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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-जदयू-एनसीपी महागठबंधन!

अतुल चंद्रा | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

बिहार में महागठबंधन का हिस्सा बनने और चमत्कारिक सफलता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही महागठबंधन करना चाहती है. जाहिर है कांग्रेस यहां अपनी वर्तमान विधायक संख्या (29) में सुधार के लिए उत्सुक है.

लखनऊ स्थित पार्टी कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में पार्टी वरिष्ठ के वरिष्ठ नेता रामकृष्ण द्विवेदी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ राजस्थान सरकार द्वारा आठवीं कक्षा की किताब से जवाहरलाल नेहरू का पाठ हटाए जाने की निंदा कर रहे हैं, साथ ही उन्होंने बिहार की तर्ज पर महागठबंधन की संभावना को स्वीकारते हुए भी सावधानीपूर्वक इसकी जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व पर छोड़ दिया.

बिहार की नीतीश कुमार सरकार के सलाहकार प्रशांत किशोर (पीके) ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार हैं, इसलिए जदयू और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से महागठबंधन की संभावना बलवति हो गई है.

उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए कांग्रेस और अन्य छोटी पार्टियों के साथ मिलकर महागठबंधन बना सकती है: जदयू

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री ने भी इससे इनकार नहीं किया. उन्होंने यह तो नहीं बताया कि किन पार्टियों के साथ सीटों का बंटवारा किया जा सकता है, लेकिन यह जरूर कहा कि "यह संभव है कि हम 70, 80 या 100 सीटें छोटी पार्टियों के साथ साझा कर चुनाव मं उतरें.”

जनता दल यूनाइटेड के महासचिव केसी त्यागी ने हाल ही में कहा था कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए कांग्रेस और अन्य छोटी पार्टियों के साथ मिलकर महागठबंधन बना सकती है.

प्रशांत किशोर: न तो उत्तर प्रदेश, 'बिहार-गुजरात' है न ही कांग्रेस यहां 'जदयू-भाजपा' है

चूंकि दोनों पार्टियों के बीच प्रशांत किशोर एक कॉमन लिंक है, इसलिए कांग्रेस और जनता दल यूनाइटेड के बीच गठबंधन बहुत संभव लग रहा है. गठबंधन की स्थिति में कांग्रेस की सवर्ण और कुछ अन्य जातियों पर पकड़ हो सकती है, वहीं उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार की पूरी नजर सिर्फ अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों पर ही होगी.

शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस दोनों महाराष्ट्र में गठबंधन कर चुकी हैं और केंद्र में एक ही सरकार का हिस्सा रह चुकी हैं. हाल ही में लखनऊ पहुंचे शरद पवार ने संकेत दिया था कि भले प्रदेश में उनकी पार्टी का जनाधार न के बराबर हो, लेकिन एनसीपी उत्तर प्रदेश में 2017 का चुनाव लड़ेगी.

कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की नजर ऊंची और पिछड़ी जातियों के साथ-साथ मुस्लिमों पर भी है

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री के बयान से स्पष्ट था कि उनकी पार्टी कुछ हद तक सहायता के लिए समाजवादी पार्टी पर भी निर्भर रहेगी. उन्होंने अकालग्रस्त बुंदेलखंड की अनदेखी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला, लेकिन अखिलेश यादव सरकार की कमियों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा.

पवार के बाद अब उत्तर प्रदेश दौरे की बारी नीतीश कुमार की है. उन्होंने 12 मई को वाराणसी के पिंडरा इलाके में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रदेशस्तरीय सम्मेलन को संबोधित करने का कार्यक्रम निर्धारित किया है. संभावना है कि 15 मई को वे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंचेंगे और प्रदेश के भूमि और शराब माफिया पर हमला बोलेंगे.

राकांपा की तरह ही जदयू की भी उत्तर प्रदेश में कोई उपस्थिति नहीं है, लेकिन पार्टी नीतिश कुमार की बढ़ती लोकप्रियता भुनाने की उम्मीद में है.

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कांग्रेस के लिए यह अनुकूल है कि वह 100 सीटें अन्य छोटे दलों को दे दे. 403 सीटों में 30-35 सीटें जीतने की तुलना में 300 में से इतनी ही सीटें जीत लेना कांग्रेस के लिए ज्यादा अच्छा प्रतिशत होगा, कम से कम आंकड़ों में बात करने के लिए तो बेहतर होगा ही.

कांग्रेस सीटों का बंटवारा कैसे करेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनावों में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा. कोई नहीं कह सकता कि यूपी चुनाव में नेतृत्व प्रियंका गांधी के हाथ में होगा या उनके भाई राहुल के हाथ में. लेकिन पार्टी के लोग प्रियंका के पक्ष में हैं.

उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार की पूरी नजर सिर्फ अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों पर ही होगी

रामकृष्ण द्विवेदी ने कहा कि प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार हैं, जबकि "नीति निर्धारण की जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व की होगी.” उन्होंने आगे कहा, "प्रशांत किशोर यह तय नहीं कर सकते कि किसे चुनाव लड़ना चाहिए और किसे नहीं. यहां तक कि टिकटों का बंटवारा भी उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है.”

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प्रशांत किशोर 2019 के चुनावों में नीतीश कुमार को भारतीय जनता पार्टी विरोधी मोर्चे के नेता के रूप में प्रायोजित करने की रणनीति बना रहे हैं, वहीं वे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा के सामने एक और मोर्चा खड़ा करना चाहते हैं. प्रशांत किशोर चाहते हैं कि इस महागठबंधन में कांग्रेस निर्णायक भूमिका निभाए.

प्रशांत किशोर की नजर ऊंची और पिछड़ी जातियों के साथ-साथ मुस्लिमों पर भी है. हालांकि किसी एक जगह के उपचुनाव में जीत बहुत अधिक महत्व नहीं रखती, लेकिन देवबंध से कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार की जीत पार्टी के लिए भी अप्रत्याशित थी. इस जीत ने पार्टी में आशा की किरण जगा दी है और अब यह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहायता से 2017 के चुनाव में अपने प्रदर्शन में सुधार करना चाहती है.

First published: 10 May 2016, 9:54 IST
 
अतुल चंद्रा @catchnews

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार

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