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अगर दिल्ली नहीं चेती तो कश्मीर में बहुत कुछ उसके हाथ से फिसल जाएगा

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 21 July 2016, 8:11 IST
(गेटी)

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत पर कश्मीर में हो रहे उग्र विरोध प्रदर्शन 2010 जैसे नहीं हैं. यह उग्र आंदोलनों का एक और दौर नहीं है, बल्कि स्थिति ठीक इसके विपरीत है. मौजूदा बहाव वापस आतंकवाद की ओर है. वहां बंदूक के लिए नए सिरे से मोह पैदा हो गया है. मोटे तौर पर इसलिए क्योंकि इसने अब जनता के सम्मान और खौफ को अपने वश में कर लिया है, जैसा इसने नब्बे के दशक में किया था.

पिछले एक साल के दौरान हर आतंकवादी के अंतिम संस्कार ने कुछ युवाओं को बंदूक उठाने के लिए प्रेरित किया है. बुरहान की मौत पर गहरे दुख और गुस्से का उमड़ पड़ना और युवा प्रदर्शनकारियों के बीच उसके लिए मरने-मारने जैसी खतरनाक स्थिति का पैदा होना स्पष्ट संकेत है कि नई दिल्ली से लड़ने के उसके (बुरहान के) विचार ने एक निश्चित वर्ग का समर्थन जुटा लिया है.

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ऐसा क्यों हुआ? कश्मीर के जानकार इसके लिए पिछले पांच साल की राजनीतिक शून्यता की ओर इशारा करते हैं.

एक स्थानीय स्तंभकार नसीर अहमद कहते हैं, "2010 के बाद से सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन कुछ शहरी इलाकों तक सीमित थे और ये प्रदर्शन किसी का ध्यान खींचने में या नई दिल्ली की ओर से कश्मीर के प्रति कोई गंभीर राजनीतिक पहल कराने में विफल रहे. इसके अलावा, आजादी के नाम पर होने वाले सामान्य विरोध प्रदर्शन कश्मीर में स्थिति को सामान्य करने के राह में छोटी-मोटी बाधा साबित होते थे. लेकिन इस बार बंदूक एक बार फिर से युवाओं को आकर्षित कर रही है. अगर ऐसा हुआ तो कश्मीर का मुद्दा आगे भी सुर्खियों में रह सकता है."

जब उग्रपंथी निराश हो गए थे, दो दशकों के विद्रोह को कोई तव्वजो नहीं मिल रही थी, स्थिति सामान्य हो रही थी, मुख्यधारा की राजनीति की वापसी हो रही थी ठीक उसी समय बुरहान वानी पटल पर उभर आया. उसने लोगों को पुनः याद दिलाया कि कश्मीर के साथ क्या-क्या गलत हुआ है और उसने उसका प्रतिनिधित्व किया. लोगों ने भी तुरंत उसे हाथों हाथ लिया और उसके साथ जुड़ते चले गए.

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यह तर्क दिया जाता है कि बुरहान ने बंदूक के विकल्प का रूमानीकरण कर दिया और ऐसा भ्रम पैदा कर दिया कि स्थानीय राजनीति नपुंसक हो चुकी है, वह अपने इलाके की समस्याओं का समाधान करने की बजाय नई दिल्ली की जुबान बोलती है और उसकी राजनीति को सलाम करती हैं. उसकी मौत के बाद उससे पैदा हुई लामबंदी से स्पष्ट है कि बुरहान आतंकवाद को कुछ ताजा नैतिक ग्लैमर प्रदान कर गया है.

ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों की ओर

2010 तक लगातार तीन गर्मियों के असंतोष के बाद विरोध प्रदर्शन श्रीनगर से बाहर की ओर फैलने लगे थे. इस दौरान ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के पास सोचने का ही समय नहीं था. वर्ष 2000 तक ग्रामीण इलाकों में ऐसा ही आतंकवाद था. उग्रवाद और विरोध प्रदर्शन के मामले में ग्रामीण क्षेत्र शहर से प्रेरणा लेता था. लेकिन मौजूदा विद्रोह का उग्र स्वरूप आपको बता देगा कि अब ऐसा नहीं है. विरोध प्रदर्शन दक्षिण कश्मीर से शुरू हुए और श्रीनगर से लेकर जम्मू के कुछ हिस्सों तक जा पहुंचे.

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आतंकवाद के साथ भी ऐसा ही मामला है. श्रीनगर के अंतिम आतंकवादी सज्जाद अहमद खान को जम्मू के राजौरी में मुठभेड़ में 2010 में मार गिराया गया था. हालांकि शहर से एक और कथित आतंकी जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर कुंद में हाल ही में एक मुठभेड़ में मारा गया था. लेकिन इस मुठभेड़ की परिस्थितियों ने इस पर संदेह खड़ा कर दिया था.

एक हद तक यह एक अस्थायी घटना हो सकती है, लेकिन यह उथलपुथल मोटे तौर पर ग्रामीण इलाकों में फूटे विद्रोह के बारे में है. ऐसे में इस विचार में कोई हैरानी की बात नहीं है कि लगभग सभी आतंकवादी समूहों में नए सिरे से हो रही सभी भर्तियां गांवों से ही हो रही है. यहां तक कि खुद बुरहान भी त्राल के बाहरी इलाके में एक गांव शरीफाबाद का रहने वाला था.

