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केरल: भूमाफिया और सरकारी अनदेखी की चपेट में दम तोड़ती धान की खेती

शॉन सेबेस्टियन | Updated on: 16 March 2016, 23:14 IST
QUICK PILL
  • केरल में साल दर साल धान की खेती कम होती जा रही है. राज्य में चावल की कुल खपत का केवल 15 प्रतिशत राज्य में पैदा होता है. बाकी बाहर से आयात होता है.
  • केरल में धान के खेती को बचाने के लिए मौजूदा कानूनों पर अमल करने के साथ ही सरकार को धान के किसानों की मदद के लिए नए कदम उठाने होंगे.

कई दूसरे भारतीय राज्यों की तरह केरल को भी चावल प्रेम के लिए जाना जाता है. यहां के खानपान में चावल का अहम स्थान है. लेकिन राज्य में धान की खेती दम तोड़ रही है.

पिछले हफ्ते राज्य सरकार द्वारा केरल के कोट्टायम ज़िले में 427 एकड धान के खेतों को पाटने के विफल प्रयास से ये मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है. ये धान के खेत यहां के वेमबनाड झील का हिस्सा हैं. ये पूरी भूमि आद्रप्रदेश है जो अंतरराष्ट्रीय संधि द्वारा संरक्षित है.

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राज्य सरकार ने एक निजी कंपनी को इस भूमि को पाटकर रिजॉर्ट बनाने की अनुमति दे दी थी. लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध और केरल हाई कोर्ट द्वारा दिए गए स्थगन आदेश के बाद राज्य सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा.

राज्य योजना बोर्ड के अनुसार 1980 से 2007 के बीच केरल में धान उपजाने वाले खेतों के क्षेत्रफल में पांच लाख हेक्टेयर की कमी आयी है. 2012 के आंकड़ों के अनुसार केवल 2008 में केरल में धान के खेतों में 25 हजार हेक्टेयर की कमी आयी.

धान नहीं मकान


धान के खेतों को पाटकर कारोबारियों या भूमाफिया को सौंप देना राज्य की पुरानी समस्या रही है. लेकिन कुछ जानकार मानते हैं कि इसके पीछे एक अन्य बड़ी वजह किसानों के लिए मुश्किल होते खेते हालात भी जिम्मेदार हैं. जिसके कारण ये किसान खेती छोड़ रहे हैं.

कोट्टायम स्थित सामाजिक कार्यकर्ता जॉय कूट्टुमल कहते हैं, "धान की खेती में जितनी मेहनत लगती है उसके हिसाब से से फायद कुछ नहीं है." जॉय उस कमेटी के सदस्य थे जिसने धान के खेतों को पाटने के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.

राज्य सरकार ने धान के खेतों को पाटकर एक रिजॉर्ट बनाने की अनुमति दे दी. हाई कोर्ट ने उसके फैसले पर रोक लगा दी

जॉय के अनुसार जब किसान बुरे हालात से गुजर रहे होते हैं तो बिल्डर उन्हें मोटी धनराशि का प्रस्ताव देते हैं. दूसरी तरफ राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद पर ध्यान नहीं देती.

जॉय बताते हैं, "बिल्डरों के एक समूह राकिंडो डेवलपर्स ने किसानों से बाजार भाव से काफी अधिक दाम देकर 108 किसानों की जमीन खरीद ली. कुछ किसानों से 15 लाख प्रति एकड़ तक की दर से ज़मीन खरीदी गयी."

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जॉय कहते हैं कि कंपनी को खेती में कोई रुचि नहीं. वो उसपर इमारती निर्माण कराना चाहते हैं. जॉय कहते हैं कि जमीन पर निर्माण आसान हो जाए इसलिए कंपनी ने राज्य सरकार के सामने 'इको टूरिज्म प्लान' पेश किया.

