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केतन देसाई: भ्रष्टाचार के आरोप बरक़रार, अब वर्ल्ड काउंसिल के अध्यक्ष

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 26 October 2016, 7:15 IST
QUICK PILL
  • मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे केतन देसाई भ्रष्टाचार और रिश्वत के आरोप में गिरफ़्तार हो चुके हैं. 
  • मगर छह साल बाद अब वह वर्ल्ड मेडिकल काउंसिल के अध्यक्ष बन गए हैं जो दुनियाभर में फिजिशियनों के लिए मानदंड तय करती है. 

नीति आयोग के एक पैनल ने जुलाई में कहा था कि वह मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के रूप में बदलने पर विचार कर रहा है. यह आयोग स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ़ से नियुक्त गवर्नरों का एक बोर्ड होगा. एमसीआई पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद मंत्रालय ने यह फैसला लिया है. साथ ही मेडिकल कॉलेजों को लाइसेंस बांटने के इसके तौर-तरीकों की भी खासी आलोचना हुई है.

संस्थान के अब तक कार्यकाल में ज्यादातर समय केतन देसाई अध्यक्ष रहे हैं, तकरीबन 10 साल तक. भ्रष्टाचार के आरोपों में जब सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया, तब उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया था. इसके बाद एमसीआई को भंग कर दिया गया और देसाई का मेडिकल लाइसेंस भी निरस्त कर दिया गया.

मगर नवम्बर 2013 में एमसीआई को फिर बहाली हुई और एक नई समिति भी बनाई गई. देसाई को उनका मेडिकल लाइसेंस भी दोबारा मिल गया. बताया जाता है कि नई समिति में कई सदस्य देसाई के करीबी दोस्त थे. देसाई का तिलिस्म यहीं नहीं थमा, हाल ही में वह वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन (डब्लूएमए) के अध्यक्ष भी बन गए. डब्लूएमए दुनियाभर के फिजिशियनों के लिए मानदंड तय करती है और 100 से अधिक देशों में करोड़ों डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व करती है. अमेरिकी मेडिकल काउन्सिल और ब्रिटिश मेडिकल काउन्सिल इसके सदस्य हैं.

फिलहाल, केतन देसाई के खिलाफ दो अदालतों में सुनवाई चल रही है. एक, नई दिल्ली में और दूसरी लखनऊ में. मामले से जुड़े वकीलों ने कैच न्यूज को बताया कि दिल्ली की एक अदालत में देसाई के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप चल रहे हैं. उनपर पंजाब के एक कारोबारी से कथिततौर पर रिश्वत लेने का आरोप है, जिसने कॉलेज में संसाधनों और फैकल्टी की कमी के बावजूद ज्यादा संख्या में छात्रों को दाख़िला दे दिया था. 

देसाई पर आरोप

2010 में पंजाब के ज्ञान सागर मेडिकल कॉलेज को फायदा पहुंचाने के लिए देसाई और उनके तीन साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया था. वहीं कॉलेज प्रशासन ने देसाई के साथ किसी तरह के संबंध होने से इनकार किया है. एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि 2009 से कॉलेज में छात्रों की संख्या बढ़ी है लेकिन कॉलेज के इंफ्रास्ट्रक्चर या फैकल्टी की संख्या नहीं बढ़ाई गई.

लखनऊ की अदालत में भी देसाई पर इसी तरह का एक और केस चल रहा है, जो सीबीआई ने दायर किया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने एमसीआई के अध्यक्ष पद पर रहते हुए अधिकारियों की मिलीभगत से एक मेडिकल स्कूल के विस्तार की सिफारिश कर दी ताकि वह अपना इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी मेम्बर बढ़ाए बिना ज्यादा छात्रों को प्रवेश दे सके. 

श्री राम मूर्ति स्मारक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया क्योंकि मामला अभी अदालत में चल रहा है.

इससे पहले 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने देसाई पर अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया था. उन पर आरोप था कि एमसीआई प्रमुख के पद पर रहते हुए उन्होंने भारी संख्या में ‘बड़े मॉनीटरी गिफ्ट’ लिए. लेकिन उसके बाद चली जांच बेनतीजा रही और उनके खिलाफ केस वापस लेना पड़ा. 

देसाई पर कार्रवाई की मांग

एक दागी मंत्री कैसे डब्लूएमए प्रमुख बन गया? चिकित्सकीय लापरवाही के खिलाफ काम करने वाली पीपुल फॉर बैटर ट्रीटमेंट (पीबीटी) नाम की एक संस्था ने देसाई के खिलाफ अलग-अलग कोर्ट में याचिकाएं दायर की हुई हैं. इन याचिकाओं में देसाई पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए संस्था ने उच्चतम न्यायालय से मांग की है कि उन्हें सारे मेडिकल एसोसिएशन से हटा दिया जाए.

पीबीटी के अनुसार, एमसीआई में उच्च अधिकारियों और देसाई के निकट सहयोगियों और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने झूठ बोला कि सभी अधिकारियों ने देसाई के खिलाफ सारे आरोप वापस ले लिए हैं और इसलिए वे डब्लूएमए के प्रमुख बनने के काबिल हैं. पीबीटी ने देसाई को डब्लूएमए का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के खिलाफ अपील की है और स्वास्थ्य मंत्रालय में याचिका लगाई है कि उनकी नियुक्ति पर रोक लगा दी जाए.

ताक़तवर देसाई

देसाई ने कोई पहली बार इस पद के लिए चुना नहीं लड़ा है. 2010 में भी देसाई इस सीट पर चुनाव लड़ने वाले अकेले उम्मीदवार थे लेकिन वे इस पद पर नियुक्त किए जाते, उससे पहले ही सीबीआई ने उन्हें ज्ञान सागर मेडिकल स्कूल केस में गिरफ्तार कर लिया.

यह मामला उनके खिलाफ अब भी अदालत में पेंडिंग है. एमसीआई के मुख्य सतर्कता अधिकारी एच.के जेठी ने पीबीटी के रुख का समर्थन किया और बताया कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर अधिकारियों ने डब्लूएमए प्रतिनिधियों से जान बूझ कर झूठ बोला.

देसाई ने कैच द्वारा भेजी गई ईमेल का भी जवाब नहीं दिया, जिसमें उनसे कुछ सवाल पूछे गए थे. ऐसा लगता है ग्लोबल मेडिकल एथिक्स के मानदंड तय करने की जिम्मेदारी गलत हाथों में सौंप दी गई है.

First published: 26 October 2016, 7:15 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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