Home » इंडिया » kashmir plebiscite and role of pakistan
 

कश्मीर में जिस जनमत संग्रह की बात हमेशा होती है उसके न होने के लिए कौन जिम्मेदार है?

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 24 August 2016, 8:54 IST

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद से जम्मू-कश्मीर पिछले डेढ़ महीने से खबरों में है. अब तक वहां सुरक्षाबलों और स्थानीय नागरिकों के बीच हुई झड़प में 65 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सैकड़ों की संख्या लोग घायल हुए हैं.

जम्मू-कश्मीर पर भारत का रुख साफ है, भारत उसे अपना अभिन्न अंग मानता हैं. वहीं पाकिस्तान हमेशा से कहता आया है कि कश्मीर पर भारत का अवैध कब्जा है. इसके अलावा कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी संगठन और पाकिस्तान हमेशा यहां संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार के जनमत-संग्रह की मांग करते आए हैं.

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि कश्मीर का मामला अंतरराष्ट्रीय मसला कब बना. 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजी उपनिवेशी राज से आजादी मिली, लेकिन उस समय कई रियासतों ने भारत में विलय करने से इंकार कर दिया. इसमें जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह भी शामिल थे. वे भारत या पाकिस्तान में कश्मीर का विलय नहीं चाहते थे.

आजाद जम्मू-कश्मीर पर हमला

अंग्रेजों के जाने के बाद कश्मीर को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी और उसी बीच पाकिस्तान ने कश्मीर में आक्रामक रुख अपनाते हुए हथियारबंद कबाइलियों और अपने सैनिकों को जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करवा दी. इस हमले से महाराज हरि सिंह के हाथ पांव फूल गए. आजादी मिलने के करीब ढाई महीने बाद हरि सिंह के आग्रह पर भारतीय सैनिकों ने कश्मीर में प्रवेश किया और सुरक्षा की कमान अपने हाथ में ले ली. भारतीय सैनिकों के कश्मीर में जाने से जुड़ी कहानी भी दिलचस्प है.

पाकिस्तान के हमले से हड़बड़ाए महाराजा हरि सिंह ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मदद की अपील की. बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार नेहरू ने इस मामले में यह कहते हुए अपना हाथ खड़ा कर दिया कि कश्मीर के भारत में विलय से पहले भारतीय सैनिकों का वहां कदम रखना गैरकानूनी होगा.

नेहरू की इस शर्त के बाद 26 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके अगले दिन भारतीय सैनिकों ने श्रीनगर में मोर्चा संभाल लिया.

स्थिति काबू में आने के बाद जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप को लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 31 दिसंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र संघ का दरवाजा खटखटाया. संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में दोनों देशों के बीच युद्धविराम हुआ. युद्धविराम होने तक जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान का कब्जा हो चुका था. कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान की जबकि दो तिहाई हिस्से पर भारत का कब्जा था.

संयुक्त राष्ट्र ने इस विवाद को निपटाने के लिए कश्मीर में जनमत संग्रह का प्रस्ताव रखा जिसे नेहरू ने मान लिया. आम तौर पर पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान, पाकिस्तानी मीडिया और कश्मीरी अलगाववादी अक्सर यूएन के उसी जनमत संग्रह वाले प्रस्ताव की बात करके भारत पर अपने वादे से पीछे हटने का आरोप लगाते हैं. पर क्या यह पूरा सच है? कश्मीर में जनमत संग्रह के सच को जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र के उस मूल प्रस्ताव को जानना जरूरी है.

जनमत संग्रह को लेकर पारित संयुक्त राष्ट्र का मूल प्रस्ताव एक अलग ही कहानी बताता है. इसे पढ़ने के बाद हम पाते हैं कि इसके लिए अगर कोई सबसे अधिक जिम्मेदार है तो वह पाकिस्तान है.

जनमत संग्रह की पूर्व शर्तें

संयुक्त राष्ट्र में जनमत संग्रह के लिए जो प्रस्ताव पास किया गया था उसके लिये तीन मुख्य शर्तें निर्धारित की गई थी. 21 अप्रैल 1948 को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 के अनुसार जनमत संग्रह से पूर्व दोनों देशों को कुछ निर्देश जारी किया गया था.

प्रस्ताव के अनुसार पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर से कबाइलियों और पाकिस्तान के उन नागरिकों को जिनका घर जम्मू-कश्मीर में नहीं है उनकी पूरी तरह से वापसी सुनिश्चित करनी है, जो इस क्षेत्र में लड़ने और घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही जो जम्मू-कश्मीर के खिलाफ लड़ रहे हैं वैसे लोगों को पाकिस्तान द्वारा किसी भी प्रकार की मदद नहीं करनी होगी.

प्रस्ताव में पाकिस्तान के लिए यह भी कहा गया कि राज्य को सभी मामलों को स्वतंत्रता का अधिकार दिया जाये और राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सहयोग करना होगा.

इस प्रस्ताव की दूसरी शर्त कहती है कि पाकिस्तान द्वारा पहली शर्त पूरी होने पर यानी जब घुसपैठिये राज्य से बाहर चले जाएंगे तो भारतीय सुरक्षा बल भी राज्य से बाहर चले जाएंगे. लेकिन कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए न्यूनतम संख्या में भारतीय सुरक्षा बल राज्य में तैनात रहेगा.

भारत से यह भी कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में मौजूद उसके सैनिक राज्य के निवासियों को किसी तरह से प्रभावित नहीं करेंगे.

यह दोनों शर्ते पूरी हो जाने की स्थिति में यूएन अपना एक कमीशन नियुक्त करेगा जिसकी देखरेख में जनमत संग्रह करवाया जाएगा.

सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस प्रस्ताव के तीन हिस्से थे. पहले हिस्से में जम्मू-कश्मीर में शांति-व्यवस्था की बहाली जिसके तहत सबसे पहले पाकिस्तान को कदम उठाना था. दूसरे हिस्से में कहा गया कि जब पहले हिस्से की शर्तें पूरी हो जाए तो भारत को जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह के लिए माहौल बनाना था. जिसके तहत जम्मू-कश्मीर सरकार और राजनीतिक समूहों को जनमत संग्रह के लिए तैयार करना था. तीसरे हिस्से में सुरक्षा परिषद द्वारा जनमत संग्रह के पर्यवेक्षण की अपेक्षा की गई थी.

बहरहाल, दोनों देशों ने जनमत संग्रह से पूर्व की दोनों शर्तों पर कभी अमल ही नहीं किया और कश्मीरियों द्वारा आत्मनिर्णय करने की स्थिति कभी नहीं बनी. इसके बाद अगले दस सालों तक संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को लेकर आठ प्रस्ताव पारित हुये. आखिरी प्रस्ताव 1957 में पारित हुआ था.

भारत-पाक ने कश्मीर को द्विपक्षीय मसला माना

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965, 1971 और 1999 में युद्ध हो चुके हैं. दोनों देशों के बीच 1971 के युद्ध के बाद शिमला समझौता हुआ था. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच दो जुलाई 1972 को एक संधि हुई. इसमें दोनों देशों ने तय किया कि दोनों देशों के बीच भविष्य में जब बातचीत होगी कोई मध्यस्थ या तीसरा पक्ष नहीं होगा.

दोनों देशों ने तय किया कि 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस स्थिति में थी उस रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाएगा.

हालांकि, शिमला समझौते के बाद भी पाकिस्तान हमेशा से जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला बनाने का प्रयास और जनमत संग्रह की मांग करता रहा है. दो साल पहले पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम ने कहा था, "मुझे समझ नहीं आता कि कैसे एक देश (भारत) यह निर्णय कर सकता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव अब वैध नहीं है. उन्होंने प्रश्न किया कि एक द्विपक्षीय समझौता (शिमला), जो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की जगह लेने की बात नहीं करता है, कैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की जगह ले सकता है."

प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद चार दशकों तक जनमत संग्रह पर पाकिस्तान का रुख साफ नहीं रहा. 1990 के दौर में जब कश्मीर में उग्रवाद का दौर शुरू हुआ तो पाकिस्तान ने जनमत संग्रह का राग अलापना शुरू किया. 

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पर भी भारत का दावा

22 फरवरी, 1994 भारतीय संसद के दोनों सदनों ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि पीओके भारत का अटूट अंग है. इस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है. ध्वनिमत से पारित इस प्रस्ताव में कहा गया, 'पीओके भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा. भारत अपने इस भाग के विलय का हर संभव प्रयास करेगा. पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन इलाकों को खाली करे जिसे उसने कब्जाया हुआ है.'

पिछले महीने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर पर जनमत संग्रह के सवाल पर कहा था कि जो जनमत संग्रह की बात करते हैं, वो लोगों को बरगलाते हैं. "जनमत संग्रह की बात अब आउट डेटेड हो चुकी है."

कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है. यहां उसकी मौजूदगी 1949 से है. अभी नियंत्रण रेखा की निगरानी भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक दल करते हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक उसका लक्ष्य, 'दिसंबर 1971 में दोनों देशों के बीच घोषित युद्ध विराम की कड़ी निगरानी करना है.'

केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद जुलाई, 2014 में सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक दल से नई दिल्ली स्थित सरकारी बंगले को खाली करने का आदेश दिया था. भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना था कि यह दल अपनी प्रासंगिकता खो चुका है, इसलिए ये कदम उठाया गया है. 

First published: 24 August 2016, 8:54 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी