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केरल की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा?

आदित्य मेनन | Updated on: 21 March 2016, 8:58 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस और वाम दलों ने पश्चिम बंगाल में हाथ मिला लिया है लेकिन केरल में दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. दोनों पार्टियों के केरल इकाई के नेता बंगाल में गठबंधन के खिलाफ थे लेकिन केंद्रीय आलाकमान ने किया उलट फैसला.
  • पिछले कुछ सालों में राज्य की राजनीति में बीजेपी के उभार से यहां के समीकरण थोड़े बदलते नजर आ रहे हैं. परंपरागत तौर पर वाम दल और कांग्रेस राज्य में बारी-बारी से सरकार बनाते आ रहे हैं.

आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस और वामपंथी दल दोनों ही खुद को बेहद अजीब स्थिति में पा रहे हैं. एक तरफ इन दोनों दलों ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को टक्कर देने के लिये हाथ मिलाया है वहीं दूसरी तरफ केरल में होने वाले चुनावों में वे एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते दिख रहे हैं.

दोनों ही दलों की केरल इकाइयां पश्चिम बंगाल में एक-दूसरे के साथ गठबंधन के विरोध में थीं लेकिन दोनों ही दलों के केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी मांग को खारिज करते हुए इस बेमेल साथ को हरी झंडी दी. अपनी रणनीति पर अमल करते हुए बीजेपी केरल के वुनाव प्रचार में पश्चिम बंगाल के इस गठबंधन का मामला उठाकर कांग्रेस और वामदलों दोनों पर निशाना साधेगी.

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बीते तीन दशकों से भी अधिक से कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाला एलडीएफ बारी-बारी से केरल की सत्ता का सुख भोगते आए हैं. इस हिसाब से इस बार के चुनावों में सरकार बनाने का मौका वाम दलों को मिलना चाहिये और राज्य में किये गए अधिकतर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भी एलडीएफ की जीत का संकेत दे रहे हैं. क्या केरल में इस बार यह मिथक टूटेगा? इस बार के चुनाव में कई ऐसे ‘‘एक्स-फैक्टर’’ हैं जिनके चलते बेहद अप्रत्याशित परिणाम सामने आ सकते हैं.

बीजेपी का उदय


बीजेपी अबतक केरल के चुनावों में सिर्फ एक दर्शक की भूमिका में ही मानी जाती रही है. और उसकी यह हालत राज्य में आरएसएस की बेहद मजबूत मौजूदगी के बावजूद होती आई है.

हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी अपनी स्थिति में कुछ सुधार लाने में सफल रही और उसका मत प्रतिशत 2011 के विधानसभा चुनावों के छह प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह रहा कि बीजेपी तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस नेता शशि थरूर को कड़ी चुनौती देने में सफल रही. हालांकि थरूर जीतने में सफल रहे लेकिन बीजेपी सात में से चार विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त पाने में कामयाब रही.

पार्टी ने केरल के अपने वरिष्ठतम नेता ओ राजागोपाल को मैदान में उतारा था. राजागोपाल आगामी विधानसभा चुनावों में नेमोम से मैदान में उतरेंगे और पार्टी को भरोसा है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी को इस क्षेत्र में मिली बढ़त के भरोसे वे यह सीट जीतने में सफल होंगे.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम साथ नजर आ रहे हैं लेकिन केरल में दोनों आमने-सामने हैं

हालांकि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष कुम्मानम राजशेखरन राज्य में बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं लेकिन पार्टी के राज्य स्तरीय नेता कहते हैं कि वास्तव में पार्टी 10 सीटों तक जीत सकती है. राज्य में पार्टी के इतिहास को देखते हुए उनके द्वारा जीती गई प्रत्येक सीट एक बोनस की तरह ही होगी.

इसके अलावा पार्टी तिरुवनंतपुरम, कासरगोड और पालक्कड़ के निगम चुनावों के अलावा बीते वर्ष हुए अरुविक्करा उपचुनाव में किये गए बेहतर प्रदर्शन से बेहद उत्साहित है जिनमें बीजेपी के वोट शेयर में पांच गुना का इजाफा हुआ था.

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अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि बीजेपी का उत्थान किसके लिये अधिक नुकसानदायक साबित होगा?

निगम चुनावों के नतीजों को आधार मानकर आंकलन करने पर पता चलता है कि पार्टी ने कांग्रेस के वोट में सेंध लगाई है. इन चुनावों में बीजेपी कांग्रेस के उच्च जाति का नायर वोटरों में काफी हद तक सेंध लगाने में सफल रही.

हालांकि अरुविक्करा के उपचुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस के मुकाबले वामदलों का अधिक नुकसान किया था और आखिरकार कांग्रेस यह सीट जीतने में सफल रही.

