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ट्रांसजेंडर जस्टिस बोर्डः केरल एक बार फिर सामाजिक न्याय में निकला सबसे आगे

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 13 January 2016, 17:45 IST
QUICK PILL
  • केरल सरकार ने ट्रांसजेंडर जस्टिस बोर्ड के गठन की घोषणा की है. ऐसा करने वाला वो देश का पहला राज्य बन गया है. इस बोर्ड में ट्रांसजेंडरों से जुड़े मामलों की सुनवाई होगी और उन्हें कानूनी सहायता भी दी जाएगी.
  • ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट राज्य सरकार के फ़ैसले से काफी ख़ुश हैं. हालांकि उनका मानना है कि इसे जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू करने से ही मिलेगी पूर्ण सफलता.

केरल भारत का सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा जागरूक प्रदेश माना जाता है. ट्रांसजेंडरों (थर्ड जेंडर) के लिए अलग जस्टिस बोर्ड का गठन करके राज्य ने एक बार फिर ये बात साबित कर दी है.

केरल सरकार ने 10 जनवरी को इसकी घोषणा की. राज्य सरकार ने नवंबर तक नई ट्रांसजेंडर नीति बनाने की भी घोषणा की है. ऐसा करने वाला वो देश का पहला राज्य होगा.

इस जस्टिस बोर्ड में ट्रांसजेंडरों से जुड़े मामलों की सुनवाई होगी और उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता भी दी जाएगी. इससे उनके ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव को रोकने में मदद मिलेगी.

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 सरकार के फ़ैसले से ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट काफ़ी ख़ुश हैं. अभीना अहेर एशिया पैसिफिक ट्रांसजेंडर नेटवर्क की चेयरपर्सन हैं.
 
अहेर कहती हैं, "साल 2010 में जब मैं ट्रांसजेंडर से जुड़े एक कार्यक्रम में केरल गयी थी तो क़रीब 17 होटलों ने मुझे कमरा देने से मना कर दिया क्योंकि मैं किन्नर हूं."

अहेर उम्मीद जताती हैं कि इस बोर्ड के गठन से ट्रांसजेंडर के संग होने वाले तमाम भेदभाव से निपटने में उन्हें मदद मिलेगी.

ट्रांसजेंडरों अपने अधिकारों के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं. साल 2014 में उन्हें तब बड़ी जीत मिली जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता दी और केंद्र तथा राज्य सरकारों से इस बाबत निर्देश दिया.

कोर्ट ने ये भी कहा था कि सरकारों को सुनिश्चित करना होगा कि ट्रांसजेंडरों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिले.

केरल बना ट्रांसजेंडर जस्टिस बोर्ड बनाने वाला देश का पहला राज्य

केरल सरकार के नए फ़ैसले के बाद ट्रांसजेंडर को अलग पहचान पत्र जारी हो सकेगा. राज्य के सरकारी दस्तावेजों में उनकी पहचान तीसरे जेंडर के रूप में दर्ज हो सकेगी. उनके लिए अलग से हेल्पलाइन भी चलायी जा सकेगी.

ये बोर्ड इस बात को भी सुनिश्चित करेगा कि ट्रांसजेंडरों को आवास और शिक्षा की सुविधा मिलने में दिक्कत न हो.

केरल के सामाजिक न्याय विभाग के प्रमुख वीएन जितेंद्रन ने इस अवसर पर कहा, "बोर्ड सुनिश्चित करेगा कि राज्य के स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और राजस्व विभाग ट्रांसजेंडर अधिकारों का ख्याल रखें."

राज्य में ट्रांसजेंडर की हालत को लेकर लंबे समय से चिंता जतायी जा रही थी. केरल सामाजिक कल्याण बोर्ड के एक हालिया सर्वे के अनुसार राज्य में करीब 60 प्रतिशत ट्रांसजेंडर आत्महत्या की कोशिश कर चुके थे और करीब 58 प्रतिशत को उत्पीड़न के कारण स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी थी.

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इस सर्वे के अनुसार ट्रांसजेंडरों की साक्षरता दर 93 प्रतिशत है. फिर भी केवल 12 प्रतिशत ट्रांसजेंडर के पास नियमित नौकरी है.

सर्वे में सामना आया कि केवल 10 प्रतिशत ट्रांसजेंडर ही अपने परिवार वालों और रिश्तेदारों को अपनी लैंगिक पहचान बताते हैं. करीब 80 प्रतिशत को अपने यौन रुझान के उलट शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

हालांकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2013 में भारत में केवल 16 ट्रांसजेंडर ने आत्महत्या की थी.

केरल में ट्रांसजेंडरों की साक्षरता दर 93 प्रतिशत है, फिर भी केवल 12 प्रतिशत ट्रांसजेंडर के पास नियमित नौकरी है.

ट्रांसजेंडर के लिए काम करने वाले एनजीओ 'संगम' से जुड़े राजेश उमादेवी की केरल की ट्रांसजेंडर नीति बनवाने में प्रमुख भूमिका रही है.

नई नीति के बारे में बात करते हुए राजेश कहते हैं, "इसकी नई बात है राजनेताओं की भागीदारी. दूसरे किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ है. दूसरे राज्य इससे जुड़ी नीतियों को लागू करने में विफल रहे हैं. यहां इसे लागू करने में राजनेताओं की भूमिका रहेगी."

राजेश कहते हैं कि इस नीति की सफलता पर निर्भर करती है कि ये कितनी सफलता से लागू हो पाती है.

ट्रांसजेंडर की स्थिति पूरे देश में अच्छी नहीं है लेकिन केरल में उनकी हालत ज्यादा बदतर है. यहां तक कि कई बार उनकी मौजूदगी को भी स्वीकार नहीं किया जाता.

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राजेश कहते हैं, "साल 2010 में राज्य के एक बड़े अधिकारी से मैं बात कर रहा था तो उन्होंने कहा कि केरल में ट्रांसजेंडर हैं ही नहीं. राज्य के ज्यादातर अधिकारी कमोबेश ऐसी ही राय रखते हैं."

राजेश और अभीना दोनों ने कहा कि पिछले पांच सालों से किए जा रहे लगातार प्रयासों का परिणाम इस फैसले के रूप में सामने आया है. हालांकि ट्रांसजेंडर को व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता मिलने के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है.

ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट सिमरन शेख कहती हैं, "साल 2010 में सम्मेलन के लिए हम केवल 31 ट्रांसजेंडरों को जुटा सके थे. एक साल बाद ही एक रैली में 2000 ट्रांसजेंडर शामिल हुए. उसके बाद से हालात बेहतर ही हुए हैं."

First published: 13 January 2016, 17:45 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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