Home » इंडिया » Kejriwal became serious on santa banta jokes
 

केजरीवाल को संता-बंता के चुटकुलों पर नहीं आया मजा

स्नेहा वखारिया | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • संता-बंता के चुटकुलों पर प्रतिबंध लगाने की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा. अरविंद केजरीवाल द्वारा इसे रोकने की मांग पंजाब चुनाव के मद्देनजर की गई राजनीतिक पहल भी हो सकती है.
  • मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक समाज के स्वस्थ विकास और रुढ़िवादिता को दूर करने के लिए हंसी-मजाक और चुटकुले जरूरी हैं.

सिखों पर बनाए जाने वाले मजाक, विशेषकर संता-बंता चुटकुलों पर प्रतिबंध के लिए एक याचिका पहले ही डाली जा चुकी है. 

आप इसको भी चेंज डॉट ओआरजी वेबसाइट पर पड़ी अन्य याचिकाओं की भीड़ का एक हिस्सा मान सकते हैं. लेकिन सिखों पर बनाए जाने वाले चुटकुलों के खिलाफ यह याचिका व्यापक समर्थन जुटा रही  है. 

यह 25 हजार समर्थकों तक पहुंचने के करीब है. यहां तक की सुप्रीम कोर्ट भी सिखों पर बनने वाले चुटकुलों पर प्रतिबंध लगाने की मांग को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर चुका है. 

अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इस याचिका पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसे और ज्यादा गंभीरता देने के लिहाज से उन्होंने हार्ड कापी पर हस्ताक्षर (संभव है कि पंजाब चुनाव को देखते हुए यह कदम उठाया गया हो) किया.

santa-banta-jokes-kejriwal-embed

इस याचिका के मुख्य प्रस्तावक आरपीएस कोहली कहते हैं, "हमारा समुदाय राजी-खुशी से रहने वाला और अपनी संस्कृति, भांगड़ा, भाषा से प्यार करने वाला है. हमें अच्छा नहीं लगता जब हमारे ऊपर 'संता-बंता' या '12 बजे' जैसे चुटकुले बनाए जाते हैं. ऐसा नहीं है कि सिख इस मजाक को सहन नहीं कर सकते. लेकिन यह हमारी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है. किसी पर धौंस जमाना स्वस्थ ह्युमर नहीं हैं न ही किसी के धर्म का मजाक उड़ाना."

उनका यह बयान निष्पक्ष तो नहीं है लेकिन कुछ हद तक तार्किक है. एक पल के लिए अगर उनकी बात मान ली जाय तो यह याचिका बेहद भावनात्मक वजहों से उन्होंंने दाखिल की है. उनके मुताबिक वे एक उड़िया स्कूल में पढ़ते थे. वहां वो अकेले सिख छात्र थे. इस वजह से उन्हें पगड़ी पहनने पर काफी तंग किया जाता था. 

पूरी ईमानदारी के साथ वे आगे लिखते हैं, "मैं अपनी कक्षा का टॉपर था और स्कूल प्रोजेक्ट की शुरुआत में सबसे बेहतर विचार देता था. स्कूल की मैग्जीन का पहला संपादक था, नजदीक के गांवों में क्लब और साक्षरता कार्यक्रम चलाने में मेरा योगदान था. बावजूद इसके मैं हंसी और तानों का पात्र बनता था."

श्रीमान कोहली, आपको स्कूल में इसलिए तंग नहीं किया जाता था क्योंकि आप सिख थे. बल्कि इसलिए क्योंकि आप बाकियों से अलग दिखते थे

अब हम इस पर अपनी राय रखते हैं, जरूरी नहीं कि आप भी इससे सहमत हों. 

श्रीमान कोहली, आपको स्कूल में इसलिए तंग नहीं किया जाता था क्योंकि आप सिख थे. बल्कि इसलिए क्योंकि आप बाकियों से अलग दिखते थे. यह हममे से अपने स्कूल में जो भी सबसे अच्छे रहा हैं उन सबके साथ हुआ है. जैसे किसी को भारी आवाज के लिए, किसी को बड़े स्तनों के लिए, किसी को बहुत काला-गोरा-लंबा-पतला-मोटा होने के लिए, किसी को स्कर्ट पर पीरियड के दाग के लिए तो किसी को बैग पर लगे गलत ब्रांड के लोगों के लिए तंग किया गया.

अगर हम पूरी तरह से उनकी गतिविधियों में शामिल नहीं हुए तो भी हमें तंग किया गया. एक सिख स्कूल में एक उड़िया लड़के को भी शायद वही सब सहना पड़ेगा जो आपने सहा. आप अपनी प्रौढ़ावस्था में बनी धारणाओं को साबित करने के लिए बचपन की घटनाओं को ढाल नहीं बना सकते. 

आइए अब कोहली की याचिका को उसकी योग्यता के मुताबिक जांचते हैं. सरदारों पर भारत में बनने वाले चुटकुलों से दूर रखते हुए. 

सफेद अंबेसडर या कंजूस मारवाड़ी

मजाक या हंसी उड़ाने के समृद्ध भारतीय इतिहास को देखें तो केवल सरदारों पर आधारित चुटकुले ही आज तक नहीं बने हैं. सफेद अंबेसडर कार में एक रुस्तम पारसीजी और छोटे बालों वाली उनकी मोटी-ताजी बीवी, तेल भरे बालों वाला तमिल इंजीनयिरंग रिसर्च असिस्टेंट, एक बंगाली कम्युनिस्ट जिसका घर मछली से बदबू मारता है, बेंगलुरू में आईटी का बंदा जो पिंक फ्लॉयड सुनने के बावजूद कुंवारा बना रहता है, गोवा का सस्पेंडर्स पहनने वाला शराबी इसाई जो अपने गिटार पर कैरोल बजाता है, मल्लू, कंजूस मारवाड़ी, नशेबाज पंजाबी या उड़िया व्यक्ति जो पढ़ाई के लिए अपनी किडनी बेच देता है, और भी न जाने कितने चुटकुले जातियों और समुदायों को केंद्र में रखकर बनते हैं इस देश में. 