जॉय आरोप लगाते हैं कि इस मामले में राज्य सरकार ने केरल कंजवेशन ऑफ पैडी एंड वेटलैंड एक्ट 2008 की अनदेखी की. 2015 में इस कानून में किए गए संशोधन से किसानों की हालत और बदतर हो गयी. नए संशोधन के अनुसार 2008 से पहले धान के खेतों के भूमि परिवर्तन में कराए गए बदलाव पर शुल्क भूमि मालिक को देना होगा.

धान की कहानी


केरल के विभिन्न इलाकों में धान की खेती होती है. उत्तरी केरल के पालक्काड़ जिले राज्य का सबसे अधिक धान पैदा करने वाला इलाका है. इस इलाके में मौजूद कई बांधों की वजह से यहां धान की खेती दूसरे इलाकों की तुलना में आसान होती है.

राज्य का कुटानाड इलाका भी धान की खेती के मशहूर है. यहां के लोग विशेष तकनीकी से धान उपजाते हैं. इन दोनों इलाकों को राज्य में 'धान का कटोरा' कहा जाता है.

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20वीं सदी के उत्तरार्ध में राज्य में धान की खेती कमजोर पड़ने लगी. अप्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसे से हाउजिंग सेक्टर में तेजी से उछाल देखने को मिली. जिसके लिए धान के खेतों को पाटकर भवन निर्माण किया जाने लगा.

दूसरी तरफ धान के किसान ज्यादा मुनाफे के लिए रबर, काजू और सुपारी जैसे नगदी फसलों की तरफ मुड़ने लगे. सरकारी उपेक्षा ने भी खेती से लोगों को दूूर होने में मदद की.

धान की खेती कम होने से राज्य में अभूतपूर्व गर्मी और जल संकट जैसी समस्याएं सिर उठाने लगी हैं

इस समय राज्य की कुल चावल खपत का केवल 15 प्रतिशत राज्य में पैदा होता है. बाकी चावल बाहर से आयात किया जाता है. राज्य में कई लोगों का मानना है कि स्थानीय चावल आयातित चावल से ज्यादा स्वास्थप्रद होता है.

धान की खेती में कमी आने से केरल में उपजायी जाने वाली धान की कई प्रजातियां की उपज बंद हो गयी. वहीं एक ही खेेत में धान और झींगा उपजाने की विशेष पद्धति 'पोक्काली' भी लगभग खत्म हो गयी है.

धान के खेत की कीमत


पर्यावरण कार्यकर्ता सीआर नीलकंडन कहते हैं, "धान के खेतों की कीमत रुपये से नहीं लगायी जा सकती." नीलकंडन धान के खेतों के संरक्षण के लिए लंबे समय से संघर्ष करते रहे हैं.

नीलकंडन कहते हैं, "धान के खेत बारिश के पानी के संचयन के सबसे अच्छे स्रोत होते हैं. जिनकी वजह से जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता बनी रहती है."

वो कहते हैं कि आद्रभूमि बाढ़ को काबू रखने में अहम योगदान करते हैं. अगर ये नष्ट हो गए करेल को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. वो चेन्नई का उदाहरण देते हैं जहां झीलों के नष्ट हो जाने को बाढ़ के लिए बड़ा जिम्मेदार माना गया. 

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हालांकि नीलकंडन को उम्मीद है कि लोग फिर से धान की खेती और आद्रभूमि का महत्व समझने लगेंगे.

वो कहते हैं, "अभूतपूर्व गर्मी, जल संकट और स्थानीय खाद्य की तलब जैसे मुद्दों के कारण लोग फिर से आद्रभूमि को नष्ट करने का दुष्परिणाम समझने लगे हैं."

नीलकंडन मानते हैं कि जितने लोग इसका महत्व समझेंगे उतने अधिक लोग इस संघर्ष में शामिल होंगे.

अगर मौजूदा कानूनों पर ठीक से अमल किया जाए और सरकार थोड़ा सहयोग करे तो राज्य में धान की खेती एक बार फिर लहलहाने लगेगी.

First published: 16 March 2016, 23:14 IST
 
शॉन सेबेस्टियन @catchhindi

केरल के कोच्चि स्थित स्वतंत्र पत्रकार

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