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कश्मीर: कथनी में ही नहीं करनी में भी वाजपेयी को लाएंगे पीएम मोदी?

सुहास मुंशी | Updated on: 10 August 2016, 16:36 IST

घाटी में जन अशांति और लगातार जारी हिंसा के दौर के 32 दिनों बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के मसले पर बयान दिया है. इस बीच तकरीबन 60 लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों की आंखों की रोशनी जा चुकी है.

हालांकि नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के युवाओं से अपनी बात कहने के लिए असंभावित सी जगह चुनी- मध्य प्रदेश में अलीराजपुर. यह स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली है. यहीं से मोदी

ने भारत की आजादी के सत्तर सालों का उत्सव मनाने के लिए तय 15 दिनों के कार्यक्रम की शुरुआत की और इसके लिए चुना वह दिन जिस दिन गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया था.

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोगों को बताया कि मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली का दौरा किया है. हालांकि यह बात दीगर है कि आजाद की अधिकांश क्रांतिकारी गतिविधियां उत्तर प्रदेश के उन्नाव, वाराणसी, लखनऊ और काकोरी जैसी जगहों पर केंद्रित रहीं. और कुछ लोग यहां यह तर्क भी दे सकते हैं कि आजादी के संघर्ष का हिस्सा रहे कांग्रेस के नेताओं को हथियाने की यह भाजपा की एक और कोशिश है.

वाजपेयी शायद वह इकलौते प्रधानमंत्री थे जो विश्वास के मामले में कश्मीरियों के करीब आये थे.

कश्मीर मसले पर पीएम मोदी ने कहा, “नौजवान लड़के, जिनके हाथों में लैपटॉप होना चाहिए, जिन्हें खेलना-कूदना चाहिए, उन्होंने अपने हाथों में पत्थर उठा रखे हैं. मेरे मासूम बच्चों का क्या होगा...आगे आओ हम मिल कर कश्मीर को धरती का स्वर्ग बना दें.”

उन्होंने कहा कि ये नौजवान मुट्ठी भर लोगों की वजह से राह भटक गये हैं, जिन्होंने इन युवाओं के हाथों में पत्थर थमा दिये हैं. फिर मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए कहा, “इंसानियत, कश्मीरियत, जम्हूरियत.” और मोदी ने इस विषय को इस नारे के साथ खत्म किया “एक राष्ट्र, एक नजरिया.”

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हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के इनकाउंटर के बाद घाटी में फैली व्यापक अशांति के बाद यह पहला मौका था जब वह कश्मीर के बारे में बोले और फिर भी वह कश्मीरियों के बारे में उतना नहीं बोले जितना वह बोल सकते थे. दरअसल भाजपा काफी लंबे समय से यह दावा करती आ रही है कि कश्मीरी नौजवान मुट्ठी भर लोगों के प्रभाव में आ गये हैं और घाटी में अशांति की वजह बेरोजगारी है. लेकिन इन्होंने इस बात को अनदेखा किया है कि काफी बड़ी संख्या में युवा बाहर निकले हैं. इन्होंने इस बात की भी उपेक्षा की है कि उनमें खासे पढ़े-लिखे और बेहतरीन पृष्ठभूमि से आने वाले युवा भी हैं.

मोदी की ओर से इस बात को दुहरा दिये जाने ने उन लोगों को निराश किया जो प्रधानमंत्री से ‘राहत भरी छुअन’ की उम्मीद कर रहे थे. एक और बात जो कश्मीर के लोग अनदेखा नहीं कर सकते, वह यह कि जब कश्मीर बहुत ही नाजुक हालात से गुजर रहा है, प्रधानमंत्री जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री को बातचीत का समय नहीं दे रहे हैं. इससे फिर एक बार यह संदेश जायेगा कि अहंकारी दिल्ली घाटी और इसके कश्मीरी मुख्यमंत्री को नीची निगाह से देख रही है.

वाजपेयी शायद वह इकलौते प्रधानमंत्री थे जो विश्वास के मामले में कश्मीरियों के करीब आये थे. और मोदी द्वारा वाजपेयी को याद किया जाना महज एक सांकेतिक प्रदर्शन था जिससे भला कम और बुरा अधिक होगा. नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में जारी हिंसा के बारे में समयोचित प्रतिक्रिया नहीं दी और घाटी के बारे में उन्होंने एक कड़ा नजरिया अपना रखा है. वह फिलहाल हुर्रियत से बात नहीं कर रहे हैं. जब पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने उनसे बात की, तो पाकिस्तान से भी बातचीत बंद कर दी गयी. ऐसे में मोदी दरअसल वाजपेयी के बिल्कुल उलट नजर आते हैं, क्योंकि वाजपेयी की नीति कहीं अधिक समावेशी थी.

कश्मीर के बारे में बातचीत की सीमाओं के बावजूद वाजपेयी ने ‘कश्मीरियत’ और ‘इंसानियत का दायरा’ की महज बात ही नहीं की, बल्कि उन्होंने सक्रियता दिखायी और हुर्रियत से बात की. उन्होंने श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा फिर से शुरू की और यहां तक कि हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं को इसमें जाने की भी अनुमति दी.

