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वरुण, स्मृति या राजनाथ नहीं केशव मौर्या के इर्दगिर्द भाजपा बुन रही है मुख्यमंत्री का तानाबाना

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

भाजपा के अध्यक्ष मौके-बेमौके मीडिया से कहते आए हैं कि पार्टी ने अभी तक उत्तर प्रदेश के लिये अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय नहीं किया है और यहां तक कि फिलहाल इस मामले को लेकर पार्टी के भीतर कोई चर्चा भी नहीं हो रही है.

इसके बावजूद संभावितों के नामों को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है और कइ बार उम्मीदवार, पोस्टर और पार्टी के सूत्रों के माध्यम से इनसे संबंधित जानकारी सामने आती रहती है. वर्तमान में जो नाम सबसे मजबूती के साथ उभरकर सामने आ रहा है वह और किसी का नहीं बल्कि बीजेपी की राज्य इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या का है.

बीते एक वर्ष में बीजेपी की ओर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में स्मृति ईरानी, वरुण गांधी और यहां तक कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के नाम निकलकर सामने आते रहे हैं.

राजनाथ, वरुण, स्मृति, कल्याण, आदित्यनाथ समेत तमाम नाम मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभरते रहे हैं

इसके अलावा कुछ रपटों में स्वयं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के राज्य के पार्टी का चेहरा बनने की संभावना भी जताई है. इसी तरह सूची में योगी आदित्यनाथ और राम शंकर कठेरिया के नाम भी बीजेपी की तरफ से मुख्यमत्री पद के संभावितों के रूप में सामने आते रहे हैं.

हालांकि पार्टी नेतृत्व और सूत्र दोनों ही इन अटकलों को पार्टी के उन समर्थकों का उत्साह कहते आए हैं जो इस पद के लिये अपने पसंदीदा का नाम पेश कर रहे हैं और इस पूरे घटनाक्रम से पार्टी की पसंद या राय का कुछ लेना-देना नहीं है.

इधर इन तमाम अटकलों के बीच दिल्ली में कम जाने-पहचाने, उत्तर प्रदेश के फूलपुर से बीजेपी सांसद, केशव प्रसाद मौर्य की पदोन्नति करते हुए उन्हें पार्टी की राज्य इकाई का मुखिया नियुक्त कर दिया गया. ऐसे समय में जब पार्टी अगड़ी जाति के समर्थन को लेकर संतुष्ट है तब पिछड़ी जाति के मतदाताओं को खुश करने के लिये पार्टी के इस कदम को चतुराई भरा माना जा रहा है.

इस पदोन्नति के बाद वर्तमान में बीजेपी मुख्यालय और झंडेवालान, दोनों ही स्थानों से जो सुगबुगाहटें निकल कर आ रही हैं उनके मुताबिक केशव प्रसाद उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बाकियों से आगे निकल सकते हैं. हालांकि पार्टी ने इसकी घोषणा तो नहीं की है लेकिन उसने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को राज्य के अभियान समिति का प्रमुख बनाने का फैसला कर लिया है. ऐसा उन्हें मुख्यमंत्री के रूप पेश करने के लिये नहीं किया गया है.

पार्टी में बेहद उच्च पदों पर तैनात सूत्रों के अनुसार इस घोषणा के जल्द होने की कोई उम्मीद नहीं है. एक सूत्र का कहना है, ‘‘अगर पार्टी चुनाव से पहले मुख्मंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने का फैसला करती है तो इस बात की पूरी संभावना है कि नाम की घोषणा अक्टूबर के महीने में की जाएगी.’’

आखिर मौर्या पहली पसंद क्यों हैं?

अबतक उभरकर सामने आए नामों को न चुनने के अपने कारण हैं. उदाहरण के लिये वरुण गांधी के नाम को लेकर आरएसएस को बहुत संदेह है. आदित्यनाथ को पूर्वांचल में राजनाथ सिंह का मजबूत विरोध झेलना है. वे नहीं चाहेंगे कि उस क्षेत्र से कोई और राजपूत आगे बढ़े. हालांकि आदित्यानाथ का नाम पहली बार आगे नहीं बढ़ा है और ऐसा होना पार्टी के लिये नई बात नहीं है. ऐसा बीते कई चुनावों से होता आ रहा है.

स्मृति ईरानी को बीजेपी, आरएसएस में कईयों के द्वारा बाहरी के रूप में देखा जाता है और यहां तक कि पार्टी की राज्य इकाई भी उनकी उम्मीदवारी को लेकर सहमत नहीं होगी. कल्याण सिंह अब उम्र के ऐसे दौर में हैं जहां उन्हें संभावित चेहरे के रूप में पेश नहीं किया जा सकता.

राम शंकर कठेरिया के साथ उनका दलित होना फायदेमंद हो सकता था लेकिन पार्टी के भीतर सवर्ण लॉबी और सवर्ण मतदाताओं को पार्टी नाराज नहीं करना चाहती. एक और बात जो बात उनके खिलाफ जा रही है वह है उनका गैर जाटव दलित समुदाय से होना. उनकी जाति इतनी बड़ी संख्या में नहीं है जो पार्टी की रणनीति को अधिक फायदा दिलवा सके.

निःसंदेह राजनाथ सिंह राज्य के लिये बिल्कुल उपयुक्त नाम और चेहरा हैं. वे पूर्व में भी इस पद को संभाल चुके हैं और बिना किसी शक के राज्य बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे हैं. वे मोदी के केंद्रीय मंत्रीमंडल में गृहमंत्री जैसी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और राज्य में मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे कद्दावर विरोधी नेताओं को जवाब देने की क्षमता रखते हैं.

निःसंदेह राजनाथ सिंह राज्य के लिये बिल्कुल उपयुक्त नाम और चेहरा हैं लेकिन मोदी-शाह ऐसा कभी नहीं चाहेंगे

लेकिन इतनी मजबूत प्रोफाइल वाला व्यक्ति भी प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की नजरों में एक अच्छा विकल्प नहीं है. उनका राज्य में मजबूत होना 2019 में मोदी के लिये बड़ी चुनौती साबित हो सकता है. मोदी नहीं चाहेंगे कि उनकी सरकार के गठन में 73 सीटों का योगदान देने वाला राज्य एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में जाए जो भविष्य में उनके लिये संभावित प्रतिद्वंद्वी हो सकता है.

केशव प्रसाद मौर्या के पक्ष में सबसे बड़ी बात उनके आरएसएस और वीएचपी, दोनों के साथ बेहद अच्छे संबंध हैं. उत्तर प्रदेश से संबंधित तमाम फैसले दत्तात्रेय होशबाले और कृष्ण गोपाल के हाथों में होते हैं और दोनों ही आरएसएस के सरकार्यवाह रह चुके हैं.

दोनों राज्य में तबसे काम कर रहे हैं जब मौर्या वीएचपी के साथ जुड़े थे. इनके बीच बेहतरीन आपसी समझ और संबंध हैं और केशव इन दोनों महत्वपूर्ण व्यक्तियों के बेहद करीब हैं. इसके अलावा केशव उस कद के नेता भी नहीं हैं जो भविष्य में मोदी और शाह के लिए कोई चुनौती बन सकें.

वास्तव में केशव, मोदी और शाह के लिये सर्वश्रेष्ठ चुनाव साबित हो सकते हैं. उनके मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व के दिशा निर्देशों पर चलने वाले आज्ञाकारी स्वयंसेवक साबित होने की संभावना अधिक है. इसके अलावा अगर बीजेपी 2017 के चुनाव में बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पाने में सफल होती है तो इसके माध्यम से मोदी और शाह राज्य सरकार पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने में भी सफल रहेंगे.

केशव आरएसएस और मोदी, दोनों के साथ अच्छे संबंध रखते हैं. और यही वह इकलौता कारण है जो बीजेपी द्वारा राज्य के संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किये जा रहे अन्य चेहरों के बीच उन्हें आगे खड़ा करती है.

First published: 16 June 2016, 8:19 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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