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जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार इन वजहों से नहीं टूटेगी

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 September 2016, 3:31 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अफ़वाहों से इतर सच्चाई यह है कि राज्य में इन हालात के बावजूद पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार सबसे आदर्श सरकार है.
  • 1947 के बाद पहली बार भारत के एकमात्र मुस्लिम राज्य पर हिंदुत्व पार्टी शासन कर सकी है, जिसकी 2014 के विधानसभा चुनावों तक कल्पना नहीं की जा सकती थी. 

मीडिया की रिपोर्ट को मानें तो जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन की संभावनाएं लगती हैं, पर सच्चाई इसके उलट है. यहां गठबंधन सरकार बनी रहेगी. इसलिए नहीं कि राज्य की गठबंधन सरकार के पीडीपी-बीजेपी नेता औपचारिक-अनौपचारिक रूप से ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए भी कि यही राजनीतिक सच्चाई है. 

ऐसी ही एक अहम सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर के इन हालात में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार सबसे आदर्श सरकार है.

घाटी में चल रहे हिंसक विरोध को दबाने के लिए कड़ी सुरक्षा में रुकावट बनने की बजाय, उनका डटे रहना बताता है कि वहां की ज्यादतियों को सामना करने के लिए वे तैयार हैं. एक वरिष्ठ पीडीपी नेता ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'मैं अधिकारपूर्वक कह सकता हूं कि गठबंधन को कोई खतरा नहीं है. हम अपना कार्यकाल पूरा करेंगे. जो कुछ भी समाचार पत्र लिख रहे हैं, वास्तविक कहानी उससे अलग है.'पूरे राज्य में लोग ऐसा ही मानते हैं. 

उनका तर्क है कि गठबंधन की उपयोगिता न केवल वर्तमान कलह को देखते हुए है, बल्कि दोनों पार्टियों के हित में भी है. हालांकि वैचारिक रूप से दोनों पार्टियां भिन्न हैं, फिर भी गठबंधन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है और यह पीडीपी से ज्यादा भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से फायदे का है.

कुछ लोगों का मानना है कि 1947 के बाद पहली बार भारत के एकमात्र मुस्लिम राज्य पर हिंदुत्व पार्टी शासन कर सकी है, जिसकी 2014 के विधानसभा चुनावों तक कल्पना नहीं की जा सकती थी. 

जम्मू-कश्मीर भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडा का मुख्य हिस्सा रहा है. पार्टी ने हमेशा भारतीय संघ में जम्मू-कश्मीर के समावेश को विशेष अधिकार माना है, इसके बावजूद कि राज्य में पाकिस्तान के दखल से बढ़ती राजनीतिक समस्या को सुलझाना चुनौती थी, जो हाल में फौजी कमांडर बुरहान वानी की हत्या के विरोध में भड़की घाटी से और बढ़ी. 

जम्मू सरकार गिराना मतलब मोदी सरकार गिराना

एक पीडीपी नेता ने कहा, 'जम्मू सरकार को गिराने का मतलब नरेंद्र मोदी की सरकार को गिराना होगा और फिर भाजपा राज्य में अपने बल पर सत्ता में नहीं लौट सकेगी.' उन्होंने आगे कहा, पहला कारण यह है कि हिंदूओं के एकीकृत वोट जो भाजपा को जम्मू में मिले (25 सीटें), अब जम्मू इसे अकेला नहीं दुहरा सकेगा. और दूसरी वजह, यदि गठबंधन का यह प्रयोग विफल हो जाता है, तो कश्मीर की कोई भी पार्टी भाजपा के साथ मिलने से पहले दो बार सोचेगी. इसलिए इस प्रयोग को सफल बनाना हम दोनों के हित में है और देश के भी हित में है.' पीडीपी नेता ने भाजपा की भी राय को शामिल करते हुए  कहा. भाजपा नेता और केंद्र की ओर से जम्मू-कश्मीर के लिए नियुक्त राम माधव ने पहले एक टीवी चैनल को इंटरव्यू में कहा था कि, 'मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली सरकार में हमारा भरोसा है. यह 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा करेगी.' 