रॉ के पूर्व मुखिया और कश्मीर मसले पर अटल बिहारी वाजपेयी के सलाहकार रहे एएस दौलत का मानना है कि कश्मीरियों तक संदेश पहुंचाने का और बेहतर तरीका हो सकता था. उन्होंने कहा, “यही भाषण दिल्ली में दिया जा सकता था, इसने एक बेहतर संदेश दिया होता. भाषण में उन्होंने क्या कहा, इसे छोड़ भी दें, तो अगर यही बात महबूबा के साथ एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कही गयी होती, तो इसका काफी अच्छा असर होता.”

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मोदी द्वारा वाजपेयी को याद करने के संदर्भ में दौलत कहते हैं कि सोच-समझ कर वाजपेयी को याद करना ठीक नहीं था. साल 2014 में जम्मू में भी मोदी ने वाजपेयी को याद किया था लेकिन उसके बाद ऐसा लगा कि वाजपेयी और उनके विचार घाटी से खत्म हो गये हैं. आप उनको इस तरह से याद नहीं कर सकते.

जद (यू) नेता और राज्य सभा के सदस्य केसी त्यागी कहते हैं कि मोदी ने जिस तरह से दलितों के बजाय खुद को गोली मारने की बात कही थी, अगर उन्होंने वही बात कश्मीरी नौजवानों के लिए कह दी होती, तो काफी अधिक फर्क पड़ सकता था.

त्यागी कहते हैं, “कश्मीर के हालात काफी खराब हैं और हम सबको यह पता है. काफी लोग मारे जा चुके हैं, हजारों नागरिक और सुरक्षा बलों के जवान घायल हो चुके हैं. तब उन्होंने कश्मीरियत को क्यों याद नहीं किया? पिछले दो साल से राज्य में उनकी सरकार को किस बात ने इंसानियत के बारे में बात करने से रोका था? तब तो वह अपना 56 इंच का सीना दिखाने में व्यस्त थे.”

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त्यागी आगे कहते हैं कि मोदी सरकार ने केंद्र में और फिर राज्य में सत्ता में आने के बाद से कश्मीर के मसले से निबटने की कभी कोशिश ही नहीं की. वह पूछते हैं, “आप पूर्वोत्तर के अतिवादियों से लगातार बात करते हैं, उनकेसाथ प्रेस कांफ्रेंस करते हैं. हुर्रियत से बात करने से आपको किसने रोका है?”

घाटी के कुछ लोगों का मानना है कि मोदी के बयान से वे लोग छल में नहीं पड़ेंगे जो लोग हर रोज सड़कों पर उतर रहे हैं, उनकी बातों को तब तक स्वीकार किये जाने के आसार नहीं हैं जब तक उनकी बातों के अनुरूप ठोस कदम न उठाये जायें.

कश्मीर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर नूर अहमद बाबा कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि यहां के अधिकांश लोगों पर मोदी की बात का असर होगा. मोदी ने काफी समय के बाद और काफी खूनखराबे के बाद बयान दिया है. ऐसे में उनकी बात की त्वरित प्रतिक्रिया सकारात्मक होने की संभावना नहीं है. देखने वाली बात यह है कि इस बयान को अमलीजामा पहनाने के लिए वह क्या कदम उठाते हैं. ”

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मोदी द्वारा वाजपेयी के दिए संदर्भ पर बाबा कहते हैं, "वाजपेयी के वक्त माहौल अलग था. वह हमेशा कुछ अलग हट कर सोचते थे और उन्होंने कश्मीरियों के साथ और पाकिस्तान के साथ विश्वास बहाली के उपाय किये. उन्होंने वास्तविक शांति प्रक्रिया की शुरुआत की और अन्य लोगों से कहीं अधिक बेहतर तरीके से कश्मीर की असली जटिलता को समझा.”

जेएनयू के प्रोफेसर कमल मित्र चिनॉय कहते हैं कि ‘पेलेट गन’, जो इस समय कश्मीर में हिंसा की तात्कालिक वजह मानी जा रही हैं, के बारे में मोदी ने कुछ नहीं कहा. वह कहते हैं, "आप वाजपेयी का नाम ले कर जमीनी हकीकत को नहीं बदल सकते. अगर आप कश्मीर के लोगों से बात करना चाहते हैं, तो अपने गृह मंत्री को भेजने के बजाय मोदी खुद वहां गये होते. दूसरी बात, कश्मीर के लोगों से बात करने के लिए मोदी को उनको कुछ छूट देनी होगी, जो देने के लिए वह तैयार नहीं हैं.  कश्मीर फिलहाल आजादी के बाद से सबसे कठिन वक्त से गुजर रहा है और इस हालात को सुधारने के लिए मोदी कुछ भी नहीं कर रहे हैं.”

First published: 10 August 2016, 16:36 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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