बीजेपी ने इज्हावा नेता वेलापल्ली नटेसन की नवगठित भारत धर्म जन सेना के साथ गठबंधन किया है. नटेसन श्री नारायण गुरू द्वारा स्थापित श्री नारायण धर्म परिपालना (एसएनडीपी) योगम के महासचिव भी हैं.

पारंपरिक रूप से इज्हावा एलडीएफ का समर्थन करते आए हैं और इस समुदाय के बीच बीजेपी को होने वाला कोई भी फायदा वामदलों के मतों की कीमत पर होगा.

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बीजेपी राजशेखरन के नेतृत्व में बेहद आक्रामक तरीके से हिंदुत्व कार्ड खेलती आ रही है. राजशेखरन ने केरल में विश्व हिंदु परिषद को स्थापित करने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसाईयों के प्रभुत्व वाली केरल कांग्रेस के साथ मालमेल का प्रयास विफल होने के बाद बीजेपी ने और अधिक आक्रामक हिंदुवादी रुख अपना लिया है.

हालांकि नायर सेवा समाज द्वारा समर्थन से इंकार देने के चलते बीजेपी की आक्रामक हिंदुत्व कार्ड खेलने की योजना को काफी धक्का लगा है.

यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि बीजेपी का हिंदुत्व आधारित प्रचार अभियान अल्पसंख्यक मतदाताओं पर क्या प्रभाव छोड़ता है जो केरल की कुल आबादी का लगभग 45 प्रतिशत हैं जिनमें 26.5 प्रतिशत मुसलमान और 18.3 प्रतिशत इसाई हैं. लोकसभा चुनावों में अल्पसंख्यकों ने एकमत होकर कांग्रेस का समर्थन किया था लेकिन निकाय चुनावों में अल्पसंख्यक वोटों का एक बड़ा हिस्सा छिटककर एलडीएफ के पाले में चला गया. कहा जा रहा है कि वे केरल बीजेपी के उदय के प्रति कांग्रेस की ‘‘कमजोर प्रतिक्रिया’’ से नाराज हैं.

शराबबंदी


केरल में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगाने का यूडीएफ सरकार का फैसला एक और ऐसा महत्वपूर्ण कारण है जो चुनावों में कोई भी करवट ले सकता है. सरकार ने केरल में पूर्ण निशेध लागून करते हुए इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया है जिसके तहत सरकार बार का लाईसेंस समाप्त होने के बाद उसका नवीनीकरण नहीं करेगी. राज्य के स्वामित्व वाले केरल स्टेट बेवरेजिस काॅर्पोरेशन (बेव्को) के दस प्रतिशत को प्रतिवर्ष बंद किया जाएगा. हालांकि 5 सितारा होटलों में शराब की बिक्री पहले की तरह जारी रहेगी.

केरल के शराब की ऊंची खपत वाला राज्य होने के चलते सरकार के इस फैसले को अधिकांश लोगों से अच्छी प्रिितक्रिया नहीं मिली है. विशेषकर बार मालिकों ने मिलकर इन चुनावों में यूडीएफ की हार सुनिश्चित करने का फैसला किया है. बीजेपी के सहयोगी नेतसन एक जाने-माने बार मालिक हैं.

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हालांकि सरकार के मद्यनिषेध के फैसले को बड़े पैमाने पर महिलाओं का समर्थन मिला है जिनके भीतर बढ़ती शराबखोरी को लेकर काफी गुस्सा देखा जा सकता था. यूडीएफ का दावा है कि शराब की खपत में कमी के चलते राज्य में होने वाले अपराध और घरेलू हिंसा के मामलों में काफी कमी देखने को मिली है.

जमीनी स्तर पर सक्रिय बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सरकार के इस फैसलों को भी कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण करने का एक तरीका बताते हुए इसके एक सांप्रदायिक रूप दे दिया है.

ओमन चांडी का प्रदर्शन


ओमन चांडी बीते दो दशक में पहले ऐसे कांगेसी मुख्यमंत्री हैं जो अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने में सफल रहे हैं. उनसे पूर्व के करुणाकरण 1982-87 में ऐसा सफलतापूर्वक करने वाले अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे. एक ऐसा राज्य जहां कांग्रेस पूरी तरह से गुटबाजी के चंगुल में हैं वहां यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है.

केरल में पिछले कुछ सालों में बीजेपी के उभार से वाम दलों और कांग्रेस की मुश्किल बढ़ गयी है

बेहद चर्चित रहे सौर घोटाले में नाम आने के बावजूद उनका पद पर बने रहना वास्तव में किसी चमत्कार से कम नहीं है. उनके निजी सहायकों में से एक को इस घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है. मुख्य आरोपी सरिथा नायर ने स्वयं मुख्यमंत्री को रिश्वत देने का आरोप लगाने के बावजूद पूरा कांग्रेस नेतृत्व चांडी के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है. शायद इसका कारण वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एके एंटनी हैं जिन्हें उनकी ईमानदारी के चलते संत एंटनी भी कहा जाने लगा है. एंटनी ने पार्टी नेतृत्व के सामने खुलकर चांडी का समर्थन करते हुए कहा है कि उन्होंने इस मामले में कुछ भी गलत नहीं किया है.