घाटी में आमराय, गठबंधन अब टूटने के कगार पर

घाटी में आम राय है कि गठबंधन उस सीमा पर आ गया है, जहां यह टूट सकता है। एक स्थानीय स्तंभकार ने कहा, 'गठबंधन सरकर के सामने टूटने की स्थिति दो बार आ चुकी है: पहला, जब महबूबा मुफ्ती ने अपने पिता के निधन के बाद सरकार बनाने में तीन महीने की देरी कर दी थी और दूसरा तब जब 30 लोगों के मारे जाने और फौजी कमांडर बुरहान वानी की हत्या के 48 घंटे बाद मरने वालों की संख्या तेजी से बढऩे के बाद उन्होंने तुरंत त्याग-पत्र नहीं दिया. अब जब इसे पूरी तरह से बदनाम किया जा रहा है, पीडीपी गठबंधन को छोडऩे के बारे में सोच तक नहीं सकती.'

पीडीपी की अटपटी स्थिति को देखते हुए पार्टी के एक नेता ने कहा कि पार्टी में कोई भी त्याग-पत्र के पक्ष में नहीं था. 'बुरहान वानी की हत्या के बाद पार्टी की पहली मीटिंग में कई नेताओं ने मानवाधिकारों की ज्यादतियों के बारे में सख्ती से कहा था. पर जब महबूबा मुफ्ती ने उन्हें कहा कि यदि वे राज्य के मामलों को लेकर इतना नाराज हैं, तो पार्टी के लिए बेहतर है कि वे ऑफिस छोड़ जाएं. तब सब चुप हो गए.'

नरमी की बजाय अलगाववादियों पर सख़्ती

पिछले दो सालों में पीडीपी अपने नरम अलगाववादी रुख से बाहर आ गई है. पार्टी और संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले पार्टी के संस्थापक नेता तारिक हमीद कर्रा कहते हैं कि पीडीपी 'बफर पार्टी' नहीं रही है, जो मुख्यधारा-अलगाववादी विभाजन में दोनों ओर बनी हुई थी. कर्रा ने कहा, 'हमने पीडीपी को दो एकदम विपरीत विचारों के बीच बफर बनाया, लेकिन अब हमने बीच का रास्ता छोड़ दिया है और आरएसएस के साथ एकदम चरम पर आ गए हैं.' कहा जाता है कि पार्टी का 'बफर चरित्र' नहीं रहने से कर्रा ने पार्टी छोड़ी, पर अपनी मशहूर वैचारिक स्थिति को छोडऩे से लगता है कि पीडीपी एनसी से भी ज्यादा भाजपा के और करीब हो गई है.

एक पीडीपी नेता ने कहा, 'हम आखिर भारत का हिस्सा हैं, एनसी की तरह नहीं, जिन्होंने 2010 में चल रहे विरोध की प्रतिक्रिया में कहा था कि कश्मीर केवल भारत का हिस्सा है. 2010 में एनसी ने कहा था कि अशांति नई दिल्ली के खिलाफ थी, न कि राज्य सरकार के खिलाफ. हम कहते हैं, यह नई दिल्ली के खिलाफ है और हमारे खिलाफ भी है.'

पिछले दो महीनों में दिए महबूबा के बयान और इन सब हालात में-विरोधियों, कथित संचालकों और पाकिस्तान को लेकर उनके कड़े रुख से साफ है कि वर्तमान संकट में वे दोनों पार्टियों के गठबंधन के पक्ष में हैं. मसलन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के श्रीनगर में दूसरे दौरे के दौरान एक प्रेस कांफ्रेंस में पूछे गए एक सवाल की प्रतिक्रिया में महबूबा में कोई उत्तेजना नहीं थी, बल्कि उन्होंने पलट कर तीखे सवाल किए थे, 'क्या आर्मी कैंप पर आक्रमण करने वाला लड़का वहां टॉफी खरीदने गया था? पुलिस स्टेशन (दक्षिणी कश्मीर) पर हमला करने वाला 15 साल का लड़का क्या वहां दूध खरीदने गया था?' उनके स्वर में तेजी साफ झलक रही थी। उनके इस कथन को, उनके रहते हुए मारकाट को न्यायपूर्ण ठहराने के अर्थ में लिया जा रहा था.

नसीर कहते हैं, 'महबूबा ने अपनी पूर्व राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, भाजपा की उम्मीदों के अनुरूप राजनीतिक सामंजस्य बैठाए रखनेे के लिए सख्त और नुकसान पहुंचाने वाली रियायतें तक बरती हैं. हिंसक विरोध से सुरक्षा को लेकर केंद्र का जो रवैया रहा है, उस संबंध में भी उन्होंने अपने अधिकार के लिए कोई आवाज नहीं उठाई. तब इस धरती पर गठबंधन भला क्यों टूटेगा?'  

First published: 26 September 2016, 3:31 IST
 
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