवाब में करगिल से एक आठ सदस्यीय समूह ने सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के साथ हुई बैठक में लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा खारिज कर दिया.

नेताओं ने अनुच्छेद 370 को सुदृढ़ करने और लद्दाख की जनता को बराबर का हक देने की मांग की. इस प्रतिनिधि मंडल में इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट, इस्लामिया स्कूल ऑफ करगिल, लद्दाख पहाड़ी क्षेत्र विकास परिषद करगिल और विपक्षी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे. बौद्ध नेता झांसकर, त्सेरिंग, अंगदस और स्कॉलजेंग वांगयाल इस प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा नहीं थे.

बांटो और राज करने नीति छोड़ो

कश्मीर में अलगाववादियों ने शुरु से ही राज्य के तीन हिस्से करने का विरोध किया है. जम्मू को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग शुरू से ही केंद्र सरकार द्वारा समर्थित रही है ताकि कश्मीर की आजादी की मांग के समानान्तर रूप से यह मांग चलती रहे और राजनीतिक स्तर पर उसका महत्व कम किया जा सके.

जम्मू को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग अलगाववादी से अब मुख्य धारा के नेता बने सज्जाद लोन ने ही उठाई थी. 2007 में उनके द्वारा लाए गए कश्मीर हल के प्रस्ताव में जम्मू को अलग करने की बात कही गई थी.

हालांकि पहली बार ऐसा हो रहा है कि जम्मू को अलग राज्य बनाने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग का मुस्लिम समुदाय की ओर से विरोध किया जा रहा है; जो यहां के पहले से ही जटिल हालात को और मुश्किल बना रहा है.

हालांकि जरूरी नहीं कि इन मांगों की वजह से कोई राजनीतिक भूचाल आ जाए लेकिन फिलहाल इन मांगों ने जम्मू-कश्मीर की समस्या को पुनर्जीवित कर दिया है.

यद्यपि कश्मीर के मौजूदा अशांति के हालात राजनीतिक कारण से हैं लेकिन एक-दो घटनाएं ऐसी हुई नहीं कि इसे साम्प्रदायिक मामला बता दिया जाएगा, जम्मू को राज्य और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग फिर बलवती हो उठेगी.

First published: 9 September 2016, 8:13 IST
 
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