सुरक्षा शिविरों, पुलिस चौकियों पर हमले

2008 से 2010 तक सेना के शिविरों और पुलिस स्टेशनों पर कम हमले होते थे. लेकिन अब, पुलिस स्टेशनों, चौकियों, सेना के शिविरों और यहां तक कि अवंतिपुरा एयरबेस पर भी प्रदर्शनकारियों ने हमला कर दिया.

कई पुलिस चौकियों को जला दिया गया था. प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस वाहन और लसीपोरा, पुलवामा में कुछ जब्त वाहनों को आग लगा दी थी. इसी तरह, बिजबेहरा में राजकीय रेलवे पुलिस के एक गार्ड रूम और रेलवे सुरक्षा बल की एक बैरक को आग लगा दी गई थी.

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कुछ ऐसा ही हाल खुशीपुरा की पुलिस चौकी के साथ किया गया. सोइबुघ बडगाम में वह एक मंजिला इमारत भी जला दी गई थी जहां से सोइबुघ पुलिस चौकी का काम होता था. एक पुलिस वाहन को संगम के निकट झेलम में धकेल दिया गया था जिसमें उसके चालक की जान चली गई. और यह सब ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों के प्रदर्शनकारियों द्वारा किया गया.

2010 में कट्टरपंथी हुर्रियत प्रमुख सैयद अली गिलानी ने लोगों से सेना के शिविरों के बाहर विरोध प्रदर्शन करने को कहा था, लेकिन जब सेना के परिणामों की चेतावनी दी तो उन्होंने अपनी बात वापस ले ली थी.

एक सप्ताह के प्रदर्शन में अधिकतम मौतें

2010 में, दो महीने के विरोध प्रदर्शनों में लगभग 45 व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी. इसी तरह तीन महीनों तक चले भीषण आजादी आंदोलन के दौरान लगभग 60 प्रदर्शनकारी मारे गए थे. घायलों की संख्या भी काफी कम रही थी. लेकिन अब 45 लोगों की मौत तो सिर्फ एक सप्ताह में ही हो चुकी है. अपंग और घायलों की संख्या 2000 से ऊपर पहुंच गई है.

सरकार के खुद के अनुमान के अनुसार 600 से ज्यादा युवाओं के शरीर या आंखों में पैलेट से चोटें आई हैं. इनमें से लगभग 100 तो ऐसे हैं जो आंखों में हुए जख्म के कारण आंशिक या पूर्ण अंधेपन के शिकार हो जाएंगे. एसएमएचएस में डॉक्टर पहले से ही छह युवाओं के अंधे होने की घोषणा कर चुके हैं जिनमें शोपियां के गांव सीडो की एक 14 साल की लड़की इंशा मलिक भी है.

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14 जुलाई को राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में पेश आंकड़ों के अनुसार लगभग 125 को गोलियां लगी हैं. उसके बाद से संख्या और बढ़ी है.

पैलेट वाली बंदूकों की तैनाती 2010 के अंत में अशांति के बीच भीड़ पर नियंत्रण पाने वाले उपकरण के रूप में की गई थी. 14 अगस्त 2010 को, पंप एक्शन राइफल को पहली बार सीलो सोपाेर में 3000 लोगों की भारी भीड़ पर इस्तेमाल किया गया था. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार इसमें छह लोग घायल हो गए थे.

पाकिस्तान सक्रिय

2010 में पाकिस्तान राज्य में अशांति के समर्थन में कम सक्रिय था. तत्कालीन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने स्थिति को एक तरफ रहकर ही देखा था. उस समय पाकिस्तान के मीडिया की घटनाक्रम में कम ही दिलचस्पी थी. लेकिन इस बार पाकिस्तान सरकार कश्मीर में हत्याओं की औपचारिक निंदा से भी आगे बढ़ गई और कश्मीरियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए 19 जुलाई को काला दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है.

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लाहौर में कैबिनेट की विशेष बैठक आयोजित की जिसमें कश्मीर में स्थिति पर चर्चा की गई. उन्होंने कश्मीरियों के आंदोलन को स्वतंत्रता का आंदोलन कहा. साथ ही, बुरहान को एक शहीद भी घोषित कर दिया. शरीफ ने प्रदेश में चल रहे हालात पर चर्चा के लिए संसद का विशेष संयुक्त सत्र आयोजित करने का फैसला किया है.

इससे भी बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने भी रावलपिंडी स्थित जनरल मुख्यालय में कॉर्प्स कमांडर कॉन्फ्रेंस के अंत में जारी बयान में भारत द्वारा "निर्दोष कश्मीरी युवाओं की नृशंस हत्या" की निंदा की.

इसी तरह, 'डॉन', डेली टाइम्स और द न्यूज जैसे प्रमुख पाकिस्तानी अखबारों ने कश्मीर से जुड़ी खबरों को संपादकीय पन्ने पर प्रमुखखता से जगह दी है. कई अखबारों में कश्मीर पर राय जताने वाले कॉलम और संपादकीय नजर आ रहे हैं.

First published: 21 July 2016, 8:11 IST
 
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