मनोवैज्ञानिक हमेशा से हंसी को जरूरी मानते रहे हैं

यह बहुत अच्छा भी है. क्योंकि किसी रुढ़िवादी की आदत या रुढ़ि का मजाक उड़ाना उसे कुछ समय तक तो तंग करता है. लेकिन कुछ वक्त बाद वो बात सामान्य लगने लगती है और चिढ़ने वाला व्यक्ति उस बात पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है. साथ ही मजाक बनाने वाले को तंग करने के लिए वह उसकी कमजोरी ढूंढ़ता है और पलटकर उसे ही तंग करने लगता है. यह प्रक्रिया लोगों को धैर्यवान भी बनाती है. 

सभी अच्छे स्टैंड अप कॉमेडियन इसका इस्तेमाल करते हैं. जैसे आप ऐसे किसी कार्यक्रम में गए हों जहां कॉमेडियन पूछता है कि आज शो में कोई बंगाली है क्या. इसके बाद क्या कोई दिल्लीवाला, मुंबईवाला, शादीशुदा या कुंवारा आदि की भी बारी आती है.

बेशक आप भी ऐसी बातों से दो चार हुए होंगे. और यह संयोग से नहीं हुआ होगा. कहीं भी दर्शकों में जोश भरने और घुलने मिलने का यह एक प्रभावी तरीका है. इसके जरिये कॉमेडियन क्या करता है? वो केवल हर दर्शक को अलग-अलग वर्ग में बांटते हुए सभी वर्गों को एक कर देता है. यानी अंत में अलग-अलग वर्ग में दोस्ताना माहौल पैदा कर देता है.

मनोवैज्ञानिक हमेशा से हंसी को एक संदेश भेजने वाली डिवाइस मानते रहे हैं. क्योंकि जब आप हंसते हैं तो कोई अन्य व्यक्ति यह जान जाता है कि वहां डरने जैसा कुछ भी नहीं है. 

"यदि आप हंसते है, तो आपके आसपास मौजूद व्यक्ति को यह संदेश देते हैं कि पहले आपने कोई खतरा भांपा, लेकिन पता चला कि ऐसा कुछ नहीं था. यह स्वतः होने लगता है."

उदारवादी सोच के संदर्भ में इसका मतलब है कि सांप्रदायिक लकीर के फकीरों पर बने चुटकुले वास्तव में वो मजबूत धागे होते हैं जो बिखरे सामाजिक ताने-बाने को जोड़े रहते हैं. 

लेकिन क्या मजाक है और क्या नहीं

अब बढ़ाचढ़ा कर बताने के बड़े हास्य साधनों पर जाते हैं. उदाहरण के लिए किसी की मां को मोटा कहना अच्छी बात नहीं है. लेकिन यह कहना कि तुम्हारी मां इतनी मोटी है कि उसका एक अलग पिनकोड है, उतना बुरा नहीं लगेगा. क्योंकि यह पूरी तरह से असंभव है. इसीलिए आलिया भट्ट के चुटकुलों पर आलिया भट्ट हंस सकती है. इसीलिए आलोक नाथ खुद के चुटकुलों पर हंसते हैं.

इसलिए अगर किसी रुढ़िवादी को इतना बढ़ाचढ़ा दिए जाए जो कि असंभव हो तो वह चुटकुला बन जाता है. और अगर इसपर हंसी आ जाती है तो यह विरोध या शत्रुता को समाप्त कर देता है. 

यह हमें वापस संता बंता के चुटकुलों पर ले आता है जिसने केजरीवाल और कोहली को नाराज किया. संता बंता अकल्पनीय हैं. उन्होंने कभी सिख समुदाय पर गंभीर कलंक नहीं लगाया. वे केवल हंसाते हैं. लेकिन दशकों से चले आ रहे चुटकुलों के लिए अब हमारी प्रतिक्रिया सामान्य रहती है. इनमें अपना अस्तित्व में बनाए रखने की योग्यता है. 

याचिका हास्यापद है

बेशक सर्वोच्च न्यायालय या अरविंद केजरीवाल के पास संता बंता के चुटकुलों पर प्रतिबंध लगाने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है. इसलिए जो भी इंटरनेट को समझता है, उसके लिए यहा अजीब या मजाकिया बात है. 

santa-banta-jokes1

फिर भी हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि अब इन चुटकुलों के आराम फरमाने का वक्त आ चुका है. केवल इसलिए नहीं कि किसी अतिसंवेदनशील व्यक्ति ने याचिका डाल दी है. 

और शायद यह वक्त इसके दायरे को और विस्तार दिए जाने का है. बराबरी में एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने, कई समुदायों का मजाक उड़ाने, आपस की दूरियों को खत्म करने का वक्त आ चुका है. 

और क्योंकि वो हम सबके पसंदीदा संता बंता के पीछे पड़े हैं, तो यह केवल वक्त की बात है कि अगला निशाना कोई ब्राह्मण, बनिया या क्षत्रिय हो सकता है. 

यह सिर्फ और सिर्फ हास्यास्पद होगा.

First published: 5 December 2015, 9:21 IST
 
स्नेहा वखारिया @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़. लिट्रेचर और लाइफस्टाइल पर लिखती हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी