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ज्ञान का टापू: कश्मीर में खुली किताबों वाली कॉफी शॉप

गौहर गिलानी | Updated on: 18 May 2016, 7:55 IST

पुणे के रहने वाले वैज्ञानिक प्रसाद सुब्रमण्यम अपनी वैज्ञानिक पत्नी निमिषा और बेटी के साथ श्रीनगर में नई खुली कॉफी शॉप में कॉफी का आनंद ले रहे हैं. इस कॉफी शॉप की खास बात ये है कि आप यहां कॉफी के साथ अपनी मनपसंद किताबें पढ़ने का सुख ले सकते हैं. इस शॉप को इसके चाहने वाले 'आइलैंड ऑफ नॉलेज' कहने लगे हैं. कश्मीर घाटी में पहली बार ऐसी शॉप खुली है.

प्रसाद कहते हैं, "ये कॉफी शॉप यूनीक है. मैंने न्यूयॉर्क या सैन फ्रांसिस्कों तक में ऐसी शॉप नहीं देखी." उनकी पत्नी भी सहमति में सिर हिलाती हैं.

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ये कॉफी शॉप कश्मीर की मशहूर डल झील के करीब स्थित नेहरू पार्क इलाके में है. शॉप में अंग्रेजी और उर्दू की करीब 1500 किताबें हैं. ज्यादातर किताबें कश्मीर के इतिहास, संस्कृति, कविता, पर्यटन और धर्म से जुड़ी हुई हैं.

यहां मौजूद किताबों में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की आत्मकथा आतिश-ए-चिनार, युवा कश्मीरी लेखक मिर्ज़ा वाहिद का उपन्यास 'कोलैबोरेटर' और कश्मीरी-अमेरिकी कवि आगा शाहिद अली के कविता संग्रह 'द वेल्ड सूट' शामिल हैं. कॉफी शॉप के रीडिंग रूम में तख्ती टंगी है, "नॉट फॉर सेल"

कश्मीर घाटी में पहली बार खुली ऐसी कॉफी शॉप जिसमें ग्राहक किताबें भी पढ़ सकते हैं

प्रसाद और निमिषा कश्मीर में एक वैज्ञानिक सम्मेलन में शामिल होने के लिए आए थे. निमिषा कहती हैं, "किताब और कॉफी का कप इससे सुंदर जिंदगी नहीं हो सकती." उन्हीं की तरह कई दूसरे भारतीय और विदेशी सैलानियों को ये कॉफी शॉप काफी पसंद आ रही है.

इस कॉफी शॉप का 28 साल के अरसलान अली चलाते हैं. शॉप का उद्घाटन राज्य की पहली महिला सीएम महबूबा मुफ्ती ने किया था.

अलसलान ने कैच को बताया, "हर दिन 100-150 पर्यटक हमारे यहां आते हैं. वीकेंड में पर्यटकों की संख्या 250 तक पहुंच जाती है."

तस्वीरें- बॉलीवुड और किताबों के शौकीन यूपीएससी टॉपर कश्मीर के अतहर

इस शॉप के मालिक गुलशन बुक्स शॉप हैं जो कश्मीर के सबसे पुराने प्रकाशकों में एक हैं. इस प्रकाशन के मालिक हैं शेख एजाज़ हैं. अरसलान दावा करते हैं, "गुलशन बुक्स 90 सालों से प्रकाशन के व्यवसाय में हैं."

कश्मीरी इतिहासकारों के अनुसार घाटी में पहला रीडिंग रूम वामपंथी बुद्धिजीवियों ने मई, 1930 में शुरू किया था. इतिहासकारों के अनुसार कश्मीरी नौजवान उर्दू और अंग्रेजी अखबार पढ़ते थे, फ्रांसीसी और रूसी क्रांति के बारे में चर्चा किया करते थे.

1930 और 1940 के दशक में घाटी में पंजाबी और मुस्लिम वामपंथी बुद्धिजीवियों का अच्छा-खासा प्रभाव था.

कश्मीरी इतिहासकारों के अनुसार वामपंथियों बुद्धिजीवियों ने 1930 में खोला था घाटी में पहला रीडिंग रूम

इस शॉप में हमारी मुलाकात 23 वर्षीय तसलीमा से हुई. तसलीमा कश्मीर यूनिवर्सिटी में इतिहास में एमए कर रही हैं.

तसलीमा कैच से कहती हैं, "ये शानदार प्रयास है. कश्मीर में ऐसे और रीडिंग रूम खुलने चाहिए."

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कॉफी शॉप में मौजूद नौशीन इंजीनियरिंग की छात्रा और पोएट हैं. नौशीन कैच से कहती हैं, "यहां कश्मीरी ज़बान में भी किताबें होनी चाहिए."

नौशीन की बात सुनकर शॉप के मैनेजर ने हमें बताया कि यहां कश्मीरी में भी कुछ किताबें हैं. कॉफी शॉप के बगल में ही गुलशन बुक्स की एक अलग किताब की दुकान है जहां से किताबें खरीदी जा सकती हैं.

प्रसाद कहते हैं, "यहां की खूबसूरती बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं."

First published: 18 May 2016, 7:55 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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