माना जाता है कि सौर घोटाले के अलावा मुख्यमंत्री के रूप में चांडी का कार्यकाल बेहद बेहतरीन रहा है. उनके कार्यकाल के दौरान ही कोच्चि मेट्रो जैसी कई महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं पूरी हुई हैं. इयके अलावा कन्नूर हवाईअड्डा और विजिंघम बंदरगाह भी लगभग तैयार हैं.

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इसके अलावा चांडी ने शून्य भूमिहीन केरल नीति भी लागू की जिसके तहत राज्य के प्रत्यके भूमिहीन परिवार को जमीन का एक छोटा टुकड़ा दिया जाता है. इसके अलावा उन्होंने लोगों को निःशुल्क जेनेरिक दवाएं देनी भी प्रारंभ की है.

यहां तक कि नेतसन भी चांडी के द्वारा किये गए कामों की प्रशंसा करना नहीं भूले जब उन्होंने पिछले महीने ही कहा, ‘‘चांडी केरल को मिलने वाले अबतक के सबसे सक्षम और प्रतिभाशाली मुख्यमंत्री हैं.’’

अब सवाल यह है कि क्या सौर घोटाला चांडी की बनी-बनाई छवि को बिगाड़ने में कामयाब होगा?

अंदरूनी कलह


कांग्रेस और वामदल दोनों में ही अंदरूनी कलह का बोलबाला है. पार्टी नेतृत्व के चांडी के पक्ष में खड़े होने के बावजूद उनके विरोधियों ने हार नहीं मानी है. उनका विरोधी गुट ‘‘आई’’ समूह के नाम से जाना जाता है जो इंदिरा गांधी के समय की कांग्रेस(आई) से प्रेरित है जिसके समय में केरल में करुणाकरण का उदय हुआ था.

इसके अलावा केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वीएम सुधीरन के चांडी के साथ मतभेद भी जगजाहिर हैं. कहा जाता है कि मद्यनिषेध के प्रति सुधीरन की अतिसक्रियता के चलते ही चांडी को यह निर्णय लेना पड़ा था. हालांकि जब चांडी के ऊपर सौर घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे तो सुधीरन सबसे पहले उनके बचाव में सामने आए.

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वामदलों की स्थिति भी कांग्रेस से अछूती नहीं है और उसके दो मुख्य नेता वीएस अच्युतानंदन और पिनारयी विजयन मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी को लेकर आमने-सामने हैं.

सीपीआई(एम) के मुख्यमंत्री पद का दावेदार का नाम घोषित न करने के निर्णय के चलते दोनों ही नेता चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी में हैं. ऐसे में नेतृत्व का मामला कलह में ही अटक गया है. इसके अलावा दोनों नेताओं के बीच टिकट वितरण को लेकर भी तनातनी होने की पूरी संभावना है.

वहीं दूसरी तरफ बीजेपी में इस बात को लेकर मतभेद के स्वर सुने जा सकते हैं कि कुछ चुनिंदा आसान सीटों पर चुनाव कौन लड़ेगा और कौन नहीं. मुख्यतः तिरुवनंतपुरम जिले की सीटों के अलावा काासरगोड की कुछ सीटों पर पार्टी की जीत बेहद आसान मानी जा रही हैं.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ की एक घटक केरल कांग्रेस विघटन के कगार पर है. पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने अध्यक्ष केएम मणि पर पार्टी की कीमत पर अपने बेटे का पक्ष लेने का आरोप लगाया है.

दांव पर क्या लगा है?


कांग्रेस और वामदल दोनों का ही बहुत कुछ इन चुनावों में दांव पर लगा है. वर्तमान में वामदलों के पास सिर्फ त्रिपुरा की सत्ता है. पश्चिम बंगाल के गठबंधन के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को हराना एक बेहद कठिन चुनौती होगा. ऐसे में वामदलों के पास राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिये केरल को जीतना बेहद आवश्यक है.

कांग्रेस के लिये भी यह चुनाव कोई कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. वह इन चुनावों में दो प्रमुख राज्यों - केरल और आसान में कुर्सी बचाने की लड़ाई लड़ रही है. साथ ही ये दोनों ऐसे राज्य हैं जहां उसके पास गहरी पैठ जमा चुका संगठन है और पार्टी के पास देश के अन्य क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक अभाव है. अगर कांग्रेस ये दोनों राज्य हार जाती है तो तो उसके पास सिर्फ कर्नाटक, पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा छोटे राज्यों मेघालय और मिजोरम की सत्ता रह जाएगी.

जहां तक बीजेपी का सवाल है तो केरल के चुनाव यह फैसला करेंगे कि अमित शाह के अश्वमेध घोड़े कहां तक जाने में सफल होते हैं.

First published: 21 March 2016, 8:58 IST
 
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