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कश्मीर में अशांतिः आतंक को शह देने के आरोप में गिलानी के पुत्र हिरासत में

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 September 2016, 12:07 IST

नवंबर 2010 में, कश्मीर घाटी में पांच माह की लम्बी अशांति (एक घटना की वजह से पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई थी, जिसमें बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे और करीब 123 लोग मारे गए थे) के बाद जब हालात सामान्य होने लगे थे, तब सैय्यद अली शाह गिलानी के पुत्र डॉ. नईम गिलानी स्थाई रूप से रहने के लिए कश्मीर में रहने के लिए वापस आ गए थे. डॉ. नईम 12 साल पहले कश्मीर से शिफ्ट होकर पाकिस्तान चले गए थे.

उनकी सहज वापसी कश्मीर में राजनीतिक चर्चाओं का एक लोकप्रिय विषय बन गई थी. उस समय एक वर्ग के लोगों में यह भी संदेह भरी चर्चा चली कि गिलानी की हुर्रियत कांफ्रेंस और सरकार के बीच कोई गोपनीय समझौता हुआ है. लेकिन यह विचार तथ्यों से परे था. गिलानी को भड़काऊ भाषण देने और युवकों को हिंसा के लिए उकसाने के आरोप में पहले ही हिरासत में ले लिया गया था और उन्हें श्रीनगर चस्माशाही इलाके में अति सुरक्षा वाले टूरिस्ट हट में रखा गया था.

नईम को तो सामान्य पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया था, अन्यथा यह समझा जाता कि जो व्यक्ति एक लम्बे अंतराल के बाद लौटा है, उसे पूछताछ करना जरूरी समझा जा रहा है. नईम के लौटने पर यह विचार भी सामने आया कि वे अपने पिता की अगुवाई वाले हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का उत्तराधिकारी बनने के लिए दौड़ में हैं. हालांकि इस तरह की अटकलों को पांच साल हो गए है.

नईम एक साधारण सा पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे थे. अचानक ही उनका नाम सुर्खियों में आ गया. इस समय उनका नाम नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी की जांच से जुड़ गया है. एनआईए घाटी में हिंसा को हवा देने के लिए अन्य देशों से कश्मीरी अलगाववादियों तक बैंकों के जरिए पहुंचाए गए पैसों के मामलों की जांच में जुटी है. एनआई ने डॉ. गिलानी को भी पूछताछ के लिए तलब किया है.

गिलानी ने सोमवार को ट्वीट किया कि मेरे पुत्र नईम को एनआईए ने अपने श्रीनगर के शिवपोरा स्थित दफ्तर में पेश होने के लिए नोटिस जारी किया है. गिलानी के हुर्रियत गुट ने अपने नेताओं से पूछताछ करने पर अपेक्षित नाराजगी जाहिर की है और कहा है कि यह पूर्व नियोजित कार्रवाई है.

हुर्रियत के बयान में कहा गया है कि हुर्रियत नेतृत्व पर दबाव डालने के लिए मनगढ़ंत मामले थोपे जा रहे हैं. गिलानी और उनके परिवार को सोची-समझी साजिश के तहत भारतीय एजेंसियों द्वारा आतंकित और बदनाम किया जा रहा है ताकि गिलानी की आवाज को दबाया जा सके. इस काम में स्थानीय लोग भारतीय एजेंसियों का साथ दे रहे हैं.

एनआईए ने अब तक क्या किया?

एनआईए पहले ही, हुर्रियत के वरिष्ठ नेताओं, गिलानी के विश्वस्त लोगों मोहम्मद अशरफ शेहराय, पीर सैफुल्लाह से पूछताछ कर चुकी है. शेहराय से शिवपोरा में, जबकि सैफुल्लाह से हुमहामा में पूछताछ की गई. आने वाले दिनों में आधा दर्जन से ज्यादा लोगों से पूछताछ किए जाने की खबर है. 

एनआईए की टीम, जिसमें पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक समेत वरिष्ठ स्तर के पुलिस अधिकारी शामिल हैं, कुछ हफ्तों से पिछले 50 दिनों में बैंकों से हुए संदिग्ध लेनदेन और बैंक खाताधारकों के प्रदर्शनकारियों से सम्बंधों की जांच के सिलसिले में, कश्मीर में डेरा डाले हुए है.

एजेंसी ने सीआरपीसी की धारा 91 तथा अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट की धारा 43-एफ के तहत बैंकों से ऐसे खातों के बारे में जानकारी मांगी है जिसमें अशांति के समय भारी मात्रा में धन जमा हुआ तथा उसे तुरन्त निकाल लिया गया. एनआईए के सूत्रों के अनुसार उसे 90 दिनों में यह रिपोर्ट तैयार करनी है.

घाटी में गड़बड़ी फैलाने के लिए लोगों के खातों में पैसे भेजे जाने की सूचनाएं मिलने के बाद एनआईए को अपनी प्रारम्भिक जांच में 17 ऐसे खातों का पता चला था जिसमें 38 करोड़ रुपए तक की राशि जमा थी. ऐसे खाताधारकों की पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है. 

एक अधिकारी ने बताया कि कई खातों में धन जमा हुआ लेकिन जमा करने वाले का रिश्ता उस खाते के मालिक से बिल्कुल नहीं है. यह भी पता चला था कि पैसा जमा होने के 48 घंटों के अंदर उसे निकाल लिया गया.

इस बारे में और अधिक जानकारी के लिए एनआईए के पीआरओ एसके सिंह को कई फोन कॉल और एमएमएस भी किए गए, पर कोई जवाब नहीं मिला.

अब तक क्या हुआ

एनआईए की जांच का निशाना अब तक केवल गिलानी का हुर्रियत गुट रहा है क्योंकि इस संगठन को घाटी में मौजूदा राजनीतिक माहौल का फायदा उठाने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है. गिलानी की पहचान यहां कट्टरपंथी के रूप में है. यह पहली बार है जब सरकार ने उदारवादी हुर्रियत प्रमुख मीरवाइज मौलवी उमर फारूक को गिरफ्तार किया है. उन्हें श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित चाश्माशाही के निकट एक बंदीगृह में ले जाया गया है.

जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक को इस अशांति की शुरुआत में ही गिरफ्तार किया गया था और अब उन्हें श्रीनगर की सेन्ट्रल जेल में स्थानान्तरित कर दिया गया है. पूर्व में इन सभी की जांच हवाला लेनदेन से जुड़े मामलों में की गई थी. अप्रैल 2014 में दिल्ली में मनी लांड्रिंग मामलों के लिए गठित विशेष अदालत ने भगौड़े व्यापारी नासिर सफी मीर के 55 लाख रुपए की नगदी को फ्रीज करने का आदेश दिया था.

मीर के बारे में माना जाता है कि वह घाटी में अलगाववादी संगठनों का वित्तीय कर्ता-धर्ता है और उनमें से कई के निकट सम्बंध मीरवाइज से हैं. इसी तरह से वर्ष 2002 में भी जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर एक युवा कश्मीरी महिला से 100,000 डॉलर की राशि जब्त किए जाने का दावा किया था.

और इसी तरह जनवरी 2010 में भी दो माह की लम्बे उग्र आंदोलन के बाद दिल्ली पुलिस ने गिलानी के निकट के सहयोगी और उनके गुट के लीगल सेल के मुखिया गुलाम मोहम्मद भट को गिरफ्तार किया था और उसके पास से 21.20 लाख रुपए बरामद करने का दावा किया था.

लेकिन इतनी बड़ी रकम की बरामदगी और गिरफ्तारियों को हमेशा ही घाटी में संदेह की नजर से देखा गया. हालांकि, इस बात से कभी इनकार नहीं किया गया कि अलगाववादी संगठनों को पाकिस्तान से धन नहीं मिलता है. वास्तव में, उदारवादी हुर्रियत कैम्प के एक वरिष्ठ नेता ने ऐसे फंड लेने वालों की जानकारी कभी उजागर ही नहीं की, अलबत्ता यह कहा कि जब लगता है कि ये नेता पाकिस्तान की नीतियों से भटक रहे हैं तो यह धन या तो रोक लिया जाता है अथवा काफी कम कर दिया जाता है.

उदाहरण के लिए, गिलानी ने जब कश्मीर समझौते पर पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ के चार सूत्रीय प्रस्ताव का विरोध करना तय किया, तब इस्लामाबाद ने न केवल अपना रुख बदल लिया बल्कि उनके गुट को वित्तीय रूप से अपंग भी बना दिया.

जनता का रुख

एक व्यापारी अमजद वानी अचरज भरे शब्दों में कहते हैं कि घाटी में मन-बहलावे के लिए एनआईए ने अलगाववादियों के लिए फंडिंग की नई जांच क्यों कर रही है? अलगावादियों को पाकिस्तान से फंडिंग होती है यह बात सरकार भी जानती है और जनता भी. अब इस तरह की जांच का क्या मतलब है?

कुछ लोग एनआईए के इस खुलासे से इत्तेफाक नहीं रखते कि अशांति के दौरान कुछ खातों से संदिग्ध लेन-देन हुए. एक सरकारी कर्मचारी मोहम्मद फारुक डार का कहना है कि घाटी के बैंक पिछले 54 दिनों से बंद पड़े हुए हैं. प्रदर्शनकारियों ने बंद की चेतावनी दे रखी थी. वे यह भली प्रकार जानते थे कि यदि उन्होंने कुछ ऐसा-वैसा किया तो तुरन्त पकड़ में आ जाएंगे, ऐसी हालत में वे अपने लेनदेन के लिए बैंक का इस्तेमाल क्यों करेंगे?

डॉ. नईम क्यों निशाने पर

लोग केवल यह अनुमान ही लगा सकते हैं कि एनआईए ने जांच में डॉ. नईम को प्रमुखता से निशाने पर क्यों रखा है.

अब 2016 में नईम को एक बार फिर निशाने पर लिया गया है. क्या इसके लिए कुछ जरूरी दबाव था. एक वाजिब कारण यह हो सकता है कि उनके पिता की कुछ मामलों में संलिप्तता का होना. 2010 में जब वह घाटी में अशांति खत्म होने के बाद पाकिस्तान से लौटकर आए थे तो उनके बारे में बहुत कुछ अटकलें चल रही थी. कुछ इस तरह की भी थीं कि सरकार ने रहस्यमय परिस्थितियों में उन्हें पाकिस्तान से वापस आने की अनुमति दी है.

नईम ने अपनी एमबीबीएस की डिग्री कश्मीर से ली हुई है. पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्होंने पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से सर्जरी में मास्टर डिग्री ली. 1999 में पाकिस्तान जाने का कारण सरकार समर्थक उग्रवादियों इख्वानी समूह द्वारा उन पर कथित रूप से हमला करना था.

हुर्रियत के प्रवक्ता अयाज अकबर ने 2010 में मीडिया से कहा था कि बोन्स एंड ज्वाइंट्स अस्पताल में तैनाती के समय इख्वानीस द्वारा उन पर हमला किया गया था. जान बची रहे, इसी की खातिर वे पाकिस्तान चले गए थे.

First published: 2 September 2016, 12:07 IST
 
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